दिल्ली की विरासत पर संकट: 100 साल पुराने दिल्ली रेस क्लब और जयपुर पोलो क्लब को खाली करने का अल्टीमेटम
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संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रहे दिल्ली रेस क्लब और जयपुर पोलो क्लब अब इतिहास के पन्नों में सिमटने की कगार पर हैं। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) ने इन दोनों प्रतिष्ठित क्लबों को जमीन खाली करने का नोटिस थमा दिया है। मात्र 15 दिनों के भीतर इस विशाल परिसर को खाली करने के आदेश ने न केवल खेल प्रेमियों को चौंका दिया है, बल्कि यहां काम करने वाले हजारों कर्मचारियों और सैकड़ों बेजुबान घोड़ों के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।
1926 से आज तक: गौरवशाली अतीत का अंत?
दिल्ली रेस क्लब की शुरुआत 8 मार्च 1926 को हुई थी। लगभग 53 एकड़ की बेशकीमती भूमि पर फैला यह क्लब दिल्ली की शान माना जाता है। इसी तरह, 1930 में शुरू हुआ जयपुर पोलो ग्राउंड 15 एकड़ में फैला हुआ है। अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही यह विरासत अब नई विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ने जा रही है। मंत्रालय का तर्क है कि इस इलाके में बड़ी विकास परियोजनाओं को जगह देने के लिए लीज का विस्तार नहीं किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि दिल्ली रेस क्लब की लीज 31 दिसंबर 1994 को ही समाप्त हो चुकी थी, जिसके बाद से यह कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच संचालित हो रहा था।
250 घोड़े और 5000 कर्मचारी: बेघर होने का डर
क्लब के सीईओ और सचिव कर्नल (सेवानिवृत्त) एसके बक्शी ने इस निर्णय पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि वे सरकार के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन रातों-रात 250 घोड़ों को कहीं और ले जाना असंभव है। घोड़ों के लिए नया ट्रैक तैयार करने में ही कम से कम एक से डेढ़ साल का समय लगता है। इससे भी ज्यादा दुखद स्थिति उन 5000 कर्मचारियों की है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्लब से जुड़े हुए हैं। इनमें से कई परिवार ऐसे हैं जो आजादी से पहले लखनऊ से अंग्रेजों के घोड़ों की देखभाल करने दिल्ली आए थे और आज उनकी छठी पीढ़ी यहीं रह रही है। इन परिवारों के पास इस क्लब के अलावा रहने का कोई दूसरा ठिकाना नहीं है।
अधिकारियों की बैठक रही बेनतीजा
नोटिस जारी होने के बाद सोमवार को दिल्ली रेस क्लब के अधिकारियों और शहरी विकास मंत्रालय के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक हुई। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया। मंत्रालय अपने स्टैंड पर अडिग है कि जमीन खाली करनी होगी, जबकि क्लब प्रबंधन मानवीय आधार पर और घोड़ों की सुरक्षा के लिए कुछ और समय की मांग कर रहा है।
क्या अतीत बन जाएगी दिल्ली की यह शान?
दिल्ली रेस क्लब सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। सुबह की सैर हो या घुड़दौड़ का रोमांच, दिल्ली के इतिहास के कई पन्ने इन मैदानों में लिखे गए हैं। अगर सरकार अपने फैसले पर अडिग रहती है, तो आने वाले दो हफ्तों में यहां के अस्तबल सूने हो जाएंगे और वह ऐतिहासिक ट्रैक, जहां कभी घोड़ों की टापों की गूंज सुनाई देती थी, मलबे के ढेर में तब्दील हो जाएगा।






