राहुल गांधी के जाति वाले बयान पर दिल्ली यूनिवर्सिटी का पलटवार, बोलने से पहले फैक्ट चेक कर लें नेता प्रतिपक्ष
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संवाद 24 नई दिल्ली। यूनिवर्सिटी ने अपने जवाब में आगे कहा कि यदि राहुल गांधी का इशारा शिक्षक भर्ती की ओर था, तो उन्हें यह जानना चाहिए कि विश्वविद्यालय ने हाल के दिनों में हर वर्ग (SC, ST, OBC, EWS) से हजारों शिक्षकों की पारदर्शी तरीके से भर्ती की है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह के निराधार बयान शैक्षणिक संस्थान के माहौल को खराब करते हैं और छात्रों के मन में संस्थान के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं।
कांशीराम और सामाजिक न्याय पर राहुल के विचार
करीब 70 मिनट के अपने लंबे भाषण में राहुल गांधी ने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू जीवित रहते तो कांशीराम कांग्रेस में होते और पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री बनाती। राहुल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि आज कलम का संचालन केवल 15 प्रतिशत लोगों के हाथों में है, जबकि 85 प्रतिशत लोग (पिछड़े और दलित) सिस्टम से बाहर हैं।
संविधान बचाने के लिए मांगा यूपी से समर्थन
राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि केवल नारे लगाने से कुछ हासिल नहीं होगा, इसके लिए विचारधारा की लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने उत्तर प्रदेश से ऐसे 100 समर्पित लोगों की मांग की जो संविधान को बचाने की लड़ाई में उनके साथ खड़े हो सकें। राहुल ने ब्यूरोक्रेसी, न्यायपालिका और बड़ी कंपनियों के सीईओ की सूची का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां दलितों और पिछड़ों की उपस्थिति न के बराबर है।
डीयू के जवाब के बाद राजनीतिक गर्माहट
यूनिवर्सिटी के इस कड़े रुख के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। जहां विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक सच्चाई बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष और विश्वविद्यालय समर्थक इसे राजनीति से प्रेरित और भ्रामक प्रचार करार दे रहे हैं। शिक्षाविदों का कहना है कि किसी भी प्रतिष्ठित संस्थान पर जातिवाद का आरोप लगाने से पहले पुख्ता सबूतों का होना जरूरी है।






