लोकतंत्र के ‘अंपायर’ पर संकट? मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की तैयारी, जानें ‘महाभियोग’ जैसा पेचीदा रास्ता
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक नई हलचल मची हुई है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA bloc) देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी में है। विपक्ष ने उन पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार और निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता से समझौता करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल और बिहार में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को लेकर पैदा हुए विवाद ने इस आग में घी डालने का काम किया है। लेकिन क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना इतना आसान है? क्या विपक्ष के पास वो संख्या बल है जो इस संवैधानिक प्रक्रिया को अंजाम दे सके? आज ‘संवाद 24’ आपको विस्तार से बताएगा कि भारतीय संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है और यह क्यों किसी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं है।
विपक्ष के आरोपों की जड़ में क्या है?
विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों से लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटा दिए हैं। आरोप है कि ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग सत्तापक्ष के इशारे पर काम कर रहा है। विपक्ष का तर्क है कि लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका एक निष्पक्ष अंपायर की होती है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह भरोसा डगमगा गया है। इसी आधार पर विपक्ष अब ‘महाभियोग’ जैसी प्रक्रिया के जरिए उन्हें हटाने का मन बना चुका है।
कैसे हटते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना उतना ही कठिन है जितना कि सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाना। संविधान में इसके लिए ‘महाभियोग’ शब्द का प्रयोग तो नहीं किया गया है, लेकिन प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है। इसे केवल ‘सिद्ध कदाचार’ (Proved Misbehaviour) या ‘अक्षमता’ (Incapacity) के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
प्रक्रिया के मुख्य चरण:
नोटिस और हस्ताक्षर: यदि विपक्षी दल लोकसभा में प्रस्ताव लाना चाहते हैं, तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। यदि राज्यसभा में शुरुआत करनी है, तो 50 सांसदों की सहमति अनिवार्य है।
अध्यक्ष की भूमिका: यह प्रस्ताव सदन के अध्यक्ष (लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन) को सौंपा जाता है। उनके पास यह अधिकार है कि वे इसे स्वीकार करें या खारिज कर दें।
जांच समिति का गठन: यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो अध्यक्ष तीन सदस्यों की एक जांच समिति बनाते हैं। इसमें एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
सदन में बहस और वोटिंग: यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो प्रस्ताव को सदन में वोटिंग के लिए रखा जाता है।
संख्या बल की चुनौती: क्यों नामुमकिन है यह राह?
यहीं आकर विपक्ष की राह सबसे कठिन हो जाती है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए ‘विशेष बहुमत’ (Special Majority) की आवश्यकता होती है। इसका मतलब है:
सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (50% से अधिक)।
मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत।
वर्तमान संसद के गणित को देखें तो विपक्ष के पास यह जादुई आंकड़ा नहीं है। बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पास पर्याप्त संख्या है जो इस तरह के किसी भी प्रस्ताव को गिरा सकते हैं। जानकारों का मानना है कि विपक्ष का यह कदम कानूनी से ज्यादा ‘राजनीतिक’ है, जिसका मकसद जनता के बीच चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना है।
इतिहास क्या कहता है?
भारत के इतिहास में आज तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया के जरिए हटाया नहीं जा सका है। हालांकि, 2009 में तत्कालीन सीईसी एन. गोपालास्वामी ने राष्ट्रपति से चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी, जिसे ठुकरा दिया गया था।
लोकतंत्र के लिए क्या है इसके मायने?
मुख्य चुनाव आयुक्त को इतनी सुरक्षा इसलिए दी गई है ताकि वे बिना किसी सरकारी दबाव के स्वतंत्र होकर काम कर सकें। यदि उन्हें हटाना आसान होता, तो हर नई सरकार अपने मनमाफिक चुनाव आयुक्त नियुक्त करती। विपक्ष के इस कदम ने एक बार फिर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में संसद का मानसून सत्र इस मुद्दे पर काफी गर्म रहने के आसार हैं। देखना यह होगा कि क्या विपक्ष केवल दबाव बनाने के लिए यह कार्ड खेल रहा है या वाकई उनके पास कोई ठोस रणनीति है।






