शेषनाग-150 का महा-अवतार: चीन और पाकिस्तान की उड़ी नींद! भारत का यह स्वदेशी ‘स्वॉर्म ड्रोन’ बदलेगा युद्ध का भूगोल

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संवाद 24 नई दिल्ली। 21वीं सदी के युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां युद्ध टैंक, लड़ाकू विमान और मिसाइलों पर निर्भर होते थे, वहीं अब ड्रोन और स्वायत्त हथियार प्रणाली आधुनिक सैन्य रणनीति का केंद्र बन चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य-पूर्व के संघर्षों और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते ड्रोन टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में मानव रहित प्रणालियाँ निर्णायक भूमिका निभाने वाली हैं। इसी वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत भी अपनी रक्षा क्षमताओं को नई तकनीकों के अनुरूप ढालने में लगा है। इसी दिशा में विकसित किया जा रहा ‘शेषनाग-150’ (Sheshnaag-150) ड्रोन भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह केवल एक ड्रोन नहीं, बल्कि लंबी दूरी से हमला करने वाली स्वॉर्म ड्रोन प्रणाली (Swarm Drone System) है, जो आधुनिक युद्ध की अवधारणाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रणाली भविष्य में भारतीय सशस्त्र बलों के लिए कम लागत में अधिक प्रभावी हमला क्षमता उपलब्ध करा सकती है।

वैश्विक ड्रोन युद्ध का संदर्भ
पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन युद्ध की अवधारणा तेजी से विकसित हुई है। विशेष रूप से ईरान के शाहेद-136 जैसे कामिकाज़े ड्रोन ने कम लागत में लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता प्रदर्शित की है। इन ड्रोन का उपयोग यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व में व्यापक रूप से देखा गया है। ऐसे ड्रोन कम ऊँचाई पर उड़ते हैं और रडार से बचते हुए लक्ष्यों पर हमला कर सकते हैं। दुनिया के कई देश अब लोइटरिंग म्यूनिशन (Loitering Munition) यानी ऐसे ड्रोन विकसित कर रहे हैं जो लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडराते रहते हैं और उपयुक्त समय आने पर स्वयं लक्ष्य से टकराकर विस्फोट कर देते हैं। इस प्रकार के हथियार को अक्सर “कामीकाज़े ड्रोन” या “सुसाइड ड्रोन” भी कहा जाता है। अमेरिका, इज़राइल, तुर्की और ईरान जैसे देशों ने इस क्षेत्र में काफी प्रगति की है। इन देशों के अनुभवों ने यह दिखाया कि कम लागत वाले ड्रोन भी महंगी सैन्य प्रणालियों को निष्क्रिय कर सकते हैं। इसी कारण दुनिया भर की सेनाएँ अब बड़े पैमाने पर ड्रोन तकनीक में निवेश कर रही हैं।

भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक की दिशा
भारत लंबे समय से रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भर रहा है, लेकिन पिछले दशक में “आत्मनिर्भर भारत” नीति के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर विशेष बल दिया गया है। भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठनों और निजी कंपनियों ने मिलकर कई नई परियोजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें ड्रोन तकनीक प्रमुख है। इसी प्रयास के तहत बेंगलुरु स्थित NewSpace Research and Technologies (NRT) ने शेषनाग-150 ड्रोन प्रणाली विकसित की है। यह कंपनी पहले भी भारतीय नौसेना और वायुसेना के लिए स्वायत्त ड्रोन प्लेटफॉर्म विकसित करने पर काम कर चुकी है। शेषनाग-150 उसी श्रृंखला की एक उन्नत परियोजना है, जिसका उद्देश्य भारतीय सेना को लंबी दूरी से हमला करने और दुश्मन की वायु रक्षा को निष्क्रिय करने की क्षमता देना है।

क्या है शेषनाग-150 ड्रोन
शेषनाग-150 को एक लंबी दूरी की प्रिसिजन स्ट्राइक स्वॉर्म ड्रोन प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका वजन लगभग 150 किलोग्राम वर्ग का बताया जाता है और यह अत्याधुनिक स्वायत्त तकनीक से लैस है। इस ड्रोन की प्रमुख विशेषता यह है कि यह अकेले नहीं, बल्कि कई ड्रोन के समूह (Swarm) के रूप में काम कर सकता है। कई ड्रोन मिलकर दुश्मन के लक्ष्यों पर एक साथ हमला करते हैं, जिससे वायु रक्षा प्रणाली को भ्रमित करना आसान हो जाता है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार स्वॉर्म तकनीक भविष्य के युद्धों में बेहद प्रभावी साबित हो सकती है, क्योंकि यह दुश्मन की रक्षा व्यवस्था को एक साथ कई दिशाओं से चुनौती देती है।

तकनीकी विशेषताएँ
शेषनाग-150 ड्रोन की कुछ प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
रेंज: 1000 किलोमीटर से अधिक
एंड्योरेंस (उड़ान समय): लगभग 5 घंटे
पेलोड क्षमता: 25 से 40 किलोग्राम
वजन वर्ग: लगभग 150 किलोग्राम
क्षमता: स्वॉर्म अटैक और प्रिसिजन स्ट्राइक
इन क्षमताओं के कारण यह ड्रोन दुश्मन के सैन्य ठिकानों, रडार सिस्टम, वाहनों और अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर हमला कर सकता है। इसके अलावा यह लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर लंबे समय तक मंडराकर निगरानी कर सकता है और सही अवसर आने पर हमला कर सकता है।

स्वॉर्म ड्रोन तकनीक क्या है
स्वॉर्म ड्रोन तकनीक आधुनिक सैन्य रणनीति की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। इसमें कई छोटे या मध्यम आकार के ड्रोन एक साथ नेटवर्क के माध्यम से जुड़े होते हैं और सामूहिक रूप से कार्य करते हैं।
इस तकनीक की प्रमुख विशेषताएँ हैं:
सामूहिक निर्णय क्षमता
विभिन्न दिशाओं से हमला
वायु रक्षा प्रणाली को भ्रमित करना
कम लागत में बड़े पैमाने पर हमला
शेषनाग-150 को भी इसी अवधारणा के अनुसार विकसित किया गया है। कई ड्रोन एक साथ उड़कर दुश्मन के ठिकानों पर समन्वित हमला कर सकते हैं। इससे रक्षा प्रणाली के लिए सभी ड्रोन को रोकना कठिन हो जाता है।

कम लागत में प्रभावी हथियार
आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती लागत है। एक क्रूज मिसाइल की कीमत कई करोड़ रुपये तक होती है। इसके विपरीत स्वॉर्म ड्रोन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार शेषनाग-150 जैसे ड्रोन महंगी मिसाइल प्रणालियों का किफायती विकल्प बन सकते हैं। यदि किसी लक्ष्य पर कई ड्रोन एक साथ भेजे जाएँ तो कम लागत में भी अत्यधिक प्रभावी हमला संभव हो सकता है। इसी कारण कई देश अब “Attritable Warfare” यानी ऐसे हथियार विकसित कर रहे हैं जिन्हें युद्ध में खोने का जोखिम आर्थिक रूप से स्वीकार्य हो।

भारतीय सुरक्षा के लिए महत्व
भारत की सुरक्षा चुनौतियाँ काफी जटिल हैं। एक ओर चीन के साथ लंबी सीमा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ भी लगातार तनाव बना रहता है।
ऐसी स्थिति में लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। शेषनाग-150 जैसे ड्रोन निम्नलिखित क्षेत्रों में भारत की क्षमता बढ़ा सकते हैं:
सीमा पार आतंकवादी ठिकानों पर हमला
दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय करना
निगरानी और टोही मिशन
समुद्री सुरक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की तकनीक हाइब्रिड युद्ध और सीमित संघर्ष की स्थितियों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।

नौसेना और वायुसेना के लिए संभावनाएँ
हालाँकि शेषनाग-150 मुख्य रूप से भूमि आधारित हमला प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके उपयोग की संभावनाएँ इससे कहीं व्यापक हैं। भारतीय नौसेना के लिए यह प्रणाली समुद्री युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। समुद्र में दुश्मन के जहाजों या तटीय ठिकानों पर ड्रोन के माध्यम से हमला करना अपेक्षाकृत आसान और सुरक्षित हो सकता है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना भी इसे अपने अन्य लड़ाकू प्लेटफॉर्म के साथ जोड़कर उपयोग कर सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका
आधुनिक ड्रोन केवल रिमोट कंट्रोल मशीनें नहीं रह गई हैं। अब उनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वायत्त नेविगेशन सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है।
AI आधारित ड्रोन निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं:
लक्ष्य की पहचान
मार्ग निर्धारण
बाधाओं से बचाव
सामूहिक निर्णय
शेषनाग-150 में भी उन्नत सॉफ्टवेयर और स्वायत्त नियंत्रण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, जिससे यह जटिल मिशनों को अंजाम दे सकता है।

अमेरिका और ईरान के ड्रोन मॉडल से तुलना
शेषनाग-150 की तुलना अक्सर ईरान के शाहेद-136 जैसे ड्रोन से की जाती है। हालांकि दोनों की तकनीक और उपयोग में अंतर है।
ईरानी ड्रोन मुख्यतः कामीकाज़े हमला प्रणाली के रूप में उपयोग किए जाते हैं, जबकि शेषनाग-150 को स्वॉर्म और प्रिसिजन स्ट्राइक सिस्टम के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके अलावा अमेरिकी सेना भी स्विचब्लेड जैसे लोइटरिंग म्यूनिशन का उपयोग करती है, जो छोटे लेकिन अत्यधिक सटीक होते हैं। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि भारत भी वैश्विक ड्रोन तकनीक के साथ कदम मिलाकर चलने का प्रयास कर रहा है।

परीक्षण और विकास की स्थिति
शेषनाग-150 का प्रारंभिक उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। इस परीक्षण में ड्रोन ने अपनी उड़ान क्षमता और नियंत्रण प्रणाली का प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के अनुसार परीक्षण के दौरान ड्रोन ने लगभग दो घंटे की उड़ान भरी और लक्ष्य पहचान तथा नियंत्रण प्रणाली का सफल प्रदर्शन किया। आने वाले समय में इसके और परीक्षण किए जाएंगे, जिसके बाद इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए तैयार किया जा सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ
ड्रोन तकनीक तेजी से विकसित हो रही है। भविष्य में निम्नलिखित संभावनाएँ दिखाई देती हैं:
पूरी तरह स्वायत्त ड्रोन युद्ध
बड़े पैमाने पर स्वॉर्म हमले
AI आधारित लक्ष्य पहचान
समुद्री और अंतरिक्ष निगरानी
भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह इन तकनीकों में आत्मनिर्भर बने। शेषनाग-150 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

निष्कर्ष
विश्व राजनीति और सैन्य रणनीति के बदलते परिदृश्य में ड्रोन तकनीक निर्णायक भूमिका निभाने लगी है। अमेरिका-ईरान जैसे देशों के बीच ड्रोन टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ स्वायत्त प्रणालियों पर भी निर्भर होंगे। ऐसे समय में भारत का शेषनाग-150 ड्रोन केवल एक सैन्य परियोजना नहीं, बल्कि स्वदेशी तकनीकी क्षमता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। यदि यह प्रणाली सफलतापूर्वक विकसित होकर भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल होती है, तो यह देश की रक्षा क्षमता को नई दिशा दे सकती है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस तकनीक को किस प्रकार विकसित करता है और क्या यह ड्रोन वास्तव में आधुनिक युद्ध की रणनीतियों में निर्णायक भूमिका निभा पाता है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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