मध्य पूर्व का महासंकट: पीएम मोदी की ‘टेलीफोनिक डिप्लोमेसी’ से हड़कंप! खाड़ी देशों के सुल्तानों संग बनाई महा-रणनीति, क्या भारत बनेगा शांति का मसीहा
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संवाद 24 नई दिल्ली। दुनिया इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है। एक तरफ इजरायल और ईरान के बीच मिसाइलों की जंग छिड़ी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के कड़े रुख ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे दी है। ऐसे नाज़ुक दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कमान संभाल ली है। पीएम मोदी ने खाड़ी देशों (Gulf Countries) के दिग्गज नेताओं के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण और आपातकालीन चर्चा की है। इस ‘टेलीफोनिक डिप्लोमेसी’ ने वैश्विक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि भारत ही वह देश है जिसके संबंध इजरायल और अरब देशों, दोनों के साथ बेहद गहरे और संतुलित हैं।
शांति की तलाश: मोदी और खाड़ी के सुल्तान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान समेत कई खाड़ी नेताओं से फोन पर लंबी बातचीत की है। इस चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु पश्चिम एशिया (Middle East) में तेजी से बिगड़ते हालात और मानवीय संकट रहा। पीएम मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति की बहाली ही एकमात्र रास्ता है, जिससे निर्दोष नागरिकों की जान बचाई जा सकती है। सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान न केवल युद्ध को रोकने पर चर्चा हुई, बल्कि युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई।
भारत की भूमिका क्यों है सबसे अहम?
इस समय पूरी दुनिया की नज़रें भारत पर टिकी हैं। इसकी वजह यह है कि भारत का प्रभाव खाड़ी देशों में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा है। सऊदी अरब और यूएई भारत के प्रमुख रणनीतिक साझेदार हैं, वहीं इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंध अटूट हैं। ऐसे में पीएम मोदी एक ऐसे ‘ब्रिज’ (पुल) की भूमिका निभा रहे हैं जो दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की क्षमता रखता है। खाड़ी नेताओं ने भी इस संकट को टालने में भारत की सक्रिय भागीदारी की सराहना की है। चर्चा में गाजा और लेबनान में मानवीय सहायता पहुंचाने और एक ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ की दिशा में बढ़ने की संभावनाओं को भी टटोला गया।
ग्लोबल इकोनॉमी पर संकट का साया
प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ी है। भारत अपनी तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि युद्ध और फैलता है, तो स्वेज नहर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे व्यापारिक मार्ग बंद हो सकते हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। पीएम मोदी ने इस वैश्विक खतरे को भांपते हुए ही इन नेताओं से संवाद किया है ताकि ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासी रहते हैं। उनकी सुरक्षा भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। पीएम मोदी ने खाड़ी के नेताओं से भारतीय समुदाय की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा की है, जिससे यह संदेश गया है कि संकट की घड़ी में भारत अपने नागरिकों के साथ खड़ा है।
दुनिया को बुद्ध की राह की जरूरत
प्रधानमंत्री ने अपने संवाद में बार-बार इस बात को दोहराया है कि “यह युद्ध का युग नहीं है” (This is not an era of war)। भारत की विदेश नीति हमेशा से शांति और सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। जहाँ पश्चिमी देश प्रतिबंधों और सैन्य शक्ति की बात कर रहे हैं, वहीं मोदी ने संवाद और कूटनीति का रास्ता चुना है। इस टेलीफोनिक वार्ता के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में भारत किसी बड़े शांति सम्मेलन की मेजबानी कर सकता है या फिर एक विशेष दूत को खाड़ी देशों के दौरे पर भेज सकता है। पीएम मोदी की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में भारत केवल एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक ‘विश्व गुरु’ और ‘ग्लोबल प्लेयर’ के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार है।
क्या टल जाएगा महायुद्ध?
पीएम मोदी और खाड़ी नेताओं के बीच हुई इस बातचीत ने उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। हालांकि युद्ध के मैदान में अभी भी बारूद बरस रहा है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में अब शांति की भाषा सुनाई देने लगी है। क्या भारत का यह संतुलित रुख मध्य पूर्व की आग को बुझाने में सफल होगा? यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि मोदी की इस सक्रियता ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शांति का रास्ता दिल्ली से होकर ही गुजरता है।






