ईरान-इजरायल युद्ध और खामेनेई की हत्या पर सोनिया गांधी का बड़ा हमला: सरकार की ‘खामोशी’ पर उठाए तीखे सवाल!
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संवाद 24 नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में छिड़े भीषण संघर्ष और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद वैश्विक राजनीति में आए भूचाल ने अब भारत की घरेलू राजनीति को भी गरमा दिया है। कांग्रेस की संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने इस पूरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की “चुप्पी” पर कड़े प्रहार किए हैं। सोनिया गांधी ने एक आधिकारिक बयान जारी कर सरकार से पूछा है कि जब दुनिया एक विनाशकारी महायुद्ध की कगार पर खड़ी है, तब भारत जैसे प्रभावशाली देश का रुख इतना अस्पष्ट क्यों है?
सोनिया गांधी का कड़ा प्रहार: “रणनीतिक चुप्पी या विफलता?”
सोनिया गांधी ने अपने बयान में कहा कि अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या और उसके बाद ईरान-इजरायल के बीच छिड़ा सीधा युद्ध केवल दो देशों का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता और वैश्विक शांति के लिए खतरा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है। सोनिया गांधी ने सवाल किया, “क्या भारत की विदेश नीति अब केवल इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित रह गई है? जब हमारे पड़ोस (खाड़ी क्षेत्र) में आग लगी है और लाखों भारतीयों की सुरक्षा दांव पर है, तो प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं?”
लाखों भारतीयों की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर चिंता
कांग्रेस नेता ने इस बात पर जोर दिया कि खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं और काम करते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी जान-माल की सुरक्षा भारत सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सोनिया गांधी ने आगाह किया कि अगर युद्ध और भड़का, तो कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी, जिसका सीधा असर भारत के आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह तुरंत एक स्पष्ट रुख अपनाए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति बहाली के लिए सक्रिय भूमिका निभाए।
खामेनेई की हत्या: एक टर्निंग पॉइंट
अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या को सोनिया गांधी ने एक ऐसी घटना बताया जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मर्यादाओं को तोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि किसी देश के सर्वोच्च नेता की इस तरह हत्या करना क्षेत्रीय अस्थिरता को न्यौता देना है। उन्होंने भारत की ऐतिहासिक गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) नीति की याद दिलाते हुए कहा कि भारत हमेशा से शांति और संवाद का पक्षधर रहा है, लेकिन वर्तमान सरकार की निष्क्रियता भारत के वैश्विक कद को छोटा कर रही है।
सरकार का अब तक का रुख
वहीं, दूसरी ओर विदेश मंत्रालय (MEA) ने अब तक संतुलित बयान देते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। हालांकि, विपक्ष इसे “कमजोर प्रतिक्रिया” बता रहा है। सोनिया गांधी के इन सवालों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है कि क्या भारत को इस युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए या अपनी तटस्थता बरकरार रखनी चाहिए।
संसदीय सत्र में उठ सकता है मुद्दा
आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर संसद में भारी हंगामे के आसार हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि यूक्रेन-रूस युद्ध के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, तो फिर ईरान-इजरायल संकट पर वे वही सक्रियता क्यों नहीं दिखा रहे






