गुजरात में ‘लव मैरिज’ पर कड़ा पहरा: अब माता-पिता की सहमति के बिना नहीं हो सकेगा प्रेम विवाह? सरकार की नई तैयारी से मंचा हड़कंप!
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संवाद 24 गुजरात। भूपेंद्र पटेल सरकार प्रेम विवाह (Love Marriage) को लेकर एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक कानून लाने की तैयारी में है। सरकार एक ऐसा प्रावधान जोड़ने पर विचार कर रही है जिसके तहत अब राज्य में प्रेम विवाह करने के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य हो सकती है। इसके अलावा, शादी के गवाह के रूप में उसी गांव या इलाके के स्थानीय निवासी का होना भी जरूरी किया जा सकता है। सरकार के इस कदम ने प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है, जहां एक ओर इसे ‘संस्कृति की रक्षा’ बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे ‘व्यक्तिगत आजादी’ पर प्रहार माना जा रहा है।
अभिभावकों की मर्जी के बिना पंजीकरण नहीं?
सूत्रों के मुताबिक, गुजरात सरकार ‘विवाह पंजीकरण अधिनियम’ में संशोधन करने की योजना बना रही है। इस नए संशोधन का मुख्य उद्देश्य उन मामलों को रोकना है जहां युवा अपने परिवार की जानकारी के बिना घर से भागकर शादी कर लेते हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने हाल ही में पाटीदार समाज और अन्य समुदायों की मांग पर इस मुद्दे का अध्ययन करने के निर्देश दिए थे। प्रस्ताव के अनुसार, यदि कोई जोड़ा प्रेम विवाह करना चाहता है, तो उसे संबंधित रजिस्ट्रार कार्यालय में माता-पिता के हस्ताक्षर या सहमति पत्र देना अनिवार्य हो सकता है।
स्थानीय गवाह का प्रावधान: भागकर शादी करने वालों पर लगेगी लगाम
अक्सर देखा गया है कि प्रेम विवाह के मामलों में गवाह ऐसे लोग होते हैं जो जोड़े के जानकार नहीं होते या दूसरे शहर के होते हैं। नई नीति के तहत, अब शादी के गवाह के रूप में उसी स्थानीय क्षेत्र के निवासी का होना अनिवार्य किया जा सकता है जहां शादी हो रही है। सरकार का तर्क है कि इससे धोखाधड़ी और जबरन शादी के मामलों में कमी आएगी और साथ ही ‘लव जिहाद’ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
क्यों उठी इस कानून की मांग?
गुजरात के कई सामाजिक संगठनों और पाटीदार समाज ने सरकार से यह मांग की थी कि प्रेम विवाह के कारण कई परिवार टूट रहे हैं और सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। उनका कहना है कि लड़कियों को फुसलाकर ले जाने और बाद में उनके साथ होने वाले शोषण को रोकने के लिए माता-पिता की भूमिका अहम होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने खुद एक सार्वजनिक मंच से कहा था कि यदि यह कदम संवैधानिक दायरे में रहकर संभव है, तो सरकार इस पर गंभीरता से आगे बढ़ेगी।
संवैधानिक चुनौतियां और विरोध
इस प्रस्तावित कानून को लेकर कानूनी जानकारों का मानना है कि इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत हर वयस्क नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। ऐसे में माता-पिता की अनुमति अनिवार्य करना इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। विपक्षी दलों और युवा संगठनों का कहना है कि सरकार को युवाओं के निजी फैसलों में हस्तक्षेप करने के बजाय उनकी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। यदि यह कानून लागू होता है, तो गुजरात ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन जाएगा। यह फैसला न केवल राज्य की राजनीति बल्कि आने वाले समय में देश के सामाजिक ढांचे पर भी बड़ा प्रभाव डालेगा। फिलहाल सरकार इस पर कानूनी विशेषज्ञों की राय ले रही है ताकि इसे विधानसभा में पेश किया जा सके।






