“भारत-फ्रांस की नई तकनीकी राह: अमेरिका-चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं”
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संवाद 24 दिल्ली। फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने भारत के दौरे पर दिए अपने नवीनतम बयान में एक अहम राजनीतिक और तकनीकी संदेश का संचार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत और फ्रांस, साथ ही विस्तृत रूप से यूरोप, आगामी तारीखों में तकनीकी तथा डिजिटल क्षेत्र में अमेरिकी या चीनी नेतृत्व के अधीन पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते। यह बयान वैश्विक AI प्रतिस्पर्धा, रणनीतिक स्वायत्तता और उच्च-स्तरीय तकनीकी साझेदारी की दिशा में एक निर्णायक मोड़ जैसा माना जा रहा है।
मैक्रों ने कहा कि दोनों देशों में एक साझा दृष्टिकोण है
ऐसी तकनीकी क्षमता विकसित करना जो किसी एक राष्ट्र-विशेष के मॉडल पर आधारित न हो, बल्कि एक समावेशी और संतुलित तकनीकी मानदंड हो जिसमें भारत और फ्रांस दोनों ही समाधान में भागीदार बन सकें। उनका मानना है कि इस दिशा में कदम बढ़ाने से दोनों देशों को वैश्विक मंच पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका और चीन फिलहाल बड़े पैमाने पर AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और तकनीकी विकास में आगे हैं, लेकिन भारत और फ्रांस को अपनी क्षमताओं पर भरोसा है और वे इस दौड़ में “पूरी तरह पीछे नहीं हैं” बल्कि नए समाधानों के निर्माण में सहयोगी भूमिका निभाने के इच्छुक हैं। इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि दोनों देशों की नीतियाँ अब ‘निर्भरता’ से ‘स्वनिर्भरता’ की ओर अग्रसर हैं। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे नई दिल्ली में आयोजित इंडिया AI Impact Summit 2026 के दौरान दिया गया, जहाँ दुनिया भर के नेताओं, विशेषज्ञों और तकनीकी समुदाय के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया। इस सम्मेलन का उद्देश्य मानव-केन्द्रित AI विकास, पारदर्शिता, नवाचार की गति और वैश्विक हित में तकनीकी समाधान खोजने पर ध्यान देना रहा है।
तकनीकी और शिक्षा-संस्कृति में नई साझेदारी की संभावनाएँ
मैक्रों ने बताया कि फ्रांस और भारत केवल निर्भरता का प्रश्न नहीं देख रहे, बल्कि भविष्य के तकनीकी ढांचे में खुद को एक सशक्त भागीदार बनाना चाहते हैं। दोनों नेताओं ने साझा किया कि उन्हें AI, कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा संरचना और विशेषज्ञ प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना है। मैक्रों के अनुसार, यह तीन स्तंभ — कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, उच्च तकनीकी प्रतिभा, और पूंजी निवेश — ही भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा के मूल आधार होंगे। इसके अलावा, फ्रांस ने संयुक्त रूप से नई पहलें भी शुरू की हैं जैसे कि इंडो-फ्रेंच सेंटर फॉर एआई इन हेल्थ (IF-CAIH) का उद्घाटन, जो साझी शोध और इनोवेशन के लिए एक नया मंच स्थापित करेगा। यह केंद्र AIIMS, सोरबोन यूनिवर्सिटी, पेरिस ब्रेन इंस्टिट्यूट और IIT दिल्ली के बीच सहयोग का परिणाम है और इसका लक्ष्य स्वास्थ्य, तंत्रिका विज्ञान और नैदानिक निर्णय-सहायक AI समाधानों पर अनुसंधान को आगे बढ़ाना है।
शिक्षा व संस्कृति में गहरा सहयोग, और वीज़ा आसान होगा
मैक्रों ने यह भी बताया कि दोनों देश शिक्षा और सांस्कृतिक शिक्षा में भी सहयोग बढ़ाएंगे। 2030 तक फ्रांस में भारत से अध्ययन के लिए आने वाले छात्रों की संख्या 30,000 तक पहुँचाने की योजना है। इसका लक्ष्य उच्च-स्तरीय अकादमिक और शोध-गुणवत्ता वाली शिक्षा को बढ़ावा देना है, जिससे भारत के युवा पेशेवरों और शोधकर्ताओं को दुनिया स्तर पर अपनी विशेषज्ञता बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि फ्रांस वीज़ा प्रक्रियाओं को अधिक सहज और शिक्षा-अनुकूल बनाएगा ताकि भारतीय छात्रों को आसानी से अपनी पढ़ाई पूरी करने का अवसर मिल सके।
वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में नई भूमिका
मैक्रों के इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारत-फ्रांस साझेदारी अब केवल द्विपक्षीय सम्बन्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में तकनीकी उच्चता और वैश्विक नियम-निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। दोनों देश AI, डिजिटल सुरक्षा, कंप्यूटिंग क्षमता, मानव-केन्द्रित नीति और तकनीकी स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर एक साझा रणनीति विकसित करना चाहते हैं, जिससे वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा और स्थायित्व को सुदृढ़ किया जा सके। मैक्रों की ये टिप्पणियाँ तकनीकी नेतृत्व के वैश्विक बदलते परिदृश्य में भारत और फ्रांस को एक सशक्त साझेदार के रूप में सामने लाती हैं, जो सिर्फ आकार में बड़ा नहीं बल्कि नीति-निर्माण में भी संतुलन और विवेकपूर्ण विकल्प प्रस्तुत करना चाहता है।






