नौकरी के बदले जमीन घोटाला: लालू परिवार ने खुद को बताया बेकसूर, क्या अब ‘न्याय’ की तराजू पर झुकेगा राजनीति का पलड़ा
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संवाद 24 बिहार । राजनीति में दशकों तक अपनी धमक बनाए रखने वाले लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बहुचर्चित ‘लैंड फॉर जॉब’ (नौकरी के बदले जमीन) घोटाले में सोमवार को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में एक अहम मोड़ आया। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके बेटों समेत अन्य आरोपियों ने कोर्ट के सामने खुद को निर्दोष बताते हुए ट्रायल का सामना करने की बात कही है।
क्या है मामला और कोर्ट की सख्त टिप्पणी?
यह मामला उस समय का है जब लालू प्रसाद यादव 2004 से 2009 के बीच देश के रेल मंत्री थे। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का आरोप है कि इस दौरान रेलवे के ग्रुप-डी पदों पर नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों और उनके परिवारों से बेहद कम कीमतों पर जमीनें लिखवाई गईं। कोर्ट में सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘गंभीर संदेह’ की श्रेणी में रखा। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि रेल मंत्रालय को एक ‘व्यक्तिगत जागीर’ की तरह इस्तेमाल किया गया, जहां सरकारी नौकरियों को जमीन हड़पने के लिए सौदेबाजी के हथियार (Bargaining Chip) के रूप में प्रयोग किया गया।
लालू, राबड़ी और तेजस्वी ने दी सफाई
जब कोर्ट ने लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव से आरोपों के बारे में पूछा, तो तीनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे दोषी नहीं हैं। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि यह पूरा मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। बचाव पक्ष का कहना है कि जो जमीनें खरीदी गईं, उनके बाकायदा पैसे दिए गए थे और वे बाजार दर पर किए गए सौदे थे। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों के बावजूद लालू यादव को इस पूरी साजिश का ‘सूत्रधार’ माना है।
सिंडिकेट की तरह काम करने का आरोप
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार ने एक ‘सिंडिकेट’ की तरह काम किया। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, पटना के कई युवाओं को रेलवे में नौकरी दी गई, लेकिन इसके बदले उनके परिवार की कीमती जमीनें राबड़ी देवी, मीसा भारती और हेमा यादव के नाम ट्रांसफर कर दी गईं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कई पदों के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया था, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन था।
कुछ अधिकारियों को मिली राहत
इस लंबी कानूनी लड़ाई में जहां लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ी हैं, वहीं कोर्ट ने रेलवे के कुछ पूर्व मुख्य कार्मिक अधिकारियों (CPOs) को राहत देते हुए उन्हें आरोपमुक्त (Discharged) कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि इन अधिकारियों के पास नियुक्तियों का सीधा अधिकार नहीं था और वे केवल आदेशों का पालन कर रहे थे।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के बीच कोर्ट के इस कड़े रुख ने राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है। विपक्षी दल इसे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर ‘पारिवारिक लाभ’ का बड़ा उदाहरण बता रहे हैं, वहीं आरजेडी समर्थकों का मानना है कि यह केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग है।






