डीपफेक का जाल: क्या सच में शशि थरूर ने पाकिस्तान का किया समर्थन
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संवाद 24 नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर को पाकिस्तान के रुख की कथित तौर पर सराहना करते हुए दिखाया गया। वीडियो सामने आते ही राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई और कई यूजर्स ने इसे बिना सत्यापन के साझा करना शुरू कर दिया। हालांकि, कुछ ही घंटों में इस वीडियो की सच्चाई पर सवाल उठने लगे।
थरूर का तीखा खंडन: ‘न आवाज मेरी, न भाषा’
विवाद बढ़ने पर शशि थरूर ने स्वयं सामने आकर इस वीडियो को पूरी तरह फर्जी करार दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह वीडियो एआई तकनीक से तैयार किया गया डीपफेक है। थरूर ने कहा कि न तो इसमें इस्तेमाल की गई भाषा उनकी है और न ही आवाज। उन्होंने इसे दुर्भावनापूर्ण प्रयास बताते हुए कहा कि इस तरह की सामग्री जनता को गुमराह करने के लिए बनाई जाती है।
किस मुद्दे पर बनाया गया था वीडियो?
वायरल क्लिप में दावा किया गया था कि थरूर ने भारत-पाकिस्तान के संभावित क्रिकेट मुकाबले और कूटनीतिक परिस्थितियों को लेकर पाकिस्तान की रणनीति की तारीफ की है। वीडियो में उन्हें यह कहते हुए दर्शाया गया कि पाकिस्तान ने एक “चतुर कूटनीतिक कदम” उठाया है। जबकि वास्तविकता यह है कि थरूर ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया।
फैक्ट-चेक में सामने आई सच्चाई
तकनीकी जांच और मीडिया फैक्ट-चेक के बाद स्पष्ट हुआ कि वीडियो में ऑडियो और विजुअल दोनों में छेड़छाड़ की गई है। विशेषज्ञों ने पाया कि आवाज कृत्रिम रूप से तैयार की गई है और वीडियो के हाव-भाव वास्तविक भाषण से मेल नहीं खाते। डिजिटल विश्लेषण में कई ऐसे संकेत मिले, जो इसे एआई जनित सामग्री साबित करते हैं।
डीपफेक तकनीक: लोकतंत्र के लिए नई चुनौती
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि डीपफेक तकनीक किस तेजी से राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रही है। आधुनिक एआई टूल्स की मदद से किसी भी व्यक्ति की आवाज और चेहरे की नकल कर नकली वीडियो बनाना अब आसान हो गया है। इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि आम लोग असली और नकली में अंतर नहीं कर पाते, जिससे भ्रम और अविश्वास फैलता है।
सोशल मीडिया पर तेजी से फैला वीडियो
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वीडियो कुछ विदेशी और अनजान सोशल मीडिया हैंडल्स से साझा किया गया, जिसके बाद यह हजारों लोगों तक पहुंच गया। कई यूजर्स ने बिना पुष्टि किए इसे आगे बढ़ा दिया। यही वजह है कि थरूर को तुरंत सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी।
राजनीतिक साजिश या तकनीकी शरारत?
इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या यह केवल तकनीकी शरारत थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित राजनीतिक मंशा थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के समय ऐसे डीपफेक वीडियो माहौल को प्रभावित करने के लिए बनाए जा सकते हैं।
जनता के लिए क्या है सबक?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी वायरल वीडियो या बयान को सच मानने से पहले उसकी पुष्टि करना बेहद जरूरी है। आधिकारिक स्रोत, विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट और संबंधित व्यक्ति का आधिकारिक बयान देखने के बाद ही निष्कर्ष निकालना चाहिए। डिजिटल साक्षरता आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
तकनीक के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
एआई तकनीक जहां रचनात्मकता और सुविधा का नया दौर लेकर आई है, वहीं इसका दुरुपयोग समाज के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। सरकारों और टेक कंपनियों को मिलकर ऐसे फर्जी कंटेंट की पहचान और रोकथाम के लिए मजबूत तंत्र विकसित करना होगा।
सच और झूठ के बीच की पतली रेखा
शशि थरूर से जुड़ा यह कथित वीडियो एक उदाहरण है कि कैसे कुछ मिनटों का नकली कंटेंट राष्ट्रीय स्तर पर भ्रम पैदा कर सकता है। हालांकि समय रहते सच्चाई सामने आ गई, लेकिन यह घटना चेतावनी है कि डिजिटल युग में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।






