लोकसभा में मचे घमासान के बीच स्पीकर ओम बिरला का कड़ा रुख: ‘नियमों से चलेगा सदन, मनमर्जी से नहीं’

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संवाद 24 नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी लोकसभा के भीतर इन दिनों सियासी पारा अपने चरम पर है। सदन की कार्यवाही के दौरान एक ऐसा वाक्या सामने आया है जिसने संसदीय नियमों और मर्यादाओं को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी दलों द्वारा लाए गए ‘अविश्वास प्रस्ताव’ (No-Confidence Motion) में मौजूद खामियों को लेकर न केवल सख्त रुख अपनाया, बल्कि उसे सही करने के निर्देश भी दिए। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है।

अविश्वास प्रस्ताव में कहाँ रह गई कमी?
संसदीय प्रक्रियाओं के जानकारों के अनुसार, अविश्वास प्रस्ताव लाना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसे लाने के लिए कुछ तय नियमों (संसदीय नियमावली के नियम 198) का पालन करना अनिवार्य होता है। सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस में कुछ तकनीकी और भाषाई त्रुटियां पाई गईं। स्पीकर ओम बिरला ने इन त्रुटियों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि सदन की गरिमा और नियमों की शुद्धता के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि प्रस्ताव पेश करना है, तो उसे निर्धारित प्रारूप और नियमों के दायरे में ही होना चाहिए।

सदन में मर्यादा बनाम सियासत
ओम बिरला ने अपने संबोधन में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि सदन किसी एक पार्टी की विचारधारा से नहीं, बल्कि संविधान की किताब और नियमावली से चलता है। उन्होंने सांसदों को टोकते हुए कहा कि सदन में शोर-शराबा करना समाधान नहीं है, बल्कि चर्चा और नियमों का पालन करना ही लोकतंत्र की असली मजबूती है। विपक्षी सांसदों की नारेबाजी और हंगामे के बीच स्पीकर का यह ‘करेक्शन’ (सुधार) वाला रुख सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक चर्चा का विषय बना हुआ है।

अविश्वास प्रस्ताव का गणित और इतिहास
भारतीय संसदीय इतिहास में अविश्वास प्रस्ताव हमेशा से एक शक्तिशाली हथियार रहा है। हालांकि, वर्तमान लोकसभा में सत्ता पक्ष के पास स्पष्ट बहुमत है, फिर भी विपक्ष इस प्रस्ताव के जरिए सरकार को घेरने और जनता के बीच अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन स्पीकर द्वारा प्रस्ताव में खामियों की ओर इशारा करना विपक्ष के लिए एक रणनीतिक झटका माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब विपक्ष को फिर से होमवर्क करना होगा ताकि प्रस्ताव को बिना किसी रुकावट के सदन के पटल पर रखा जा सके।

क्यों महत्वपूर्ण है स्पीकर का यह कदम?
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्ष होती है। ओम बिरला द्वारा प्रस्ताव में सुधार करने की सलाह को कुछ लोग तटस्थता के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे सदन की कार्यकुशलता बढ़ाने का तरीका मान रहे हैं। इससे यह संदेश गया है कि भविष्य में किसी भी महत्वपूर्ण विधायी कार्य में तकनीकी गलतियों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सदन के भीतर की यह रस्साकशी अब और रोचक मोड़ ले चुकी है।

जनता की नजरें सदन की अगली कार्यवाही पर
संसद के इस मानसून सत्र में मणिपुर हिंसा, महंगाई और अब यह अविश्वास प्रस्ताव—मुद्दों की लंबी फेहरिस्त है। स्पीकर के कड़े निर्देश के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विपक्ष अपने संशोधित प्रस्ताव के साथ कब वापसी करता है और सरकार इसका जवाब किस अंदाज में देती है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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