राष्ट्रगीत पर सरकार का ऐतिहासिक फैसला: अब ‘जन गण मन’ से पहले गूंजेंगे ‘वंदे मातरम’ के सभी 6 अंतरे, जानिए क्या हैं नए नियम
Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली। भारत सरकार ने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक युगांतकारी निर्णय लिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब सभी आधिकारिक और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान ही संवैधानिक गरिमा और प्रोटोकॉल प्रदान किया गया है। यह निर्णय न केवल इस कालजयी गीत के सम्मान को बढ़ाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को हमारे स्वतंत्रता संग्राम की वास्तविक विरासत से भी परिचित कराएगा।
अब 2 नहीं, गाए जाएंगे पूरे 6 अंतरे
इस ऐतिहासिक बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब तक जो ‘वंदे मातरम’ केवल दो अंतरे (छंदों) तक सीमित था, अब वह अपने मूल स्वरूप में वापस आएगा। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोहों में इस गीत के पूरे छह अंतरे बजाए या गाए जाएंगे। इसकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड तय की गई है। गौरतलब है कि 1937 में राजनीतिक और सांप्रदायिक तुष्टिकरण के चलते इस गीत के पिछले चार अंतरे हटा दिए गए थे, जिनमें भारत माता के विभिन्न रूपों का वर्णन था। अब गृह मंत्रालय के 10 पन्नों के नए प्रोटोकॉल ने उन सभी ऐतिहासिक विसंगतियों को दूर कर दिया है।
राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम: प्रोटोकॉल में बदलाव
नए नियमों के अनुसार, अब किसी भी सरकारी समारोह की शुरुआत में राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत किया जाएगा। यह क्रम अनिवार्य होगा। साथ ही, जब भी ‘वंदे मातरम’ का गायन या वादन होगा, वहां मौजूद सभी नागरिकों को ‘सावधान’ (Attention) की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह सम्मान बिल्कुल वैसा ही होगा जैसा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के लिए दिया जाता है।
किन अवसरों पर लागू होंगे ये नियम?
पद्म पुरस्कार व नागरिक सम्मान: नागरिक अलंकरण समारोहों में राष्ट्रगीत का गायन अनिवार्य होगा।
राष्ट्रपति व राज्यपाल का आगमन: राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों के आगमन और विदाई के समय, उनके संबोधन से पहले और बाद में अब छह छंदों वाला वंदे मातरम बजाया जाएगा।
ध्वजारोहण समारोह: राष्ट्रीय ध्वज फहराने के दौरान भी इस प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जाएगा।
शिक्षण संस्थान: देश के सभी स्कूलों में प्रार्थना सभा की शुरुआत अब राष्ट्रगीत के सामूहिक गायन से करने के निर्देश दिए गए हैं।
सिनेमा हॉलों के लिए नियम
गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यद्यपि स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में खड़े होना अनिवार्य है, लेकिन यदि ‘वंदे मातरम’ किसी फिल्म, डॉक्यूमेंट्री या न्यूज रील का हिस्सा है, तो दर्शकों के लिए खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा। हालांकि, सरकार ने नागरिकों से अपेक्षा की है कि वे राष्ट्रगीत की गरिमा को समझते हुए स्वैच्छिक सम्मान प्रकट करें।
इतिहास और विवाद का अंत
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों का सबसे बड़ा संबल था। ‘आनंदमठ’ उपन्यास से निकले इस गीत ने अंग्रेजों की नींव हिला दी थी। पूर्व में इसके चार छंदों पर इसलिए आपत्ति जताई गई थी क्योंकि उनमें देवी दुर्गा और लक्ष्मी का उल्लेख था। वर्तमान सरकार का तर्क है कि ‘वंदे मातरम’ भारत की सांस्कृतिक पहचान है और इसे किसी एक धर्म के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। इस फैसले के साथ ही राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत इसके अपमान पर सजा का प्रावधान भी और कड़ा कर दिया गया है। यह फैसला भारतीय गणतंत्र के 150वें ‘वंदे मातरम’ वर्षगांठ के उपलक्ष्य में लिया गया है, जो देश के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने का एक बड़ा कदम माना जा रहा है।






