संसद में महासंग्राम: क्या गिर जाएगी स्पीकर की कुर्सी? विपक्ष की घेराबंदी और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में इन दिनों एक ऐसा तूफान उठा है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। ताज़ा घटनाक्रम में, ‘इंडिया’ गठबंधन के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लाने की पूरी तैयारी कर ली है। यह कदम न केवल संसदीय इतिहास में विरल है, बल्कि इसने आगामी दिनों में सदन के भीतर एक बड़े राजनीतिक टकराव के संकेत दे दिए हैं।
क्यों उबला विपक्ष का गुस्सा?
इस भारी विरोध की जड़ें पिछले कुछ दिनों की संसदीय कार्यवाही में छिपी हैं। सूत्रों के मुताबिक, विपक्षी खेमे का सबसे बड़ा आरोप यह है कि सदन में ‘लोकतंत्र की आवाज’ को कुचला जा रहा है। कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों का कहना है कि सदन के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोका जा रहा है। मामला तब और बिगड़ गया जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक ‘अप्रकाशित’ किताब (Unpublished Memoir) के हवाले से चीन सीमा विवाद पर सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन स्पीकर ने उसे रिकॉर्ड पर लेने या पढ़ने की अनुमति नहीं दी। विपक्ष का आरोप है कि जहां एक ओर सत्ता पक्ष के सांसदों को विवादास्पद बयान देने की खुली छूट दी जाती है, वहीं विपक्षी नेताओं के माइक बंद कर दिए जाते हैं। कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने कड़े शब्दों में कहा, “सदन में विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है। यह लोकतंत्र के लिए काला अध्याय है।”
महिला सांसदों का अपमान और सुरक्षा का सवाल
विवाद का एक और बड़ा सिरा स्पीकर ओम बिरला के उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। स्पीकर ने सदन में कहा था कि उन्हें ऐसी खुफिया जानकारी मिली है कि कुछ विपक्षी महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़कर ‘अशोभनीय’ आचरण कर सकती हैं, जिसके कारण उन्होंने प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह दी थी। इस बयान ने आग में घी का काम किया। महिला सांसदों ने इसे अपने चरित्र और गरिमा पर हमला बताते हुए जमकर विरोध किया है।
सस्पेंशन की कार्रवाई और आर-पार की जंग
सदन में हुए हंगामे और कागजों को फाड़कर आसन की ओर फेंकने के आरोप में हाल ही में 8 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। इस निलंबन ने विपक्ष को एकजुट कर दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह स्पीकर की निष्पक्षता पर बड़ा सवालिया निशान है। अब विपक्ष ने मन बना लिया है कि वे बजट सत्र के दूसरे चरण में नियम 179 के तहत स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव लाएंगे। इसके लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य होता है, जिस पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
क्या कहता है गणित?
भले ही विपक्ष के पास स्पीकर को हटाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा (पूर्ण बहुमत) न हो, लेकिन यह प्रस्ताव लाकर वे सरकार और स्पीकर की कार्यप्रणाली को जनता की अदालत में कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह लड़ाई केवल एक पद की नहीं, बल्कि ‘संसदीय वर्चस्व’ और ‘बोलने की आजादी’ की प्रतीकात्मक लड़ाई बन चुकी है।






