इंसाफ की गुहार या सियासी संग्राम? जब ममता बनर्जी ने खुद संभाली अपनी पैरवी, जजों के सामने बयां किया ‘बंद दरवाजों का दर्द’
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संवाद 24 नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों में उस समय हलचल मच गई, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद एक वकील की भूमिका में नजर आईं। यह मामला साल 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान नंदीग्राम विधानसभा सीट के नतीजों से जुड़ा है, जहाँ ममता बनर्जी को सुवेंदु अधिकारी के हाथों मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। ममता बनर्जी ने इन नतीजों में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट में ‘इलेक्शन पिटीशन’ (चुनाव याचिका) दायर की थी। कल इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने अपनी लड़ाई किसी बड़े वकील के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद अपनी बात रखने का साहसिक फैसला किया।
अदालत में जब मुख्यमंत्री बनीं वकील
जस्टिस शम्पा सरकार की बेंच के सामने जब मुख्यमंत्री ने अपनी दलीलें शुरू कीं, तो वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया। उन्होंने अपनी हार को लेकर जो चुनावी गड़बड़ियां गिनाईं, उनमें मतगणना की प्रक्रिया और रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए। ममता बनर्जी ने कोर्ट से कहा कि वह यहां एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे उम्मीदवार के तौर पर आई हैं जिसकी लोकतांत्रिक जीत को प्रभावित किया गया। उनके बोलने का अंदाज वही पुराना जुझारू था, जिसने उन्हें बंगाल की सत्ता के शिखर तक पहुँचाया है।
‘न्याय की सिसकियाँ’ और ममता का दर्द
ममता बनर्जी ने अपनी दलीलों के दौरान एक बेहद प्रभावशाली टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “आज के समय में न्याय एक ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जहाँ वह खुद को असहाय महसूस कर रहा है। न्याय के दरवाजे खुले तो हैं, लेकिन उसके पीछे की सच्चाई रो रही है।” उनकी इस टिप्पणी को न केवल नंदीग्राम मामले से, बल्कि विपक्षी दलों और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उनके प्रशासन में किए जा रहे कथित हस्तक्षेप से भी जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि निष्पक्ष जांच और त्वरित न्याय की प्रक्रिया को कुछ विशेष ताकतों द्वारा प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, जिससे आम जनता का भरोसा टूट रहा है।
नंदीग्राम की वो हार और कानूनी जंग
बता दें कि नंदीग्राम सीट पर सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को मात्र 1956 वोटों के अंतर से हराया था। टीएमसी ने उसी समय दोबारा मतगणना (Recounting) की मांग की थी, जिसे चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया था। तब से यह मामला अदालत में लंबित है। ममता बनर्जी का खुद कोर्ट में खड़ा होना यह दर्शाता है कि वह नंदीग्राम की उस हार को अब भी अपनी प्रतिष्ठा और न्याय की लड़ाई मान रही हैं। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि इस मामले की सुनवाई पारदर्शी तरीके से हो ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।
ममता बनर्जी का खुद अपनी पैरवी करना जनता के बीच एक संदेश भेजने की कोशिश है कि वह अपने विरोधियों से डरती नहीं हैं। जहाँ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक इसे ‘दीदी’ का साहस बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे न्यायपालिका की सहानुभूति हासिल करने का एक तरीका करार दे रहे हैं।






