डिजिटल सन्नाटे में सिमटी तीन जिंदगी: गाजियाबाद ट्रिपल सुसाइड केस की वो अनकही सच्चाई

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संवाद 24 गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने आधुनिक परवरिश और बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। लोनी थाना क्षेत्र की ‘भरत सिटी’ सोसाइटी में तीन सगी बहनों—निशिका (16), प्राची (14) और पाखी (12)—ने नौवीं मंजिल से कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। शुरुआती अफवाहों में इसे ‘कोरियन गेम’ का टास्क बताया गया था, लेकिन पुलिस की गहरी तफ्तीश एक अलग ही कहानी बयां कर रही है।

आधी रात का खौफनाक फैसला
मंगलवार और बुधवार की दरम्यानी रात करीब 2:30 बजे, जब पूरा शहर सो रहा था, इन तीन बहनों ने एक साथ अपनी बालकनी से छलांग लगा दी। मौके पर पहुँचे सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें लहूलुहान हालत में देखा, तो सबके होश उड़ गए। अस्पताल ले जाने से पहले ही तीनों की मौत हो चुकी थी। मौके से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है, जिस पर सिर्फ ‘Mummy Papa Sorry’ लिखा था। यह छोटे से शब्द उन बड़े जख्मों की ओर इशारा कर रहे हैं जो ये बच्चियां अपने अंदर दबाए बैठी थीं।

क्या वाकई ‘गेम’ था जिम्मेदार?
घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया और कुछ गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि बच्चियां किसी ‘कोरियन डेथ गेम’ का शिकार हुई हैं। हालांकि, गाजियाबाद पुलिस ने इस थ्योरी को खारिज किया है। पुलिस की फॉरेंसिक टीम ने जब बच्चियों के मोबाइल और उनकी निजी डायरी ‘ट्रू लाइफ स्टोरी’ की जांच की, तो उसमें किसी भी विशेष गेम द्वारा उकसाने या टास्क दिए जाने के प्रमाण नहीं मिले।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह मामला किसी एक ‘गेम’ से ज्यादा ‘डिजिटल आइसोलेशन’ (आभासी एकांत) का है। कोरोना काल के बाद से बच्चियों ने स्कूल जाना छोड़ दिया था और वे पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कट चुकी थीं।

अकेलेपन का डिजिटल जाल
जांच में यह कड़वा सच सामने आया है कि तीनों बहनें पिछले दो वर्षों से घर के भीतर ही रहती थीं। पड़ोसियों और रिश्तेदारों से उनका मिलना-जुलना लगभग शून्य था। वे अपना पूरा समय मोबाइल फोन, वीडियो स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया पर बिताती थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चे वास्तविक सामाजिक जीवन से कटकर केवल स्क्रीन की दुनिया में खो जाते हैं, तो उनमें वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर धुंधला होने लगता है। परिजनों ने बताया कि वे अक्सर उन्हें टोकते थे, लेकिन मोबाइल की लत इस कदर हावी थी कि बच्चियों ने खुद को एक अदृश्य कमरे में बंद कर लिया था। यह घटना दर्शाती है कि स्क्रीन पर दिखने वाली चमक अक्सर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है।

अपने बच्चों से बात करें
गाजियाबाद की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि हर माता-पिता के लिए एक चेतावनी है। पुलिस अब विसरा रिपोर्ट और डिजिटल फुटप्रिंट्स की अंतिम जांच कर रही है ताकि यह समझा जा सके कि उस आखिरी रात आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें इस अंतिम कदम के लिए मजबूर किया।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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