150 वर्ष पहले लिखा गया वह गीत, जो आज भी भारत को जोड़ता है
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संवाद 24 डेस्क। वंदे मातरम् भारतीय राष्ट्रचेतना का वह अमर गीत है, जिसने लगभग 150 वर्षों से देशवासियों के मन में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाए रखी है। यह गीत न केवल स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा, बल्कि आज भी भारत की सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का आधार बना हुआ है।
वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्नीसवीं शताब्दी में की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में पहली बार प्रकाशित हुआ। उस समय भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और वंदे मातरम् ने जनता के भीतर आत्मसम्मान और एकता की भावना को मजबूती दी।
गीत की पंक्तियाँ भारत को सुजलां, सुफलां और शस्य-श्यामलां बताती हैं—एक ऐसी भूमि जो अपने नागरिकों का पोषण करती है और उन्हें जीवन देती है। इसमें प्रकृति, संस्कृति और मातृत्व का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो भारतीय दर्शन की विशेषता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् एक जनघोष बन गया था। आंदोलनों, सभाओं और जुलूसों में यह गीत साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक रहा। अंग्रेजी शासन के समय इस गीत को गाना अपने आप में प्रतिरोध का स्वर माना जाता था।
स्वतंत्र भारत में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया गया। आज भी यह गीत राष्ट्रीय पर्वों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी आयोजनों में पूरे सम्मान के साथ गाया जाता है। अपने 150 वर्षों की यात्रा में वंदे मातरम् ने समय के हर दौर में देशवासियों को जोड़ने का कार्य किया है। यह गीत आज भी एकता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रप्रेम की भावना को जीवंत बनाए हुए है।
“त्वं हि प्राणाः शरीरे”
— इस एक पंक्ति में पूरे राष्ट्र की आत्मा बसती है।
इसका अर्थ है कि
हमारी मातृभूमि ही हमारे प्राण हैं।
जैसे प्राण के बिना शरीर जीवित नहीं रह सकता,
वैसे ही देश के बिना हमारी पहचान अधूरी है।
यह धरती हमें जन्म देती है,
संस्कार देती है
और हर संकट में शक्ति देती है।
आज जब हम वंदे मातरम् कहते हैं,
तो यह केवल शब्द नहीं,
बल्कि संकल्प है—
देश की गरिमा, एकता और सम्मान
हमेशा बनाए रखने का।
वंदे मातरम्— एक गीत नहीं, बल्कि भारत की जीवित विरासत है।






