जर्मनी के दौरे पर ‘अरिहा शाह’ मामला भी चर्चा में: मोदी-मर्ज की बैठक में उठा संवेदनशील मुद्दा
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संवाद 24 दिल्ली।भारत और जर्मनी के बीच कूटनीति की बहुपक्षीय वार्ता के बीच एक छोटा नाम – अरिहा शाह – बड़ी बात बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ अहमदाबाद में हुई द्विपक्षीय मीटिंग में भारतीय बच्ची अरिहा शाह के मामले को उच्च स्तर पर उठाया, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है।
क्या है अरिहा का मामला?
अरिहा शाह एक भारतीय बच्ची है, जिसे जर्मन बाल सुरक्षा एजेंसियों ने 2021 में उसके माता-पिता से अलग कर लिया जब वह मात्र सात महीने की थी। जर्मन अधिकारियों ने उस समय शारीरिक दुर्व्यवहार के संदेह में उसे पालक देखभाल (फोस्टर केयर) में रखा। हालांकि बाद में आरोपों को पर्याप्त सबूत न मिलने पर खारिज कर दिया गया, बच्ची आज भी जर्मनी में फोस्टर केयर में रह रही है।
बच्ची अब लगभग पांच वर्ष की है और उसके माता-पिता चाहत रखते हैं कि वह भारतीय सांस्कृतिक, भाषा और पारिवारिक माहौल में रहे। भारत सरकार का तर्क है कि बच्ची के सर्वोत्तम हित में इसे मानवीय दृष्टिकोण से हल किया जाना चाहिए।
मोदी-मर्ज बैठक में उठा मुद्दा
प्रधानमंत्री मोदी ने जर्मन चांसलर मर्ज से मुलाकात के दौरान अरिहा के मामले पर गंभीर चिंता जताई। भारत ने दो पक्षों के बीच यह मुद्दा सिर्फ कूटनीतिक बातचीत का हिस्सा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का विषय बताया है। विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि भारत जर्मन अधिकारियों के साथ हर स्तर पर संवाद कर रहा है ताकि बच्ची की भलाई सुनिश्चित हो सके। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस मामले को “कानूनी मुद्दा” से बढ़ कर एक मानवीय चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। वह बच्ची को भारतीय पहचान से जुड़े रहने, उसकी भाषा तथा संस्कृति से परिचित रखने के उपायों पर भी जोर दे रहा है।
कूटनीति से मानवीय तक: भारत की भूमिका
भारत-जर्मनी के बीच संबंध व्यापार, सुरक्षा और प्रवास जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। अरिहा के मामले ने इस साझेदारी को मानवीय और भावनात्मक आयाम दिया है। मोदी-मर्ज की बैठक में अरिहा की स्थिति पर विचार करने का संदेश भी यह दर्शाता है कि दोनों देशों को सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आम इंसान और परिवार के दर्द को भी समझना चाहिए।
परिवार की अपील और सामाजिक भावना
अरिहा के माता-पिता और उसके परिवार के सदस्य लगातार जर्मन और भारतीय सरकार से बच्ची की वापसी और पुनर्संयोजन की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि बच्ची का पालन-पोषण उसके भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपरा के अनुरूप होना चाहिए; और इसका समाधान दोनों देशों के बीच समझौते से ही हो सकता है। यह मामला न सिर्फ एक राजनीतिक चर्चा विषय है, बल्कि एक छोटी बच्ची के भविष्य, उसकी पहचान और मानवाधिकार के प्रश्नों को भी सामने लाता है। अब देखना यह है कि आगे किस तरह से भारत और जर्मनी इस संवेदनशील मुद्दे को हल करते हैं और अरिहा की जिंदगी के लिए सबसे उपयुक्त रास्ता निर्धारित होता है।






