रेलवे में खत्म होगी ‘गुलामी की पहचान’: रेल कर्मचारियों के काले बंद गले कोट हटेंगे, रेल मंत्री का बड़ा ऐलान
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय रेलवे में अब अंग्रेजी दौर की एक और पहचान इतिहास बनने जा रही है। रेल मंत्री Ashwini Vaishnaw ने शुक्रवार को बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि रेलवे कर्मचारियों की औपचारिक वर्दी में शामिल काले रंग का बंदगले वाला कोट अब नहीं पहना जाएगा। उन्होंने इसे गुलामी की मानसिकता से जुड़ा प्रतीक बताते हुए हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
रेल मंत्री ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि देश को केवल ढांचागत बदलाव नहीं, बल्कि सोच और प्रतीकों के स्तर पर भी औपनिवेशिक विरासत से बाहर निकलना होगा।
‘गुलामी की मानसिकता से भी आज़ादी जरूरी’
रेल मंत्री ने कहा, “हमें हर उस चीज को हटाना है जो गुलामी की निशानी है। यह सिर्फ इमारतों या कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे पहनावे और कार्यशैली में भी दिखाई देता है। अंग्रेजों के समय शुरू किया गया बंदगले वाला काला सूट अब रेलवे की फॉर्मल ड्रेस नहीं रहेगा।”
यह फैसला ऐसे समय आया है जब Indian Railways बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण से गुजर रही है—चाहे वह वंदे भारत ट्रेनों का विस्तार हो, देश की पहली स्लीपर वंदे भारत की तैयारी, या फिर अमृत भारत योजना के तहत स्टेशनों का पुनर्विकास।
पुरानी परंपराओं की हो रही समीक्षा
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह कदम केवल रेलवे तक सीमित नहीं रहेगा। केंद्र सरकार ब्रिटिश काल से चली आ रही उन परंपराओं की पहचान कर रही है, जो आज के भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हैं। इसमें विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में पहने जाने वाले गाउन और टोपी, तथा औपचारिक अवसरों पर अधिकारियों द्वारा पहना जाने वाला बंदगले का कोट भी शामिल है।
सूत्रों का कहना है कि Narendra Modi ने सभी मंत्रालयों और वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे ऐसी प्रथाओं की पहचान करें और उनकी जगह भारतीय संस्कृति व जलवायु के अनुकूल विकल्प सुझाएं।
गर्म जलवायु में अनुपयुक्त पहनावा
अधिकारियों का तर्क है कि काले कोट और गाउन जैसे भारी परिधान भारत की गर्म और आर्द्र जलवायु के लिए व्यावहारिक नहीं हैं। कई शिक्षण संस्थानों में छात्र और शिक्षक पहले ही दीक्षांत समारोहों में इस पहनावे के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं, जिसके बाद कुछ विश्वविद्यालयों ने पारंपरिक भारतीय परिधान अपनाने शुरू किए हैं।
कानूनी पेशे की वर्दी पर भी चर्चा संभव
सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में वकीलों द्वारा पहने जाने वाले काले कोट और गाउन पर भी पुनर्विचार हो सकता है। यह व्यवस्था एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत चली आ रही है, जिसकी जड़ें ब्रिटिश कानूनी प्रणाली में हैं। हालांकि, इस दिशा में अभी कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है।
बदलते रेलवे की नई पहचान
रेल कर्मचारियों की वर्दी में प्रस्तावित बदलाव को भारतीय रेलवे की बदलती पहचान के रूप में देखा जा रहा है—जहां आधुनिक तकनीक, स्वदेशी सोच और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को प्राथमिकता दी जा रही है।






