सूर्य के भाव से खुलता है आत्मविश्वास, स्वास्थ्य और सफलता का रहस्य। ज्योतिष में सूर्य के भाव बदलते ही क्यों बदल जाता है पूरा जीवन!
Share your love

संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मा, तेज, अधिकार, प्रतिष्ठा और जीवन-ऊर्जा का अधिष्ठाता माना गया है। कुंडली के बारहों भावों में इसका स्थान व्यक्ति के व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, चरित्र और सामाजिक प्रभाव को गहराई से प्रभावित करता है। आइए जानें किस भाव में सूर्य क्या परिणाम देता है।
- प्रथम भाव (लग्न)
सूर्य यहाँ स्वाभिमान, नेतृत्व, तेज और दृढ़ व्यक्तित्व देता है। व्यक्ति प्रभावशाली और आत्मविश्वासी बनता है। - द्वितीय भाव (धन भाव)
आर्थिक स्थिरता, वाणी में प्रभाव और परिवार में सम्मान बढ़ाता है। व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। - तृतीय भाव (पराक्रम भाव)
साहस, निर्णय क्षमता और संघर्ष करने की शक्ति बढ़ाता है। भाई-बहनों में नेतृत्व भूमिका निभाता है। - चतुर्थ भाव (सुख भाव)
स्थायी संपत्ति, माता से स्नेह, घर-परिवार में सम्मान। भूमि, भवन और वाहन में लाभ। - पंचम भाव (विद्या भाव)
तेजस्विता, उच्च शिक्षा, नेतृत्व क्षमता और संतान पक्ष में सकारात्मक प्रभाव। - षष्ठम भाव (रोग–शत्रु भाव)
यहाँ सूर्य संघर्ष, सेवा, प्रतियोगिता में विजय देता है लेकिन स्वास्थ्य पर थोड़ा ध्यान रखना पड़ता है। - सप्तम भाव (विवाह भाव)
अहंकार टकराव ला सकता है। जीवनसाथी पर अधिकारभाव बढ़ता है। संतुलन आवश्यक। - अष्टम भाव (आयु भाव)
गुप्त चिंताएँ, परिवर्तन, शोध और रहस्यमयी शक्तियों की ओर रुझान। अचानक स्थितियों का योग। - नवम भाव (भाग्य भाव)
भाग्य उदय, धर्म, पुण्य कार्य और गुरुजनों का आशीर्वाद। यात्राओं का योग। - दशम भाव (कर्म भाव)
सरकारी कार्य, प्रशासन, पद-प्रतिष्ठा और करियर में उन्नति। सूर्य यहाँ अत्यंत शक्तिशाली फल देता है। - एकादश भाव (लाभ भाव)
सरकार, बड़े लोगों, मित्रों और समाज से लाभ। बड़े लक्ष्य पूरे होते हैं। - द्वादश भाव (व्यय भाव)
विदेश यात्रा, आध्यात्मिक रुचि, परोपकार। खर्च बढ़ सकता है परंतु अंततः मन शांति प्राप्त करता है।


