भद्रा से किंस्तुघ्न तक, करण तय करते हैं आपके दैनिक जीवन के परिणाम
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। भारतीय समय-विज्ञान (हिंदू ज्योतिष) में तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। तिथि जहाँ पूरे दिन की ऊर्जा का स्वरूप बताती है, वहीं करण दिन में होने वाले छोटे–छोटे कार्यों का मनोवैज्ञानिक एवं फलदायक प्रभाव निर्धारित करता है। शास्त्रीय भाषा में –
“क्षणेषु फलनिर्णायकः करणः”
अर्थात् छोटे कर्मों का फल करण से निर्धारित होता है।
करण क्या है?
तिथि को दो समान भागों में बाँटने से जो 60-60 घटी (या लगभग ढाई घंटे) के कालखंड बनते हैं, वे करण कहलाते हैं। एक चंद्र मास में 60 करण होते हैं, और प्रत्येक करण का अपना स्वभाव, गुण और फल माना जाता है।
करण बताता है –
आज किस समय कौन-सा छोटा कर्म सफल होगा
किस अवधि में व्यापार, संवाद, यात्रा, लेन-देन, समझौता अनुकूल है, किस कालांश में विवाद, भूल या असफलता संभव है। इसीलिए पंचांग में तिथि–वार–नक्षत्र–योग के साथ करण का उल्लेख अनिवार्य माना गया है।
करण के प्रकार : चैतन्य और स्थिर
11 प्रकार के करण बताए गए हैं, जिन्हें दो श्रेणियों में रखा गया है
- चैतन्य करण (जो बार-बार आते हैं)
✔ बव – आरम्भ, सौदा, यात्रा के लिए शुभ
✔ बालव – शिक्षा, अध्ययन, लेखन, समझौता
✔ कौलव – व्यापार, खरीद–फरोख्त, हल्की यात्रा
✔ तैतिल – वित्त, लेन–देन, लाभ-संबंधी कार्य
✔ गर – परिवार, गृहकार्य, कृषि, सामाजिक कार्य
✔ वणिज – व्यापार, अनुबंध, लेन-देन शुभ
✔ विष्टि (भद्रा) – अशुभ; झगड़ा, विवाद, हानि;
शास्त्र: “भद्रा-अवस्थायां कार्यं न कुर्यात्” - स्थिर करण (मास में केवल एक बार)
✔ शकुनि – गुप्त कार्य, रणनीति, विचार-विमर्श
✔ चतुष्पद – पशु-कार्य, कृषि, संपत्ति
✔ नाग – कढ़ाई, दृढ़ता, संरक्षण, बाधा-निवारण
✔ किंस्तुघ्न – सर्वसिद्धिक, अत्यंत शुभ;
नए कार्य, संकल्प, यात्रा अत्यंत अनुकूल
करण का शास्त्रीय आधार
बृहद् पाराशर होरा शास्त्र और नारदीय ज्योतिष दोनों कहते हैं
करनेश्वर देवता का प्रभाव सूक्ष्म कर्मों पर तुरंत पड़ता है।
श्लोक (पुराणों में दिया गया):
“करणे कार्यसिद्धिश्च, करणैर्विघ्ननाशनम्।”
अर्थ : करण उपयुक्त हो तो छोटे कार्य निश्चित सिद्ध होते हैं।
दैनिक जीवन में करण क्यों आवश्यक है?
तिथि दिन का चरित्र बताती है, परन्तु कौन-सा कार्य दिन में किस समय करना है, इसका निर्णय करण से होता है। इसका प्रभाव –
व्यापारिक निर्णय
फ़ोन/संवाद
लेन-देन
यात्रा आरंभ
नया काम
विवाद-निपटान
छोटी पूजा, हवन
इन सभी पर तुरंत दिखाई देता है।
इसीलिए ज्योतिष में कहा गया है कि “योग दिन को दिशा देता है, पर करण परिणाम तय करता है।”
वैज्ञानिक तर्क –
करण चंद्रमा की गति के सूक्ष्म विभाजन पर आधारित है। चंद्रमा
✔ मानव मन
✔ निर्णय शक्ति
✔ भावनात्मक स्थिरता
✔ प्रतीक्रिया पैटर्न
पर सीधे प्रभाव डालता है।
इसलिए दिन को 60-60 घटी में बाँटकर यह समझना कि
“किस समय कौन-सा निर्णय मनोवैज्ञानिक रूप से स्थिर पड़ेगा”
एक सटीक वैज्ञानिक अवधारणा भी है।
सांस्कृतिक महत्त्व –
भारतीय पंचांग में
विवाह
गृहप्रवेश
यात्रा
लेखन
लेन-देन
खरीद–फरोख्त
इन सबके लिए करण को विशेष महत्व दिया गया है।
विशेषकर “विष्टि करण (भद्रा)” में शादियाँ, मांगलिक कार्य, मंदिर-प्रवेश, नए शुभारंभ वर्जित माने गए हैं।






