सुप्रीम कोर्ट में जूता कांड के बाद सख्ती: अदालतों की गरिमा बचाने को नई गाइडलाइंस की तैयारी
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संवाद 24 नई दिल्ली। कुछ महीने पहले देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई के दौरान हुई एक असामान्य और निंदनीय घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया था। अदालत कक्ष में उस समय हड़कंप मच गया, जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) की ओर एक वकील द्वारा जूता फेंकने की कोशिश की गई। यह घटना न केवल अदालत की गरिमा के खिलाफ मानी गई, बल्कि इससे न्यायिक संस्थानों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो गए।
यह घटना 6 अक्टूबर 2025 को उस समय हुई, जब सुप्रीम कोर्ट में एक संवेदनशील मामले की सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान अचानक एक सीनियर वकील राकेश किशोर ने आपा खोते हुए मुख्य न्यायाधीश की ओर जूता उछालने का प्रयास किया। हालांकि सुरक्षाकर्मियों और अदालत में मौजूद अन्य लोगों की तत्परता से कोई शारीरिक क्षति नहीं हुई, लेकिन इस हरकत ने अदालत की कार्यवाही को कुछ समय के लिए बाधित कर दिया।
घटना के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित वकील के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी भी परिस्थिति में इस तरह का आचरण स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह न केवल न्यायाधीश के सम्मान पर हमला है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य भी है।
इस प्रकरण ने यह सवाल भी उठाया कि क्या अदालत परिसरों में मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था और आचार संहिता ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं और न्यायिक विशेषज्ञों ने भी इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि असहमति जताने के लिए अदालत के भीतर हिंसक या अपमानजनक व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों के खिलाफ है।
अब इस घटना के कुछ महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह अदालत परिसरों में अनुशासन और सुरक्षा को लेकर स्पष्ट एवं सख्त गाइडलाइंस तैयार करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अदालत का मानना है कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित ढांचा भी आवश्यक है।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित गाइडलाइंस में अदालत कक्ष में वकीलों और पक्षकारों के आचरण, सुरक्षा जांच, आपात स्थिति से निपटने की प्रक्रिया और कोर्ट स्टाफ की भूमिका को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सकता है। इसके साथ ही बार काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की जिम्मेदारियों पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है, ताकि वकीलों के आचरण पर आत्मानुशासन को बढ़ावा दिया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कई पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत केवल कानून का मंच नहीं, बल्कि लोकतंत्र का नैतिक स्तंभ भी है। ऐसे में यदि अदालत के भीतर ही अनुशासन भंग होता है, तो यह समाज के लिए एक गलत संदेश देता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि असहमति और आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति सभ्य और संवैधानिक दायरे में ही होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से भी पहले इस घटना पर खेद व्यक्त किया गया था और कहा गया था कि वकीलों का ऐसा व्यवहार पूरे पेशे की छवि को नुकसान पहुंचाता है। बार के वरिष्ठ सदस्यों ने आश्वासन दिया था कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए आंतरिक स्तर पर भी कड़े कदम उठाए जाएंगे।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विस्तृत गाइडलाइंस जारी की जाती हैं, तो यह न केवल शीर्ष अदालत बल्कि देश की सभी निचली अदालतों के लिए भी एक मिसाल बनेगा। इससे अदालतों में कामकाज का माहौल अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और व्यवस्थित हो सकेगा।
कुल मिलाकर, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश की यह घटना एक चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट का अब इस दिशा में गाइडलाइंस पर विचार करना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका अपनी गरिमा, सुरक्षा और संस्थागत सम्मान से किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है। आने वाले समय में अदालत का यह कदम न्यायिक व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।






