संविधान कोई जड़ स्मारक नहीं, उसे जीवंत आप ही बनाएंगे: CJI सूर्यकांत का युवाओं को संदेश
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संवाद 24 पटियाला। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने युवा कानून स्नातकों को संबोधित करते हुए कहा कि संविधान किसी पत्थर पर उकेरा गया स्थिर स्मारक नहीं है, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे हर पीढ़ी अपने कर्म और मूल्यों से जीवन देती है। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे खुद को केवल “मामलों के निर्माता” तक सीमित न रखें, बल्कि “राष्ट्र निर्माता” के रूप में अपनी भूमिका को समझें।
मंगलवार को पंजाब के पटियाला स्थित राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के सातवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि हर पीढ़ी को देश और गणतंत्र एक अपूर्ण अवस्था में विरासत में मिलता है। उसे यह तय करना होता है कि वह इसे आगे किस दिशा में ले जाएगी। उन्होंने कहा कि संविधान एक असाधारण खाका है—न्यायालय इसकी व्याख्या करते हैं, संस्थाएं इसे ढांचा देती हैं, लेकिन उसे जीवंत स्वरूप देने का कार्य अंततः नागरिकों और विशेषकर युवाओं के हाथ में होता है।
अपने संबोधन में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब वे इतने ऊर्जावान और युवा श्रोताओं को देखते हैं, तो उन्हें यह विश्वास होता है कि अधिकांश छात्र कानून के पेशे में जाएंगे। उन्होंने माना कि कानून की पढ़ाई करते समय छात्रों ने खुद को बड़े मुकदमों में बहस करते, जटिल अनुबंध तैयार करते या भविष्य में संवैधानिक पीठों के समक्ष खड़े होते हुए देखा होगा, जो कि पूरी तरह प्रशंसनीय आकांक्षाएं हैं।
हालांकि, उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे एक गहरे और अधिक स्थायी प्रश्न पर भी विचार करें—भारत जैसे देश में, उसके इतिहास के इस मोड़ पर, एक वकील की असली भूमिका क्या है। CJI ने कहा कि अक्सर कानूनी पेशे को केवल मुकदमे जीतने, प्रक्रियाओं में दक्षता और बिल योग्य घंटों तक सीमित कर दिया जाता है, जिससे अच्छे पेशेवर तो बनते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि राष्ट्र निर्माता भी तैयार हों।
जस्टिस सूर्यकांत ने “मामला निर्माता” और “राष्ट्र निर्माता” के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि मामला निर्माता केवल वर्तमान विवाद पर ध्यान देता है, जबकि राष्ट्र निर्माता इस बात को लेकर चिंतित रहता है कि आज का विवाद कल के समाज को कैसे प्रभावित करेगा। उनके अनुसार, कानून का असली उद्देश्य केवल न्याय दिलाना ही नहीं, बल्कि समाज को बेहतर दिशा देना भी है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस राजेश बिंदल को ‘डॉक्टर ऑफ लॉज़’ की मानद उपाधि प्रदान की गई। समारोह में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू भी उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के कुलपति जय शंकर सिंह ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
CJI सूर्यकांत का यह संबोधन युवाओं के लिए न सिर्फ एक प्रेरक संदेश रहा, बल्कि कानून को समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का एक स्पष्ट दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है।






