वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘संदिग्ध नागरिकता’ पर कितने हटे, चुनाव आयोग से मांगा जवाब
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संवाद 24 नई दिल्ली। वोटर लिस्ट की शुद्धता को लेकर चल रहे विवाद के बीच Supreme Court of India ने चुनाव आयोग से बड़ा और सीधा सवाल पूछा है। शीर्ष अदालत ने विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन–SIR) अभियान के दौरान ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए मतदाताओं की संख्या स्पष्ट करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश Justice Suryakant और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव आयोग ने अब तक नाम हटाने की केवल तीन श्रेणियां बताई हैं—मृत्यु, दोहराव (डुप्लीकेशन) और मतदाता का स्थानांतरण। पीठ ने सवाल उठाया कि क्या ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर भी नाम हटाने की कोई अलग श्रेणी है।
चुनाव आयोग के अधिकारों पर सवाल
चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता Rakesh Dwivedi ने अदालत को बताया कि वह इस मुद्दे पर आयोग से निर्देश लेकर विस्तृत जवाब देंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग केवल वोटर रजिस्ट्रेशन तक ही नागरिकता की जांच कर सकता है, न कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने या देश से बाहर भेजने का अधिकार रखता है।
नागरिकता तय करने का अधिकार किसका
याचिकाकर्ता एनजीओ Association for Democratic Reforms की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan ने दलील दी कि मतदान के लिए नागरिकता अनिवार्य है, इसमें कोई विवाद नहीं है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार है या नहीं।
हटाए गए नाम सार्वजनिक करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India से कहा कि केरल में SIR प्रक्रिया के बाद जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें सार्वजनिक किया जाए। अदालत का कहना था कि इससे प्रभावित मतदाता समय रहते आपत्ति दर्ज करा सकेंगे।
इसके साथ ही, अदालत ने आयोग से हटाए गए नामों के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने की समयसीमा को दो सप्ताह तक बढ़ाने पर भी विचार करने को कहा। चुनाव आयोग के वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि इस मांग पर विचार किया जाएगा।
केरल SIR प्रक्रिया पर सुनवाई जारी
शीर्ष अदालत केरल में कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही है। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि मतदाता सूची से नाम हटाने जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।
इस मामले में अगली सुनवाई में चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या ‘संदिग्ध नागरिकता’ वास्तव में वोटर लिस्ट से नाम हटाने का आधार बनी है और यदि हां, तो कितने मतदाता इससे प्रभावित हुए हैं।






