“भावुक तर्क या सार्वजनिक सुरक्षा? आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश”
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संवाद 24 डेस्क। भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने हाल ही में एक अहम सुनवाई के दौरान फिल्म अभिनेत्री और पशु-अधिकार समर्थक शर्मिला टैगोर के दावों पर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने उनकी तर्कशक्ति को “वास्तविकता से पूरी तरह अलग” बताते हुए आवारा कुत्तों के प्रबंधन पर दिए गए उनके सुझावों को खंडित किया। यह टिप्पणी विशेष रूप से AIIMS (ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़) परिसर में एक कुत्ते का उदाहरण पेश करने के बाद सुनवाई में आई, जिसके बारे में न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार की सोच “यथार्थ से हटकर” है।
इस बयान ने देश के सामाजिक, कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर आवारा कुत्तों के व्यवस्थित प्रबंधन के विषय पर फिर से बहस को उभारा है, एक बहस जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार तेज़ होती जा रही है।
पूरे देश में आवारा कुत्तों की समस्या, पृष्ठभूमि और गंभीरता
भारत में आवारा कुत्तों की संख्या करोड़ों में है और ये कुत्ते सार्वजनिक स्थलों बाज़ार, सड़कों, अस्पतालों, विद्यालयों और रेलवे स्टेशनों सहित में दृष्टिगोचर होते हैं। देश में रेबीज़ (Rabies) और कुत्तों द्वारा काटे जाने के मामले गंभीर चिंता के विषय रहे हैं, और कई बार ये जानलेवा भी साबित हुए हैं। कई YouTube और सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कुत्तों के अचानक हमलों के दृश्य देखे गए हैं, जिनमें छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग भी प्रभावित हुए हैं, यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान रेखांकित किया।
पिछले वर्षों में अदालत और राज्यों की सरकारी निकायों के बीच आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर कई विवाद हुए हैं। कुछ आदेशों में सख़्ती के साथ विशिष्ट स्थानों से कुत्तों को हटाने और उनकी नसबंदी, टीकाकरण और पुनर्वास के निर्देश शामिल थे, जबकि पशु-अधिकार संगठनों का कहना रहा कि पारंपरिक Animal Birth Control (ABC) Rules, 2023 को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
शर्मिला टैगोर के तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया
शर्मिला टैगोर की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि आवारा कुत्तों के मुद्दे के लिए “एक समान समाधान” नहीं हो सकता और इसके विविध समाधान हो सकते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर AIIMS परिसर में वर्षों से मौजूद एक सौम्य कुत्ते ‘Goldie’ का हवाला दिया, यह तर्क देते हुए कि सभी कुत्ते खतरनाक नहीं होते और कुछ को “सौहार्दपूर्ण तौर पर सुरक्षित” माना जा सकता है।
इस पर कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्राथमिकता है। बेंच ने कहा: “आप वास्तविकता से पूरी तरह अलग हैं। अस्पतालों जैसे संवेदनशील स्थानों में इन कुत्तों का महिमामंडन न करें।” – सुप्रीम कोर्ट।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि सड़क पर रहने वाले कुत्तों में टिक्स और अन्य स्वास्थ्य जोखिम होने की संभावना अधिक होती है, जो अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थलों पर गंभीर परिणाम दे सकते हैं।
टैगोर के एक अन्य सुझाव पर, जहां उनके वकील ने कुत्तों के व्यवहार के आधार पर रंग-कोडेड कॉलर जैसे अंतरराष्ट्रीय मॉडल (जॉर्जिया, आर्मेनिया आदि) के विचार दिए थे, कोर्ट ने उनसे पूछा कि “उन देशों की जनसंख्या क्या है?” और बताया कि इस तरह के मॉडल को भारत में लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
कोर्ट की सुनवाई में अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केवल टैगोर के तर्कों की आलोचना ही नहीं की, बल्कि आवारा कुत्तों के मुद्दे के व्यापक सार्वजनिक आयामों पर भी गंभीर विचार प्रस्तुत किए:
कोर्ट ने पूछा कि क्या अस्पताल, अदालत या स्कूल जैसे सार्वजनिक स्थानों में कुत्तों की उपस्थिति उचित है, जब वहां बहुत से असुरक्षित स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
एक टिप्पणी में यह भी कहा गया कि कुत्ते मनुष्यों के डर को पहचानते हैं, और इस डर के आधार पर ही कई बार वे आक्रमण कर सकते हैं — जिसका प्रभाव छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक देखा गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि मामला केवल मानव बनाम कुत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संवैधानिक अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और नीति ढांचे के बीच संतुलन को परखा जाना चाहिए।
इन व्यापक टिप्पणियों ने यह संकेत दिया कि अदालत इस विषय पर साधारण भावनाओं या सरलीकृत समाधान से आगे बढ़कर संतुलित, वैज्ञानिक और व्यावहारिक निर्णय चाहती है।
विधिक ढांचा, विवाद और व्यापक बहस
भारत में आवारा कुत्तों का मामला केवल कुत्तों और इंसानों के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह विडंबना, नैतिकता, पब्लिक हेल्थ, विधिक अधिकार और प्रशासनिक जिम्मेदारी जैसे जटिल सवाल खड़े करता है।
पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की बढ़ती घटना दर, उनके काटने से हो रही मौतों और प्रशासन की अपर्याप्तता पर चिंता जताई है, और सार्वजनिक स्थलों से उनके हटाने के दिशा-निर्देश भी जारी किये हैं। इन निर्देशों में ऐसी जगहों से उन्हें हटाना शामिल है जहाँ जोखिम अधिक होता है — जैसे स्कूल, अस्पताल, बस डिपो और रेलवे स्टेशन — ताकि नागरिकों के सुरक्षा अधिकार को संरक्षित किया जा सके।
वहीं, पशु-अधिकार संगठनों का कहना है कि इतिहास में की गई ABC प्रोग्राम ने अत्यधिक हिंसा से बचते हुए समाधान प्रस्तुत किया है और उसका उपेक्षा नहीं किया जाना चाहिए। अतः वे अदालत के सख्त निर्देशों को “अमानवीय” और “अनवैज्ञानिक” भी बताते रहे हैं।
यथार्थ, नीति और समाधान की दिशा
सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा बयान ने स्पष्ट किया है कि भारत में आवारा कुत्तों की समस्या सिर्फ एक पशु-पक्षधर मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका समाधान सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और यथार्थवादी नीति निर्माण के बीच संतुलन स्थापित करने में निहित है। यह बहस भावनाओं के बजाय तथ्यों, वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक नीतियों पर आधारित होनी चाहिए।
शर्मिला टैगोर जैसे सामाजिक हस्तियों की भागीदारी इस विषय को जन-चर्चा में लाती है, लेकिन न्यायालय की टिप्पणी यह याद दिलाती है कि समाधान भावनात्मक तर्कों से नहीं, बल्कि यथार्थ और व्यापक नीतिगत समझ से ही निकाले जा सकते हैं।
सार्वभौमिक और समग्र समाधान उसी समय संभव होगा जब नीति-निर्माता, न्यायपालिका, स्थानीय प्रशासन और समाज सार्वजनिक सुरक्षा, पशु कल्याण और दीर्घकालिक स्थायित्व को एक साथ देखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाएँ।






