भारतीय न्याय संहिता में महिला की गिरफ्तारी: अधिकार, प्रतिबंध और न्यायिक दृष्टिकोण
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संवाद 24 कृष्णकांत महाजन एडवोकेट। भारतीय न्याय संहिता (BNS) और संबंधित न्यायिक व्याख्याएँ यह मानती हैं कि पुलिस को किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार तब मिलता है जब उस पर गंभीर आरोप या संदेह हो। इस अधिकार का स्रोत BNS की सामान्य धाराओं में निहित है, जिसके अन्तर्गत पुलिस को बिना वारंट के किसी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने की अनुमति होती है जो किसी संज्ञेय अपराध में संलिप्त है या जिस पर अपराध करने का विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं। यह अधिकार स्त्री या पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है, क्योंकि भारतीय कानून सभी व्यक्तियों को व्यक्ति-व्यक्तिगत प्रक्रियात्मक सुरक्षा देता है।
- गिरफ्तारी का सामान्य अधिकार (General Power of Arrest)
BNS के तहत पुलिस अधिकारी को अधिकारित किया गया है कि वह संज्ञेय अपराधों में संदेह होने पर बिना वारंट के भी गिरफ्तारी कर सकता है। यह शक्ति सार्वजनिक सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए राज्य को प्रदान की जाती है। BNS की धारा 35 में इसके विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी व्यक्ति से उसके “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” को छीना नहीं जा सकता जब तक कि विधि द्वारा स्थापित अनुमति नियमों का पालन न किया गया हो। - महिलाओं पर आरोप और गिरफ्तारी, समान अधिकार और प्रक्रियात्मक सुरक्षा
भारतीय कानून में महिला पर आरोप लगना पुलिस को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है, वैसे ही जैसे पुरुषों पर। यहाँ कोई भेद यह नहीं है कि महिला अपराधी को पुलिस गिरफ्तार ही नहीं कर सकती। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया सम्मानजनक, संवेदनशील और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप हो, न कि किसी के आधार पर आत्मसात ज्यादा सुरक्षा देना या कानून का दोहरा मानक अपनाना। इस दिशा में BNS ने कुछ विशिष्ट सुरक्षा उपाय और निर्देश जोड़े हैं, जिनका मूल उद्देश्य महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। - BNS धारा 43(5) – रात में गिरफ्तारी पर प्रतिबंध – BNS की धारा 43(5) में स्पष्ट कहा गया है कि “साधारण परिस्थितियों में किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जाएगा”। इसका वाक्यांश यही है: “Save in exceptional circumstances, no woman shall be arrested after sunset and before sunrise…” यानी विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, अदालत ने यह प्रावधान बनाया कि रात की उम्र में महिला की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। यह प्रावधान इसलिए डाला गया था ताकि महिलाओं के साथ अत्यधिक जबरदस्ती, डराने-धमकाने और अवमानना-जनक व्यवहार के जोखिम को कम किया जा सके, और रात के समय में उनकी गरिमा व सुरक्षा की अतिरिक्त रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- “विशेष परिस्थितियाँ” (Exceptional Circumstances) अर्थ और आवश्यकताएँ
धारा 43(5) में “विशेष परिस्थितियाँ” का मानक निर्दिष्ट नहीं है, और यही एक कानूनी विवाद का विषय रहा है। “विशेष परिस्थितियाँ” का तात्पर्य उन मामलों से है जहाँ अपराध गंभीर है, भगोड़ा बनने की आशंका हो, या मामले की संवेदनशीलता ऐसी हो कि रात को तुरंत कार्रवाई करना अपरिहार्य हो। इस स्थिति में पुलिस प्राथमिक रूप से महिला पुलिस अधिकारी को कार्रवाई के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास करेगी, या न हो पाने पर उचित कारणों का लेखा-जोखा तैयार करेगी। अधिकारियों को न्यायिक मजिस्ट्रेट से पूर्व लिखित अनुमति लेना चाहिए यदि उन्हें समझ में आये कि रात में गिरफ्तारी अपरिहार्य है। यह अनुमति प्रभावी रूप से पुलिस को यह दिखाती है कि कार्रवाई आवश्यक थी और कानून की आवश्यकता को समझते हुए पुलिस ने कदम उठाया। - महिला पुलिस अधिकारी की उपस्थिति क्या अनिवार्य है?
कई कानूनी गाइडलाइन और व्याख्याएँ यही कहती हैं कि जहाँ तक संभव हो, महिला की गिरफ्तारी महिला पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में होनी चाहिए। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिला को बुरे व्यवहार का सामना न करना पड़े, और उसकी गरिमा तथा संवैधानिक अधिकारो की रक्षा हो। हालाँकि, कानून यह नहीं कहता कि केवल महिला पुलिस अधिकारी ही महिला को गिरफ्तार कर सकती है। यह एक मिथक है। वास्तविकता यह है कि कोई भी अधिकारी पुरुष या महिला, महिला को गिरफ्तार कर सकता है, बशर्ते कानून के दिशा-निर्देश का होना आवश्यक रूप से अनुपालन किया गया हो और महिला पुलिस अधिकारी के अनुपस्थिति का कारण स्पष्ट और न्यायोचित हो। - रात में गिरफ्तारी के संदर्भ में न्यायालयों के विचार
कुछ उच्च न्यायालयों ने सरकार की निर्देशात्मक धारा 43(5) को “डायरेक्टरी” (निर्देशकात्मक) माना है, जिसका उल्लंघन अपने आप में गिरफ्तारी को अवैध नहीं बनाता मगर पुलिस अधिकारी को इसका स्पष्टीकरण देना आवश्यक है। इसमें यह समझा गया है कि पुलिस का कर्तव्य भी यह है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता हो सकती है और मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो। वहीं दूसरी ओर, कई मामलों में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि रात में बिना आवश्यक प्रक्रिया पालन के महिला की गिरफ्तारी की जाती है और धारा 43(5) का उल्लंघन हुआ तो उसे अवैध माना जा सकता है। ऐसे मामलों में अदालत ने स्थगन या जमानत देने के समय निर्णय लिया है कि लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखना आवश्यक है, पर प्रक्रिया का उल्लंघन संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गलत और अवैध है। - गिरफ्तारी की प्रक्रिया में बाध्यकारी विकल्प और संवैधानिक संरक्षण
किसी भी गिरफ्तारी में, चाहे वह महिला हो या पुरुष, पुलिस को निम्न प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है:
- गिरफ्तारी का कारण स्पष्ट रूप से बताना।
- मौखिक सूचना के अलावा, जहाँ आवश्यक हो, लिखित सूचना देना।
- संबंधित व्यक्ति को उसके परिवार/दोस्त को सूचना देने का अवसर देना।
- यदि हिरासत में रखना आवश्यक हो, तो 24-घंटे से अधिक
हिरासत में न रखना बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति।
गिरफ्तारी के दौरान गरिमा और मौलिक अधिकारों का संरक्षण।
इन प्रक्रियाओं का उल्लंघन केवल महिला के मामले में ही नहीं, सभी मामलों में व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना जाता है।
संतुलन: सुरक्षा बनाम प्रवर्तन
भारतीय कानून महिलाओं को उनके स्वतंत्र और समान नागरिक अधिकार देता है। पुलिस को किसी महिला पर गंभीर आरोप होने पर उसे गिरफ्तार करने का अधिकार है, बशर्ते कि वह कानून के दिशा-निर्देशों, संवैधानिक प्रक्रियाओं तथा सम्मानजनक संवेदनशीलता का पालन करे। BNS की धारा 43(5) में रात में गिरफ्तारी पर विशेष प्रतिबंध इसलिए रखा गया है ताकि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा बनी रहे। यह कानून का सुधारात्मक दिशा-निर्देश है, जिसका उद्देश्य आवश्यक सुरक्षा मानकों को प्राथमिकता देना है न कि अपराधियों की रक्षा। हालाँकि “विशेष परिस्थितियों” में पुलिस को तत्काल गिरफ्तारी का अधिकार भी है, बशर्ते उचित आधिकारिक प्रक्रिया, मजिस्ट्रेट अनुमति या लिखित कारणों का अभिलेख उपलब्ध हो।
इस प्रकार, वास्तविकता यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था कानून प्रवर्तन और नागरिक सुरक्षा के बीच एक संतुलन बनाती है, जहाँ गिरफ्तारी का अधिकार है, पर वह अनुचित, असंवैधानिक या प्रक्रिया-विरोधी नहीं होनी चाहिए।


