ब्रिटिश राज का अंत? नई भारतीय न्याय संहिता ने IPC को कैसे पूरी तरह बदल दिया!
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संवाद 24 कृष्णकांत महाजन एडवोकेट। भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में, भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) ने 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code, 1860) की जगह ले ली है। यह संहिता भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाने का एक हिस्सा है, जो ब्रिटिश कालीन कानूनों से मुक्ति का प्रतीक है। पुरानी IPC, जो लॉर्ड मैकॉले द्वारा तैयार की गई थी, ने 160 से अधिक वर्षों तक भारत के अपराधों को परिभाषित किया, लेकिन यह औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित थी। BNS का उद्देश्य न्याय को अधिक तेज, समावेशी और भारतीय संदर्भों के अनुरूप बनाना है।
BNS में कुल 358 धाराएं हैं, जबकि IPC में 511 धाराएं थीं। इस कमी का कारण पुरानी धाराओं का विलय, हटाना और नए प्रावधानों का जोड़ना है। उदाहरण के लिए, जहां IPC में “कोड” शब्द का उपयोग होता था, वहां BNS में “संहिता” का प्रयोग किया गया है, जो भारतीय भाषाई पहचान को मजबूत करता है।
यह संहिता तीन नए कानूनों का हिस्सा है: भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam), जो क्रमशः IPC, CrPC और Indian Evidence Act की जगह लेते हैं। BNS का मुख्य फोकस पीड़ित-केंद्रित न्याय पर है, जहां अपराधी को दंड देने के साथ-साथ पीड़ित के अधिकारों को प्राथमिकता दी गई है। उदाहरणस्वरूप, ऑनलाइन FIR दर्ज करने की सुविधा और समयबद्ध जांच प्रक्रियाएं जोड़ी गई हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आवश्यकता
IPC की स्थापना 1860 में हुई थी, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। यह कानून यूरोपीय कानूनी सिद्धांतों पर आधारित था और भारतीय सामाजिक संरचना को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं करता था। स्वतंत्रता के बाद भी, IPC में कई संशोधन हुए, लेकिन मूल संरचना औपनिवेशिक बनी रही। BNS का प्रस्ताव 2023 में संसद में पेश किया गया और दिसंबर 2023 में पारित हुआ, जो भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर “अमृत काल” का हिस्सा है।
पुराने कानूनों की कमियां स्पष्ट थीं – वे आधुनिक अपराधों जैसे साइबर क्राइम, संगठित अपराध और आतंकवाद को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करते थे। BNS इन कमियों को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया है। उदाहरण के लिए, IPC में राजद्रोह (Sedition) की धारा 124A थी, जो ब्रिटिश सरकार की आलोचना को दंडनीय बनाती थी, लेकिन BNS में इसे हटा दिया गया है और नए रूप में पेश किया गया है, जो राष्ट्र की एकता पर जोर देता है। यह परिवर्तन लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करता है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित किया गया है।
BNS की आवश्यकता आधुनिक समाज की चुनौतियों से उत्पन्न हुई है। बढ़ते डिजिटल अपराध, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और पर्यावरणीय अपराधों को देखते हुए, नए कानून में इनके लिए विशिष्ट प्रावधान जोड़े गए हैं। जहां IPC सामान्य था, BNS अधिक विशिष्ट और पीड़ित-उन्मुख है। IPC की औपनिवेशिक जड़ें इसे एक नियंत्रण उपकरण बनाती थीं, जो दंड पर फोकस करती थीं, जबकि BNS न्याय और पुनर्वास पर जोर देता है, जो भारतीय संविधान की भावना से मेल खाता है।
IPC की प्रमुख खामियां और BNS की उपयोगिता का विश्लेषण
IPC की कई प्रमुख खामियां रही हैं, जो इसे आधुनिक भारत के लिए अपर्याप्त बनाती थीं। इनमें औपनिवेशिक विरासत, पुरानी भाषा, आधुनिक अपराधों की अनुपस्थिति, पीड़ितों की उपेक्षा और दंड-केंद्रित दृष्टिकोण शामिल हैं। BNS इन कमियों को संबोधित कर एक अधिक उपयोगी और प्रासंगिक प्रणाली प्रदान करता है। नीचे विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:
- औपनिवेशिक विरासत और पुरानी भाषा
IPC ब्रिटिश शासन के दौरान तैयार किया गया था, जिसमें “Her Majesty” और “British India” जैसे संदर्भ थे, जो स्वतंत्र भारत में अप्रासंगिक थे। भाषा जटिल और पुरातन थी, जैसे “lunatic” या “idiot” जैसे शब्द, जो अपमानजनक थे और कानूनी स्पष्टता में बाधा डालते थे। यह कानून दंड पर फोकस करता था, न कि न्याय पर, और असंतुलित था।
BNS की उपयोगिता : BNS इन औपनिवेशिक संदर्भों को पूरी तरह हटा देता है, भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को अपनाता है। उदाहरणस्वरूप, “child” (18 वर्ष से कम) जैसे सरल शब्दों का उपयोग किया गया है। यह डीकोलोनाइजेशन का प्रतीक है, जो कानून को अधिक सुलभ और भारतीय मूल्यों से जुड़ा बनाता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करता है। - आधुनिक अपराधों की अनुपस्थिति
IPC साइबर अपराध, आतंकवाद, संगठित अपराध, मॉब लिंचिंग और हिट-एंड-रन जैसे मुद्दों को पर्याप्त रूप से कवर नहीं करता था। राजद्रोह की धारा 124A अस्पष्ट थी और अभिव्यक्ति को दबाने के लिए दुरुपयोग होती थी। यह विशेष कानूनों पर निर्भर था, जो प्रक्रिया को जटिल बनाता था।<
BNS की उपयोगिता: BNS नए अपराध जोड़ता है, जैसे संगठित अपराध (धारा 111), आतंकवाद (धारा 113), स्नैचिंग (धारा 304) और मॉब लिंचिंग (धारा 103(2))। राजद्रोह को हटाकर धारा 152 में राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर फोकस किया गया है, जो हिंसा या विद्रोह पर केंद्रित है। यह आधुनिक चुनौतियों को सीधे संबोधित कर न्याय को तेज और प्रभावी बनाता है। - दंड-केंद्रित दृष्टिकोण और पीड़ितों की उपेक्षा
IPC केवल पांच सजाएं प्रदान करता था (मृत्यु, आजीवन कारावास, कारावास, संपत्ति जब्ती, जुर्माना), जो पुनर्वास को अनदेखा करता था। पीड़ितों को केवल गवाह माना जाता था, बिना मुआवजे या समर्थन के। जेलों में भीड़भाड़ और लंबी प्रक्रियाएं एक बड़ी समस्या थीं।
BNS की उपयोगिता: BNS छठी सजा के रूप में समुदाय सेवा जोड़ता है (धारा 4(f)), जो छोटे अपराधों के लिए पुनर्वास को बढ़ावा देता है। पीड़ित-केंद्रित है, जिसमें मुआवजा, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक समर्थन शामिल हैं। जांच 60 दिनों में और फैसला 45 दिनों में सुनाने की समयसीमा जेलों की भीड़ कम करती है और न्याय को तेज बनाती है। - संरचनात्मक जटिलता और अस्पष्टता
IPC की 511 धाराएं बिखरी हुई थीं, जो समान अपराधों को अलग-अलग जगहों पर रखती थीं, जिससे भ्रम होता था।<ल
BNS की उपयोगिता: 358 धाराओं में सुव्यवस्थित, थीमेटिक ग्रुपिंग के साथ (जैसे महिलाओं/बच्चों के खिलाफ अपराध अध्याय 5 में)। यह स्पष्टता बढ़ाता है और कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाता है।
ये बदलाव BNS को IPC की तुलना में अधिक उपयोगी बनाते हैं, जो औपनिवेशिक नियंत्रण से न्याय की ओर संक्रमण दर्शाते हैं।
संरचनात्मक अंतर
BNS और IPC की संरचना में मूलभूत अंतर हैं। IPC में 23 अध्याय और 511 धाराएं थीं, जबकि BNS में 20 अध्याय और 358 धाराएं हैं। यह कमी पुरानी धाराओं के विलय से आई है; उदाहरणस्वरूप, IPC की धाराएं 299-304 अब BNS की धारा 99-103 में समाहित हैं। BNS में नए अध्याय जोड़े गए हैं, जैसे “महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध” (अध्याय 5), जो IPC में बिखरे हुए थे।
एक प्रमुख बदलाव सजाओं में है। BNS में “समुदाय सेवा” को एक नई सजा के रूप में जोड़ा गया है, जो छोटे अपराधों के लिए लागू होती है, जैसे शराब पीकर सार्वजनिक स्थान पर हंगामा करना। IPC में केवल जुर्माना, कारावास या मृत्युदंड थे। BNS में अधिकतम सजाओं को बढ़ाया गया है। उदाहरणस्वरूप, बलात्कार के मामलों में न्यूनतम सजा 10 वर्ष तक बढ़ाई गई है।
भाषा और शब्दावली में भी अंतर है। BNS भारतीय भाषाओं से प्रेरित है, जहां “लड़की” की जगह “महिला” और “बालक” की जगह “बच्चा” का उपयोग किया गया है, जो लिंग-तटस्थ है। इसके अलावा, BNS में डिजिटल साक्ष्यों को मान्यता दी गई है, जो IPC में नहीं थी। ये बदलाव IPC की जटिलता को दूर कर BNS को अधिक उपयोगी बनाते हैं।
प्रमुख प्रावधानों में बदलाव
BNS में कई पुरानी धाराओं को संशोधित किया गया है। राजद्रोह की धारा 124A IPC से हटाकर BNS की धारा 152 में नए रूप में शामिल की गई है, जो अब “राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां” पर केंद्रित है, जैसे अलगाववाद को बढ़ावा देना। यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से प्रभावित है, जहां पुरानी धारा को दुरुपयोग की संभावना के कारण निलंबित किया गया था।
आतंकवाद के लिए BNS में नई धारा 113 जोड़ी गई है, जो IPC में नहीं थी। यह आतंकवादी कृत्यों को परिभाषित करती है और सख्त सजाएं प्रदान करती है, जिसमें मृत्युदंड शामिल है।
संगठित अपराध के लिए धारा 111 है, जो माफिया और गैंग अपराधों को लक्षित करती है। IPC में ऐसे अपराध सामान्य धाराओं के तहत आते थे, लेकिन BNS में इन्हें अलग से परिभाषित किया गया है।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों में महत्वपूर्ण बदलाव हैं। IPC की धारा 375 (बलात्कार) अब BNS की धारा 63 में है, जहां परिभाषा को विस्तृत किया गया है और सजा को बढ़ाया गया है। नाबालिगों के खिलाफ बलात्कार में मृत्युदंड अनिवार्य है।<
इसके अलावा, गैंग रेप के लिए न्यूनतम 20 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास जोड़ा गया है। बच्चों के अपहरण के लिए IPC की धारा 364 अब BNS की धारा 140 में है, जहां सजा को और सख्त बनाया गया है। ये संशोधन IPC की सीमाओं को पार कर BNS को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा में अधिक प्रभावी बनाते हैं।
हत्या और अपराधी इरादे में भी अंतर हैं। BNS की धारा 101 IPC की धारा 300 से अलग है, जहां “अचानक उकसाव” को स्पष्ट किया गया है।
साइबर अपराधों के लिए BNS में धारा 318 जोड़ी गई है, जो धोखाधड़ी और फेक न्यूज को दंडित करती है, जबकि IPC में यह सामान्य धोखाधड़ी के तहत आता था।
पर्यावरणीय अपराधों को भी शामिल किया गया है, जैसे जंगलों को नुकसान पहुंचाना, जो IPC में स्पष्ट नहीं था। BNS में मॉब लिंचिंग को अलग अपराध माना गया है, जहां 5 या अधिक लोगों द्वारा हत्या करने पर मृत्युदंड तक सजा है।
नए जोड़े गए प्रावधान और आधुनिकीकरण
BNS में कई नए प्रावधान हैं जो IPC में अनुपस्थित थे। उदाहरणस्वरूप, “ट्रांसजेंडर” को परिभाषित किया गया है और उनके खिलाफ अपराधों को शामिल किया गया है। डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को वैध बनाया गया है, जो जांच को तेज बनाता है।
समयबद्ध न्याय एक प्रमुख विशेषता है: पुलिस को 60 दिनों में जांच पूरी करनी होगी, और अदालतों को 45 दिनों में फैसला सुनाना होगा। यह IPC की लंबी प्रक्रियाओं से अलग है। पीड़ितों के लिए ऑनलाइन शिकायत और जीरो FIR की सुविधा जोड़ी गई है।
BNS में “आत्मरक्षा” की धाराओं को विस्तृत किया गया है, जहां संपत्ति की रक्षा में हिंसा का अधिकार बढ़ाया गया है। छोटे अपराधों के लिए जुर्माने बढ़ाए गए हैं, जैसे ट्रैफिक उल्लंघन, जो अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। ये नए प्रावधान IPC की पुरानी सीमाओं को तोड़कर BNS को आधुनिक चुनौतियों के लिए उपयोगी बनाते हैं।
आलोचनाएं और लाभ
BNS के लाभ स्पष्ट हैं: यह न्याय को तेज और समावेशी बनाता है, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा बढ़ाता है, और आधुनिक अपराधों को संबोधित करता है। हालांकि, आलोचनाएं भी हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि नई धाराएं अस्पष्ट हैं, जैसे “राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां”, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती हैं। पुरानी धाराओं के विलय से भ्रम की संभावना है। इसके अलावा, BNS में नेक्रोफिलिया जैसे कुछ गंभीर अपराधों को संबोधित नहीं किया गया है, और कार्यान्वयन के लिए प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी एक चुनौती है। फिर भी, BNS भारतीय न्याय को स्वदेशी बनाने का प्रयास है, जो वैश्विक मानकों से मेल खाता है।
अंततः हम कह सकते हैं कि BNS पुराने IPC से कई मायनों में अलग है, जो भारत की न्याय व्यवस्था को 21वीं सदी के अनुरूप बनाता है। IPC की खामियां, जैसे औपनिवेशिक दृष्टिकोण और आधुनिक अपराधों की अनुपस्थिति, BNS द्वारा प्रभावी रूप से संबोधित की गई हैं, जो पीड़ित-केंद्रित और समयबद्ध न्याय प्रदान करता है। यह परिवर्तन न्याय को अधिक प्रभावी और मानवीय बनाएगा। कुल मिलाकर, BNS एक प्रगतिशील कदम है जो पुरानी औपनिवेशिक छाप को मिटाता है।


