ब्रिटेन में नागरिकता पर सख्ती का अलार्म: मुस्लिम समुदाय पर मंडराया खतरा, भारत-पाक-बांग्लादेश मूल के लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं
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संवाद 24, लंदन ।
लंदन—ब्रिटेन में नागरिकता कानूनों को लेकर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। रनीमेड ट्रस्ट और रिप्रीव की संयुक्त रिसर्च के मुताबिक, ब्रिटेन की मौजूदा और हालिया सख्त की गई व्यवस्थाओं के तहत देश में करीब 90 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी नागरिकता छीनी जा सकती है। रिपोर्ट का दावा है कि इन “अत्यधिक और गोपनीय” शक्तियों का सबसे असमान असर ब्रिटिश मुस्लिम समुदाय पर पड़ रहा है—खासकर वे लोग जिनकी जड़ें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सोमालिया, नाइजीरिया, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व से जुड़ी हैं।
क्या कहता है कानून?
ब्रिटेन के कानून के तहत गृह सचिव को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति की ब्रिटिश नागरिकता यह मानकर समाप्त कर सकती हैं कि वह किसी अन्य देश की नागरिकता पाने का पात्र है—भले ही उस व्यक्ति का उस देश से कोई वास्तविक या भावनात्मक संबंध न हो। आलोचकों के अनुसार, यह व्यवस्था नागरिकता को “अधिकार” से अधिक “विशेषाधिकार” बना देती है।
मुस्लिम समुदाय क्यों सबसे अधिक प्रभावित?
रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका से जुड़े मूल के ब्रिटिश नागरिकों पर यह प्रावधान असमान रूप से लागू हो रहा है। अभियानकर्ताओं का कहना है कि इससे नागरिकता का एक नस्लीय और धार्मिक भेदभाव वाला ढांचा बनता है, जहां श्वेत ब्रिटिश नागरिकों की तुलना में मुसलमानों की स्थिति अधिक असुरक्षित हो जाती है।
विंड्रश की याद और बढ़ती आशंका
रनीमेड ट्रस्ट और रिप्रीव ने चेताया है कि यह व्यवस्था विंड्रश स्कैंडल जैसी त्रासदी की पुनरावृत्ति का जोखिम बढ़ाती है—जब कैरिबियन मूल के ब्रिटिश नागरिकों को गलत तरीके से देश से बाहर किया गया था। अब यही डर ब्रिटिश मुसलमानों में गहराता जा रहा है।
सरकार की शक्तियां और आलोचना
रिप्रीव की माया फोआ के अनुसार, पिछली कंजर्वेटिव सरकार के दौरान राजनीतिक लाभ के लिए नागरिकता छीनने के उदाहरण सामने आए, और 2022 में बिना पूर्व सूचना नागरिकता खत्म करने का अधिकार दिया गया। इसके बाद 2025 में कानून को और सख्त किया गया। आलोचकों का कहना है कि यह प्रवृत्ति नागरिकता को “अच्छे-बुरे व्यवहार” से जोड़ने की खतरनाक मिसाल कायम करती है।
आंकड़ों में चिंता
मिडिल ईस्ट आई के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन में भारत मूल के करीब 9.84 लाख, पाकिस्तान मूल के 6.79 लाख और बांग्लादेश मूल के हजारों लोग रहते हैं, जिन पर इन प्रावधानों का सीधा असर पड़ सकता है। अब तक जिन मामलों में नागरिकता छीनी गई, उनमें बड़ी संख्या दक्षिण एशियाई, मध्य पूर्वी और उत्तरी अफ्रीकी मूल के मुस्लिमों की बताई जा रही है।
चर्चित मामला
सबसे चर्चित उदाहरण शमीमा बेगम का है, जिनकी नागरिकता यह कहकर छीनी गई कि वह बांग्लादेश की नागरिक हैं—जबकि बांग्लादेश ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया था। यह मामला नागरिकता कानूनों की व्यावहारिक जटिलताओं और मानवीय प्रभावों को उजागर करता है।
निष्कर्ष
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवाद-रोधी तर्कों के नाम पर नागरिकता छीनने की बढ़ती प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। उनका जोर है कि नागरिकता अधिकार है, जिसे गोपनीय और असमान शक्तियों से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।






