अमेरिका-ईरान वार्ता के बाद फिर बढ़ा तनाव, दबाव और धमकियों की राजनीति तेज
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संवाद 24 नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुई कूटनीतिक बातचीत को भले ही दोनों पक्षों ने “सकारात्मक शुरुआत” बताया हो, लेकिन इसके तुरंत बाद हालात फिर तनावपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। बातचीत के बाद अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के संकेत दिए हैं, वहीं तेहरान ने भी सख्त शब्दों में चेतावनी जारी कर दी है। इससे साफ हो गया है कि दोनों देशों के रिश्तों में भरोसे की खाई अब भी बनी हुई है।
ओमान में हुई बातचीत से जगी थी उम्मीद, लेकिन भरोसा नहीं बन पाया
सूत्रों के मुताबिक, ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई थी। इस वार्ता का मकसद परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर सहमति की दिशा तलाशना था। शुरुआती संकेतों में कहा गया कि दोनों पक्षों ने संवाद को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई, लेकिन ठोस फैसलों की कमी ने इस बातचीत को अधूरा ही छोड़ दिया।
बातचीत के तुरंत बाद अमेरिका ने बढ़ाया रणनीतिक दबाव
वार्ता के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए दबाव की नीति को और तेज कर दिया। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट और ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक प्रतिबंधों में ढील नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को भी ईरान के खिलाफ सतर्क रहने का संदेश दिया है।
ईरान का पलटवार, धमकी भरे शब्दों में दी चेतावनी
अमेरिकी दबाव के जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाया है। तेहरान की ओर से कहा गया है कि अगर अमेरिका या उसके सहयोगी किसी भी तरह की सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई करते हैं, तो उसका करारा जवाब दिया जाएगा। ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।
परमाणु कार्यक्रम बना विवाद की सबसे बड़ी जड़
इस पूरे तनाव की जड़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान शांतिपूर्ण उद्देश्यों की आड़ में परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है। वहीं ईरान लगातार इस आरोप को खारिज करता रहा है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नागरिक और ऊर्जा जरूरतों के लिए है। यही टकराव दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
प्रतिबंधों का मुद्दा बना वार्ता की राह में रोड़ा
ईरान लंबे समय से अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता रहा है। इन प्रतिबंधों का असर ईरानी अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और आम जनता पर पड़ा है। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि जब तक ईरान व्यवहार में बदलाव नहीं दिखाता, तब तक प्रतिबंध हटाने का सवाल ही नहीं उठता। यही कारण है कि बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका।
मध्य पूर्व में बढ़ती बेचैनी, सहयोगी देशों की चिंता
अमेरिका-ईरान तनाव का असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व के कई देश इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। क्षेत्र में पहले से ही अस्थिरता बनी हुई है और अगर तनाव और बढ़ता है, तो इसके गंभीर क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम हो सकते हैं। कई देश कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे हैं ताकि हालात बेकाबू न हों।
अमेरिकी राजनीति में भी ईरान मुद्दे पर सख्ती
अमेरिका के अंदरूनी राजनीतिक माहौल में भी ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाने की मांग उठ रही है। विपक्षी दलों और कुछ प्रभावशाली नेताओं का कहना है कि ईरान के साथ नरमी अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है। ऐसे में प्रशासन पर दबाव है कि वह बातचीत के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन भी करे।
संवाद और टकराव के बीच फंसा कूटनीतिक भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए बेहद नाजुक हैं। एक ओर बातचीत का रास्ता खुला है, तो दूसरी ओर धमकियों और दबाव की भाषा हालात को बिगाड़ सकती है। अगर दोनों पक्ष लचीला रुख नहीं अपनाते, तो यह तनाव और गहराने की आशंका है।
दुनिया की निगाहें अगली वार्ता और फैसलों पर
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अमेरिका और ईरान के अगले कदमों पर टिकी हुई है। यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में दोनों देश संवाद को आगे बढ़ाते हैं या फिर दबाव और चेतावनियों की यह राजनीति किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ती है। इतना तय है कि यह मामला आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का एक बड़ा केंद्र बना रहेगा।






