ट्रंप के दावे और पुतिन की चुप्पी: क्या भारत-रूस की ‘तेल वाली दोस्ती’ में आ गई है दरार?
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संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीति के मंच पर इस समय एक ऐसी हलचल मची है जिसने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में खलबली पैदा कर दी है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह सनसनीखेज दावा है जिसमें उन्होंने कहा कि भारत अब रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, और दूसरी तरफ रूस का वह सधा हुआ जवाब, जिसने पश्चिमी देशों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दुनिया के किसी भी देश से तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है।
ट्रंप का धमाका और भारत-अमेरिका ट्रेड डील
मामले की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक बड़ी व्यापारिक डील (Trade Deal) का ऐलान किया। ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत के बाद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करने और इसके बदले अमेरिका व वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमति जताई है। इस डील के तहत भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की बात कही गई है। ट्रंप का यह बयान रूस के लिए एक बड़े झटके की तरह देखा जा रहा था, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
रूस का पलटवार: ‘इसमें नया क्या है?’
ट्रंप के इन दावों के बीच रूस के राष्ट्रपति कार्यालय ‘क्रेमलिन’ की प्रतिक्रिया ने मामले को और दिलचस्प बना दिया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने बहुत ही शांति से जवाब देते हुए कहा, “हमें इस घोषणा में कुछ भी नया नजर नहीं आता। भारत हमेशा से ही अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस के अलावा अन्य देशों से तेल खरीदता रहा है। रूस भारत का इकलौता सप्लायर नहीं है और भारत पूरी तरह स्वतंत्र है कि वह किससे तेल खरीदे।”रूस का यह बयान दर्शाता है कि वह भारत के साथ अपने दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर आश्वस्त है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा कि भारत और रूस के बीच हाइड्रोकार्बन का व्यापार दोनों देशों के लिए फायदेमंद है और यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
भारतीय रिफाइनरियों की मजबूरी और गणित
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल की सप्लाई रातों-रात बंद करना भारत के लिए आसान नहीं होगा। भारतीय रिफाइनरियां वर्तमान में हर दिन लगभग 15 से 20 लाख बैरल रूसी कच्चे तेल का आयात कर रही हैं। अमेरिकी तेल (Shale Oil) हल्का होता है, जबकि रूसी तेल ‘यूराल’ ग्रेड का होता है, जिसके लिए भारतीय रिफाइनरियां पूरी तरह अनुकूलित हो चुकी हैं। अगर भारत अमेरिकी तेल की ओर मुड़ता है, तो उसे अपनी रिफाइनिंग प्रक्रिया में बदलाव करना होगा, जो काफी खर्चीला साबित हो सकता है। दिसंबर और जनवरी के आंकड़ों पर गौर करें तो रूसी तेल के आयात में करीब 12 से 22 प्रतिशत की गिरावट जरूर दर्ज की गई है, लेकिन इसे पूरी तरह बंद करने की कोई आधिकारिक पुष्टि भारत सरकार की ओर से अभी तक नहीं आई है।
भारत की ‘ऊर्जा सुरक्षा’ और कूटनीतिक संतुलन
भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की प्राथमिकता अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। बदलते वैश्विक हालातों में तेल के स्रोतों का विविधीकरण (Diversification) हमारी रणनीति का हिस्सा है। भारत ने यह संकेत दे दिया है कि वह किसी एक गुट के दबाव में आकर अपने फैसले नहीं लेगा, बल्कि जहाँ उसे सस्ता और बेहतर विकल्प मिलेगा, वहीं से ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।






