40 साल की सत्ता, अरबों की शानो-शौकत और निजी सेना: युगांडा में लोकतंत्र पर सवाल

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संवाद 24 नई दिल्ली । अफ्रीकी देश युगांडा में सत्ता का चेहरा बीते लगभग 40 वर्षों से लगभग वही बना हुआ है। राष्ट्रपति योवेरी कगुता मुसेवेनी 1986 से लगातार देश की बागडोर संभाले हुए हैं। इतनी लंबी अवधि तक सत्ता में बने रहना उन्हें दुनिया के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं की सूची में शामिल करता है।

सेना के सहारे सत्ता तक पहुंचने की कहानी
मुसेवेनी ने सत्ता की शुरुआत एक सशस्त्र संघर्ष के बाद की थी। तत्कालीन सरकार को हटाकर वे राष्ट्रपति बने और खुद को देश में स्थिरता लाने वाला नेता बताया। शुरुआती वर्षों में उनके शासन को समर्थन भी मिला, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी कार्यशैली पर सवाल उठने लगे।

संविधान में बदलाव और सत्ता की मजबूत पकड़
आलोचकों का कहना है कि मुसेवेनी ने लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए संविधान में कई अहम बदलाव किए। पहले राष्ट्रपति पद के कार्यकाल की सीमा हटाई गई और बाद में उम्र सीमा भी खत्म कर दी गई, जिससे उनके लिए सत्ता में बने रहना आसान हो गया।

चुनाव, जीत और विवाद
हाल के चुनावों में मुसेवेनी ने एक बार फिर भारी बहुमत से जीत दर्ज की। आधिकारिक नतीजों के अनुसार उन्हें 70 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले। हालांकि विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए और इसे निष्पक्ष नहीं बताया।

विपक्ष का आरोप: धांधली और दमन
मुसेवेनी के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी और युवा नेता बोबी वाइन ने आरोप लगाया कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई। उनका कहना है कि विपक्षी कार्यकर्ताओं को डराया गया, इंटरनेट बंद किया गया और सुरक्षा बलों का दुरुपयोग हुआ।

सुरक्षा घेरा और निजी कमांडो फोर्स
राष्ट्रपति मुसेवेनी की सुरक्षा व्यवस्था भी चर्चा का विषय बनी रहती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके पास करीब 10 हजार से ज्यादा निजी कमांडो हैं, जो हर वक्त उनकी सुरक्षा में तैनात रहते हैं। आलोचक इसे सत्ता के डर और असुरक्षा से जोड़कर देखते हैं।

महंगी गाड़ियां और शाही जीवनशैली
मुसेवेनी की जीवनशैली भी सवालों के घेरे में है। बताया जाता है कि उनके पास करोड़ों रुपये की लग्जरी गाड़ियां हैं, जिनमें करीब 10 करोड़ रुपये की मर्सिडीज भी शामिल है। विपक्ष का आरोप है कि देश की जनता गरीबी से जूझ रही है, जबकि सत्ता शीर्ष पर ऐशो-आराम है।

मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने युगांडा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया पर दबाव और विपक्ष के दमन को लेकर चिंता जताई है। कई रिपोर्ट्स में युगांडा को “आंशिक रूप से स्वतंत्र” या “गैर-स्वतंत्र” देश की श्रेणी में रखा गया है।

समर्थकों की दलील: स्थिरता और विकास
हालांकि मुसेवेनी के समर्थक उन्हें देश में स्थिरता लाने वाला नेता मानते हैं। उनका कहना है कि लंबे शासन के दौरान युगांडा में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है और गृहयुद्ध जैसी स्थिति से देश बाहर निकला।

लोकतंत्र बनाम तानाशाही की बहस
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार युगांडा आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां सवाल सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भविष्य का है। एक ओर लंबे शासन से आई स्थिरता है, तो दूसरी ओर सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के कमजोर होने की चिंता।

अफ्रीका और दुनिया की नजरें युगांडा पर
युगांडा की राजनीति अब सिर्फ घरेलू मुद्दा नहीं रही। अफ्रीकी देशों के साथ-साथ पश्चिमी लोकतंत्र भी यहां के हालात पर नजर बनाए हुए हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण संभव होगा या युगांडा एक ही नेता के लंबे शासन का उदाहरण बना रहेगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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