मध्य-पूर्व की जंग और दक्षिण एशिया की भूमिका: ट्रंप के शांति मंच पर भारत-पाकिस्तान शामिल

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संवाद 24 नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में जारी गाजा संघर्ष को थामने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई और अहम पहल सामने आई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित एक विशेष ‘गाजा पीस बोर्ड’ में भारत और पाकिस्तान को भी आमंत्रित किए जाने की खबर ने वैश्विक कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह कदम न केवल गाजा संकट के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि दक्षिण एशिया की दो प्रतिद्वंद्वी परमाणु शक्तियों की भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित करता है।

क्या है ट्रंप का गाजा पीस बोर्ड?
सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्तावित बोर्ड गाजा में जारी हिंसा, मानवीय संकट और भविष्य की राजनीतिक रूपरेखा पर सुझाव देने वाला एक अंतरराष्ट्रीय मंच होगा। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली देशों को शामिल कर बहुपक्षीय समाधान तलाशने की कोशिश की जा रही है। ट्रंप के करीबी रणनीतिकारों का मानना है कि केवल पश्चिमी देशों के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि एशिया और ग्लोबल साउथ की भागीदारी भी जरूरी है।

भारत और पाकिस्तान को क्यों मिला न्योता?
भारत और पाकिस्तान दोनों को आमंत्रित किया जाना कई मायनों में चौंकाने वाला है। भारत, जो पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाता रहा है, आज वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और उभरती शक्ति के रूप में देखा जाता है। वहीं पाकिस्तान लंबे समय से फिलिस्तीनी पक्ष का मुखर समर्थक रहा है। ऐसे में दोनों देशों की मौजूदगी गाजा मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोणों को एक मंच पर लाने की कोशिश मानी जा रही है।

दक्षिण एशिया से मध्य-पूर्व तक कूटनीतिक संदेश
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-पाकिस्तान की संयुक्त उपस्थिति, भले ही सीमित भूमिका में हो, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संकेत देती है कि गाजा संकट केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक समस्या बन चुका है। इससे यह भी संदेश जाता है कि शांति प्रक्रिया में वैचारिक मतभेद रखने वाले देशों को भी शामिल करना समय की मांग है।

भारत की संभावित भूमिका
भारत की भूमिका यहां बेहद अहम मानी जा रही है। नई दिल्ली एक ओर इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध रखता है, तो दूसरी ओर फिलिस्तीन के लिए मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन भी करता आया है। ऐसे में भारत गाजा पीस बोर्ड में एक संतुलनकारी और मध्यस्थ भूमिका निभा सकता है। यह भारत की वैश्विक कूटनीतिक छवि को और मजबूत करने का अवसर भी हो सकता है।

पाकिस्तान की भागीदारी के मायने
पाकिस्तान के लिए यह मंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पारंपरिक नीति को दोहराने और मुस्लिम देशों के समर्थन को मजबूत करने का जरिया बन सकता है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की भूमिका अधिकतर नैरेटिव-ड्रिवन हो सकती है, जबकि व्यावहारिक समाधान सुझाने की चुनौती उसके सामने भी होगी।

अमेरिकी राजनीति और ट्रंप फैक्टर
इस पहल को अमेरिका की आंतरिक राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर खुद को वैश्विक शांति-निर्माता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंच बनाकर वे न केवल विदेश नीति में अपनी सक्रियता दिखाना चाहते हैं, बल्कि घरेलू राजनीति में भी इसका संदेश देना चाहते हैं।

क्या इससे गाजा में शांति संभव है?
सवाल यही है कि क्या यह पीस बोर्ड वास्तव में गाजा में शांति की राह खोल पाएगा या यह केवल कूटनीतिक प्रतीक भर बनकर रह जाएगा। जानकारों के अनुसार, जब तक जमीनी स्तर पर युद्धविराम, मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति और राजनीतिक समाधान पर ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक किसी भी बोर्ड की सफलता सीमित रहेगी।

वैश्विक प्रतिक्रिया और आगे की राह
इस प्रस्ताव पर कई देशों की प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है। कुछ इसे सकारात्मक पहल मान रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीति से प्रेरित कदम बता रहे हैं। बावजूद इसके, इतना तय है कि भारत और पाकिस्तान को एक ही शांति मंच पर आमंत्रित करना अपने आप में एक बड़ा संदेश है।

गाजा पीस बोर्ड की घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अगर यह पहल गंभीरता से आगे बढ़ती है, तो भारत-पाकिस्तान समेत कई देशों की भूमिका आने वाले समय में मध्य-पूर्व की राजनीति को नई दिशा दे सकती है। अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह मंच शांति का रास्ता बनेगा या सिर्फ एक और कूटनीतिक प्रयोग साबित होगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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