“टियर-3 कॉलेज से करियर रॉकेट: दो साल में ₹12 LPA से ₹24 LPA तक पहुंचा यह युवा इंजीनियर”

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संवाद 24 दिल्ली। देश में लाखों युवा हर साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करते हैं, लेकिन सभी के सामने एक-सा रास्ता नहीं होता। कोई बड़े संस्थानों से निकलकर कॉरपोरेट की सीधी सीढ़ियाँ चढ़ता है, तो कोई सीमित संसाधनों और साधारण कॉलेज से शुरुआत कर अपने दम पर पहचान बनाता है। हाल के दिनों में एक ऐसे ही युवा टेक प्रोफेशनल की कहानी सामने आई है, जिसने बिना किसी नामी संस्थान की डिग्री के, केवल दो वर्षों में अपनी सैलरी को दोगुना कर दिखाया। यह कहानी किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, सही फैसलों और सीखने की भूख की है। जिस कॉलेज को अक्सर “टियर-3” कहकर कम आँका जाता है, वहीं से निकलकर इस युवा ने टेक इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई और यह साबित किया कि सफलता का रास्ता केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों से होकर ही नहीं गुजरता।

साधारण शुरुआत, स्पष्ट सोच
इस युवा इंजीनियर की पढ़ाई किसी प्रसिद्ध तकनीकी संस्थान में नहीं हुई। कॉलेज में संसाधन सीमित थे, प्लेसमेंट के बड़े-बड़े पैकेज की उम्मीद भी कम थी। लेकिन शुरुआत से ही उसने यह तय कर लिया था कि डिग्री के साथ-साथ स्किल ही असली पूंजी होगी। पढ़ाई के दौरान ही उसने यह समझ लिया कि केवल थ्योरी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इंडस्ट्री-रेडी बनना जरूरी है। कॉलेज के शुरुआती वर्षों में ही उसने कोडिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और प्रॉब्लम-सॉल्विंग पर खास ध्यान देना शुरू किया। खाली समय का उपयोग ऑनलाइन सीखने, प्रोजेक्ट बनाने और खुद को बेहतर करने में किया। यह वही दौर था जब उसने अपने भविष्य की नींव रखी।

इंटर्नशिप से करियर की दिशा तय
तीसरे वर्ष के आसपास उसने इंटर्नशिप की तलाश शुरू की। बड़े ब्रांड का इंतजार करने के बजाय उसने उभरते स्टार्टअप्स की ओर रुख किया, जहाँ सीखने के अवसर ज्यादा थे। पहली इंटर्नशिप ने उसे न केवल इंडस्ट्री का अनुभव दिया, बल्कि यह भी सिखाया कि वास्तविक काम कैसे किया जाता है।
धीरे-धीरे उसके काम की गुणवत्ता में सुधार होता गया। कोड की समझ, टीम के साथ काम करने की क्षमता और समय पर जिम्मेदारी निभाने की आदत ने उसे अलग पहचान दिलाई। इसी मेहनत का नतीजा था कि कुछ ही महीनों में उसकी भूमिका और जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगीं।

पहली बड़ी सफलता
इंटर्नशिप के अनुभव के बाद जब फुल-टाइम नौकरी का अवसर मिला, तो यह उसके करियर का पहला बड़ा मोड़ था। शुरुआती पैकेज भले ही असाधारण न लगता हो, लेकिन उसके लिए यह एक मजबूत शुरुआत थी। इस स्तर पर भी उसने संतोष नहीं किया। उसका फोकस सिर्फ सैलरी पर नहीं, बल्कि सीखने और खुद को साबित करने पर था। काम के प्रति उसकी गंभीरता, नए टूल्स सीखने की तत्परता और टीम के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की आदत ने उसे मैनेजमेंट की नजर में ला दिया। वह सिर्फ निर्देशों का पालन करने वाला कर्मचारी नहीं रहा, बल्कि समस्याओं का समाधान सुझाने वाला प्रोफेशनल बन गया।

दो साल में बड़ा बदलाव
लगातार बेहतर प्रदर्शन का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। पहले साल के अंत तक ही उसकी भूमिका पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुकी थी। प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी बढ़ी, निर्णयों में उसकी राय सुनी जाने लगी। इसी के साथ वेतन में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। दूसरे साल में यह ग्रोथ और तेज हो गई। बिना बार-बार कंपनी बदले, केवल अपने काम के दम पर उसने वह मुकाम हासिल किया, जिसे पाने के लिए कई लोग सालों तक जॉब-हॉपिंग करते रहते हैं। दो वर्षों के भीतर उसकी सैलरी शुरुआती स्तर से लगभग दोगुनी हो चुकी थी।

रणनीति, जो बनी ताकत
इस सफलता के पीछे कोई एक कारण नहीं था। उसने अवसरों को पहचानने की कला सीखी। सही समय पर सही लोगों से संपर्क किया, अपने काम को सामने रखने से नहीं हिचकिचाया और लगातार खुद को अपडेट रखा। टेक्नोलॉजी की दुनिया में बदलाव तेज होते हैं, और उसने इस बदलाव के साथ चलना सीखा। उसका मानना था कि नेटवर्किंग केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सीखने और अवसर समझने का जरिया है। इसी सोच के चलते वह नए प्रोजेक्ट्स और जिम्मेदारियों के लिए हमेशा तैयार रहता था।

युवाओं के लिए संदेश
यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो साधारण कॉलेज या सीमित संसाधनों के कारण खुद को पीछे मान लेते हैं। यह सफर बताता है कि स्किल, अनुशासन और धैर्य के सामने कॉलेज का टैग छोटा पड़ सकता है। टेक इंडस्ट्री में आज भी ऐसे लोगों की जरूरत है, जो समस्या को समझें और समाधान दे सकें। सफलता का कोई तय फॉर्मूला नहीं होता, लेकिन मेहनत और सही दिशा में किया गया प्रयास जरूर रंग लाता है। यह उदाहरण दिखाता है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और सीखने की लगन बनी रहे, तो कम समय में भी बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।

निष्कर्ष
दो साल में दोगुनी सैलरी की यह यात्रा किसी एक व्यक्ति की कहानी भर नहीं है, बल्कि बदलते भारत की तस्वीर है। यह उस पीढ़ी की सोच को दर्शाती है, जो अवसरों का इंतजार नहीं करती, बल्कि खुद अवसर बनाती है। टियर-3 कॉलेज से निकलकर टेक इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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