क्या एर्दोआन फिर जगा रहा है ‘खिलाफत का भूत’? दक्षिण एशिया में तुर्की की खतरनाक चाल का खुलासा। धार्मिक भावनाएँ, कट्टरता और भारत को चुनौती
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। विश्व राजनीति में शक्तियों के उदय-अस्त का खेल सदैव से रहा है। इतिहास में साम्राज्यों ने सीमाओं, संसाधनों और मित्र-शत्रु समीकरणों के आधार पर विस्तार किया। लेकिन जब कोई आधुनिक राज्य धार्मिक भावनाओं को सबसे गहन स्तर पर भुनाने की कोशिश करे और धर्म के नाम पर क्षेत्रीय पहुंच का विस्तार करे, तो यह केवल भू-राजनीति नहीं रह जाता यह पहचान, इतिहास और भावनात्मक संवेदनाओं का घोर दुरुपयोग बन जाता है। आज तुर्की (Turkiye) के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन की दक्षिण एशिया नीति इसी भावनात्मक जाल में बुन रही है, जो सिर्फ़ सैन्य या कूटनीतिक संबंध नहीं इसे ऐतिहासिक खिलाफत-सपने की नापाक योजनाओं की पुनरावृत्ति कहा जा सकता है।
तुर्की, भौगोलिक रूप से भारत से हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद, अपनी रणनीति को इस्लामी राग में बाँधकर दक्षिण एशियाई देशों के पड़ोसी माहौल में घुसने की कोशिश कर रहा है। साफ शब्दों में कहा जाए तो यह सिर्फ़ दोस्ती का दावा नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर राजनीतिक नियंत्रण, भावनात्मक नियंत्रण और लगातार बढ़ती सैन्य व आर्थिक पहुँच की रणनीति है।
इतिहास की पुनरावृत्ति या नया ऑटोमन विस्तारवाद?
तुर्की की दक्षिण एशिया में रुचि का इतिहास हाल-फिलहाल का नहीं है। ओटोमन साम्राज्य ने सोलहवीं सदी में भारतीय उपमहाद्वीप के साथ राजनीतिक और सैन्य सम्बन्धों के स्तर पर जुड़ाव रखा था, यह वह दौर था जब ओटोमन, मुगल और अन्य शक्तियाँ विश्व के भू-राजनीतिक मानचित्र पर संघर्षरत थीं। उस समय तुर्की ने तकनीकी सहायता दी, तोपें उपलब्ध कराईं, ताकि वह रणनीतिक समीकरणों में संतुलन बनाए रख सके। यह इतिहास की एक वैवाहिक, राजनीतिक और धार्मिक गुत्थी थी, जिसने दक्षिण एशिया में मुस्लिम सत्ता को आकार दिया। आज उसी इतिहास-भावना का दोहन किया जा रहा है।
तुर्की में मौजूद एर्दोग़नवाद (Erdoğanism), जो सख़्त धार्मिक, पंथभक्ति-युक्त और नव-ऑटोमनवादी (Neo-Ottomanism) विचारधाराओं से प्रेरित है, दक्षिण एशिया को सिर्फ़ राजनीतिक साझेदार की तरह नहीं देखता, बल्कि ऐतिहासिक धार्मिक भावनाओं के दायरे में बांधने का प्रयास करता है। ऐसे विचारों में ओटोमन साम्राज्य की श्रेष्ठता, मुस्लिम एकता-भावना और क्षेत्रीय नेतृत्व पर ज़ोर है, जो प्रत्यक्ष रूप से खिलाफत-सपने की याद दिलाता है।
इस विचारधारा के अनुसार, ओटोमन साम्राज्य का पतन एक ऐतिहासिक त्रासदी थी जिसे पुनः ठीक किया जाना चाहिए, और दक्षिण एशिया के विशाल मुस्लिम समुदाय से जुड़कर यह भावनात्मक नियंत्रण हासिल करना उस सपने का नया चरण है।
धर्म के नाम पर राजनीति: भावनात्मक जाल
तुर्की की नीति का सबसे बड़ा हथियार धार्मिक भावनाएँ हैं। दक्षिण एशिया में बसे मुस्लिम समुदाय विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव जैसे देश तुर्की के इस्लामी नेतृत्व की ओर आकर्षित हैं। इसका एक कारण यह भी है कि तुर्की ने स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के साथ अपनी संस्कृति को जोड़ा है, जिससे वहाँ के लोगों में तुर्की को रोल मॉडल के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
लेकिन यह जाल सिर्फ़ सांस्कृतिक आत्मीयता नहीं है। यह एक सावधानीपूर्वक बुना गया तंत्र है जहाँ धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक समर्थन, सैन्य गठबंधन और रणनीतिक साझेदारी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। तुर्की ने न केवल सांस्कृतिक पहलुओं पर काम किया है, बल्कि बड़े पैमाने पर शिक्षा, छात्रवृत्ति, मीडिया और धर्म-समर्थक संस्थाओं के माध्यम से अपने प्रभाव को स्थानीय स्तर पर विस्तृत किया है।
यह वही रणनीति है जो अन्य वैश्विक शक्तियों ने भी आजमाई है, लेकिन तुर्की का ढांचा स्पष्ट रूप से धर्म-आधारित राजनैतिक विस्तारवाद की ओर इशारा करता है। ब्रिटिश, फ्रेंच या सोवियत साम्राज्य का रणनीतिक प्रभुत्व ज्यादातर भू-आर्थिक हितों पर आधारित था। तुर्की का दृष्टिकोण इसका धार्मिक सशक्त संस्करण है, जो न केवल शक्तियों का खेल है बल्कि आइडियोलॉजिकल प्रभुत्व की चाह भी है।
भारत पर प्रभाव: सीधे विरोध से नुक़सान तक
तुर्की के दक्षिण एशिया में प्रवेश का सबसे बड़ा असर भारत-तुर्की संबंधों पर पड़ा है। ताज़ा समय में, भारत के साथ टकराव तब बढ़ा जब रिपोर्टों के मुताबिक़ तुर्की ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष में पाकिस्तान को हथियार और समर्थन प्रदान किया। यह कदम भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर न केवल चिंता का विषय है बल्कि प्रत्यक्ष विरोध के स्तर तक पहुँचा है।
भारतीय मीडिया और जनमत ने इस क़दम को तुर्की के भारत-विरोधी रुख़ के रूप में देखा, जिसका परिणाम भारत में तुर्की के पर्यटन, व्यापार और साझेदारी पर बॉयकॉट और विरोध के रूप में सामने आया। ऐसे माहौल में केवल आर्थिक नुक़सान नहीं, बल्कि दो देशों के बीच गहरा अविश्वास भी पनपा है, जो किसी भी स्वस्थ द्विपक्षीय सम्बन्ध में बाधा बन सकता है।
तुर्की की यह चाल सिर्फ़ भारत के संबंधों को प्रभावित नहीं कर रही, यह दक्षिण एशिया में भारत-नियंत्रित भू-राजनीतिक संतुलन को चुनौती दे रही है। भारत की व्यापक शक्ति, उसकी आर्थिक प्रगति और राजनैतिक स्थिरता ने क्षेत्र में उसकी अग्रणी भूमिका सुनिश्चित की है। लेकिन जब तुर्की जैसे बाहरी खिलाड़ी धार्मिक आधार पर गठबंधन बना रहे हैं, यह संतुलन भंग होने का खतरा पैदा करता है।
खिलाफत-सपने: इतिहास पुराने रंग में या नया विस्तारवाद?
तुर्की की रणनीति का सबसे शक्तिशाली और खतरनाक आयाम है खिलाफत की अव्यक्त आकांक्षा। यह सिर्फ़ पुरानी विरासत याद दिलाना नहीं है, यह धार्मिक नेतृत्व को एक वैश्विक मंच पर पुनः स्थापित करने की प्रवृत्ति है। ओटोमन खिलाफत का भाव अभी भी मुस्लिम जनता के भावनात्मक स्वभाव में गूंजता है, और तुर्की इसे राजनीतिक लाभ और क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
इतिहास गवाह है कि जब भी “खिलाफत” जैसे धार्मिक संस्थानों का राजनीतिक उपयोग हुआ, वह राजनीतिक कट्टरता, संघर्ष और सामाजिक विभाजन को प्रोत्साहित करता रहा है। आज वही मॉडल दक्षिण एशिया में दोबारा उभर रहा है। पर इस बार नया रंग, नया मंच और तकनीकी समर्थन है जिसकी मदद से विचारधारा बहुत तेजी से फैल रही है।
तुर्की अपने नए आत्म-निर्मित नेतृत्व की बात करता है, लेकिन उसकी रणनीति का सेंटर धर्म-आधारित विभाजन और अपने हितों के लिए धार्मिक पहचान का उपयोग करता है ना कि सिर्फ़ क्षेत्रीय साझेदारी का। यह रणनीति कई मोर्चों पर खतरनाक संकेत देती है:
यह सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाता है।
यह राजनीतिक कट्टरतावाद को बढ़ावा देता है।
यह भौगोलिक सीमाओं से बाहर धार्मिक प्रभुत्व का प्रयास है।
इन सबका नतीजा केवल नया साम्राज्यवादी खाका नहीं यह एक भावनात्मक-राजनीतिक मार्ग है जो इतिहास के सबसे संवेदनशील पहलुओं को भी हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।
खिलाफत की राजनीति या आधुनिक विस्तारवाद?
तुर्की की दक्षिण एशिया नीति का असली लक्ष्य कोई सरल सुरक्षा भागीदारी या व्यापारिक गठबंधन नहीं है। यह बड़े पैमाने पर इतिहास, धर्म, संस्कृति और राजनीति के संयोजन का एक जाल है, जिसे एर्दोआन की सोच ने नव-ऑटोमनवाद तथा खिलाफत-भावना के रूप में आत्मसात किया है।
दक्षिण एशिया में धर्म की भूमिका को बढ़ावा देकर तुर्की राजनीतिक नियंत्रण, भावनात्मक वर्चस्व और सामरिक प्रभाव स्थापित करना चाहता है, यह न केवल आधुनिक कूटनीति है बल्कि एक नए प्रकार का विस्तारवाद है। इससे न केवल क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है, बल्कि यह स्थानीय सामाजिक सौंरभ को राजनीतिक ध्रुवीकरण में बदल सकता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक, विविधतापूर्ण और शक्तिशाली देश के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है कि कोई भी शक्ति धार्मिक भावनाओं के नाम पर क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही है। ऐसे में यह केवल भू-राजनीति या संबंधों का सवाल नहीं रह जाता, यह संस्कृति, पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन जाता है।






