एक और हत्या, वही सन्नाटा: क्या हिंदुओं का खून वैश्विक अंतरात्मा को नहीं झकझोरता? चयनात्मक संवेदना का युग, कुछ मौतें सुर्ख़ियाँ, कुछ आँकड़े।
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की नृशंस हत्या केवल एक अपराध नहीं, बल्कि एक वैश्विक नैतिक विफलता का प्रतीक है। सवाल सीधा है जब-जब हिंदुओं को उनकी पहचान के कारण मारा जाता है, तब दुनिया चुप क्यों रहती है? क्या मानवाधिकारों की परिभाषा धर्म देखकर तय होती है?
बांग्लादेश में हुई हिंदू युवक की नृशंस हत्या को यदि कोई अब भी एक सामान्य आपराधिक घटना या “लोकल लॉ एंड ऑर्डर” का मामला मानता है, तो यह या तो सच से मुँह मोड़ने की कोशिश है या जानबूझकर की गई बौद्धिक बेईमानी। यह हत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार व्यवस्था की नैतिकता पर एक करारा प्रहार है। यह घटना उस असहज प्रश्न को फिर सामने लाती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार बचता आया है जब हिंदुओं को उनकी पहचान के कारण मारा जाता है, तब दुनिया की अंतरात्मा क्यों मौन हो जाती है?
यह सवाल भावनात्मक नहीं, बल्कि तथ्यात्मक है। जब किसी अन्य समुदाय के विरुद्ध हिंसा होती है, तो वैश्विक मंचों पर तुरंत प्रतिक्रिया आती है, आपात बैठकें होती हैं, विशेष रिपोर्ट प्रकाशित होती हैं, और कड़े शब्दों में निंदा की जाती है। लेकिन जब हिंदुओं की हत्या होती है, तो वही घटनाएं “अलग-थलग मामला”, “स्थानीय विवाद” या “कानून-व्यवस्था की समस्या” कहकर खारिज कर दी जाती हैं। यह चयनात्मक संवेदनशीलता केवल दोहरा मापदंड नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का संकेत है।
बांग्लादेश की सड़कों पर जिस युवक को मार डाला गया, उस पर वही पुराना आरोप लगाया गया, धार्मिक भावनाएं आहत करने का। न कोई प्राथमिक जांच, न कोई न्यायिक प्रक्रिया, न कोई प्रमाणिक सत्यापन। सिर्फ भीड़ का फैसला और उसका तथाकथित तात्कालिक न्याय। यह कोई अचानक भड़का गुस्सा नहीं था। यह वर्षों से पोषित की गई घृणा, धार्मिक उन्माद और दंडहीनता की मानसिकता का परिणाम था। असली सवाल यह नहीं कि हत्या हुई, बल्कि यह है कि यह हत्या इतनी आसान कैसे हो गई।
जिस बंगाल को भारत के प्राचीन इतिहास में कभी सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का उदाहरण माना जाता था, वही एक अलग देश बनने के बाद कट्टर इस्लामिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता की प्रयोगशाला बन चुका है। हर सत्ता संकट, हर चुनावी उथल-पुथल और हर राजनीतिक संक्रमण के समय सबसे पहले निशाना हिंदू समुदाय बनता है। मंदिरों पर हमले होते हैं, घर जलाए जाते हैं, मूर्तियाँ तोड़ी जाती हैं और फिर पूरी घटना को “लोकल इश्यू” कहकर अंतरराष्ट्रीय बहस से बाहर कर दिया जाता है।
इतिहास इस सच्चाई का मूक गवाह है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक निरंतर चलता आ रहा पैटर्न है। 1971 के बाद से हिंदुओं की जनसंख्या का अनुपात लगातार घटता गया है। 1990, 2001, 2013 और 2021 हर बड़े राजनीतिक मोड़ पर हिंदू हिंसा का शिकार बने। हर बार वही स्क्रिप्ट दोहराई गई कुछ गिरफ्तारियां, कुछ औपचारिक बयान और फिर वैश्विक चुप्पी।
यह पैटर्न केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर हमले, जबरन धर्मांतरण और नाबालिग बच्चियों की जबरन शादियाँ कोई छिपा हुआ सच नहीं हैं। कश्मीर में टार्गेट किलिंग के ज़रिये हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया शिक्षक, दुकानदार, मजदूर। इन सभी घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक मीडिया और तथाकथित उदार बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया या तो बेहद सीमित रही या पूरी तरह अनुपस्थित।
आज मानवाधिकार एक नैतिक सिद्धांत से अधिक एक उद्योग बन चुका है, जहाँ यह तय किया जाता है कि किस पीड़ा पर बोलना लाभकारी है और किस पर चुप रहना सुविधाजनक। जब किसी अन्य समुदाय पर हमला होता है, तो तुरंत “इस्लामोफोबिया”, “नरसंहार चेतावनी” और “अल्पसंख्यक संकट” जैसे शब्द सामने आते हैं। लेकिन जब हिंदुओं को मारा जाता है, तब भाषा बदल जाती है “आइसोलेटेड इंसिडेंट”, “लोकल डिस्प्यूट”, “लॉ एंड ऑर्डर इश्यू”। यही भाषाई छल अपराधियों को यह संदेश देता है कि हिंदुओं की हत्या पर कोई वैश्विक कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी।
भारत में इस घटना को लेकर उपजा आक्रोश स्वाभाविक है। यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि इतिहास, भूगोल और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। बांग्लादेश में हिंदुओं की असुरक्षा भारत के लिए संभावित शरणार्थी संकट, सीमा अस्थिरता और कट्टर नेटवर्क के विस्तार की चेतावनी है। जो लोग इसे बांग्लादेश का “आंतरिक मामला” कहकर टालते हैं, वे या तो भोले हैं या रणनीतिक वास्तविकताओं से आंखें मूंदे हुए हैं।
पश्चिमी मीडिया की भूमिका भी गंभीर सवालों के घेरे में है। बांग्लादेश में हुई इस हत्या को वह कवरेज नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी। न कोई विशेष रिपोर्ट, न कोई नैतिक आक्रोश से भरा प्राइम टाइम। वही मीडिया जो दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, यहाँ लगभग मौन रहा। क्या हिंदुओं की जान इतनी सस्ती है कि वह वैश्विक सुर्खियों के लायक नहीं?
आज यूरोप और अमेरिका में कट्टर इस्लाम के खिलाफ प्रतिक्रिया इसलिए तेज हो रही है क्योंकि खतरा अब उनके अपने समाजों तक पहुँच चुका है। लेकिन एशिया, विशेषकर हिंदुओं के मामले में, वही देश दशकों तक आंखें मूंदे बैठे रहे। यह दोहरा मापदंड ही आज के वैश्विक असंतुलन और अविश्वास की जड़ है।
हर ऐसी घटना के बाद कुछ गिरफ्तारियां होती हैं और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है। न त्वरित न्याय, न उदाहरणात्मक सज़ा। जब तक हिंसा की कीमत राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुकानी नहीं पड़ेगी, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा। दंडहीनता ही कट्टरता की सबसे बड़ी खाद है।
आज असली सवाल यह नहीं है कि हिंदू अल्पसंख्यक हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हिंदू होना अब अपने आप में एक जोखिम बनता जा रहा है। जब किसी की पहचान ही उसकी मौत का कारण बन जाए और दुनिया चुप रहे, तो यह केवल हिंसा नहीं, बल्कि सभ्यता की हार होती है।
बांग्लादेश में मारा गया हिंदू युवक सिर्फ एक नाम नहीं है। वह एक चेतावनी है। चेतावनी इस बात की कि अगर आज हिंदुओं की हत्या पर वैश्विक चुप्पी बनी रही, तो कल यही चुप्पी और भी बड़े मानवीय संकटों का मार्ग प्रशस्त करेगी। मानवाधिकार तभी मायने रखते हैं जब वे सार्वभौमिक हों, चयनात्मक नहीं। और यदि दुनिया यह स्वीकार नहीं कर पा रही, तो उसे कम से कम यह दिखावा भी छोड़ देना चाहिए कि वह नैतिकता की प्रहरी है।






