बाबरी से ब्रिगेड तक, क्या बंगाल में हिंदू चेतना का नया स्वर उभर रहा है?
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। पश्चिम बंगाल में दिसंबर 2025 की दो घटनाएँ मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में हुमायूँ कबीर का बाबरी मस्जिद शिलान्यास का कार्यक्रम और उसके ठीक अगले दिन कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में लाखों लोगों का विशाल गीता-पाठ, सिर्फ धार्मिक क्रियाएँ नहीं थीं। ये दो दृश्य मिलकर बंगाल की बदलती हुई सांस्कृतिक-सामाजिक धारा का संकेत बन गए हैं। बंगाल, जो अक्सर अपनी राजनीतिक बुद्धिजीविता और उदार सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता आया है, अब एक बार फिर से पहचान-आधारित राजनीति के एक नए दौर में प्रवेश करता दिखाई पड़ रहा है।
टीएमसी से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर ने जिस तरह मुर्शिदाबाद के बेलडांगा क्षेत्र में ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर शिलान्यास-जैसा आयोजन किया, उसने पिछले तीन दशकों की सामूहिक स्मृति को झकझोर दिया। बाबरी शब्द केवल ईंट नहीं, वह इतिहास, राजनीति और साम्प्रदायिक संवेदनाओं से बुना हुआ प्रतीक है। कबीर के इस कदम ने मुस्लिम समाज के भीतर की अतिशयता को स्वर दिया, लेकिन साथ ही साथ हिंदू समाज में असहजता, बेचैनी और भावनात्मक प्रतिक्रिया भी जगाई।
हैरानी की बात यह है कि इस आयोजन के ठीक अगले दिन हाँ, केवल 24 घंटे बाद, कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड लाखों श्रद्धालुओं से भर उठा, जहाँ सामूहिक गीता-पाठ हुआ। आयोजकों के अनुसार 6.5 लाख से अधिक लोगों ने एक साथ गीता का पाठ किया। यह दृश्य सिर्फ भक्ति का नहीं था, यह सांस्कृतिक शक्ति के एक विराट प्रदर्शन जैसा था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि ब्रिगेड का यह दृश्य बंगाल की धरती पर एक नई धार्मिक-सांस्कृतिक ऊर्जा के उदय का संकेत देता है।
अब मूल प्रश्न यही उठता है, क्या ब्रिगेड का महासागर बेलडांगा की लहर का उत्तर था? क्या यह विशाल गीता-पाठ हुमायूँ कबीर के बाबरी शिलान्यास की घोषणा से उभरी भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है? घटनाओं का समयक्रम खुद एक कहानी कह रहा है। गीता-पाठ पहले से तय था, यह सही है, लेकिन सामाजिक घटनाओं की राजनीति कभी सिर्फ आयोजन-तिथियों से संचालित नहीं होती, उसकी व्याख्या समाज की नब्ज और राजनैतिक मनोदशा तय करती है।
बंगाल का हिंदू समाज परंपरागत रूप से शांत, सांस्कृतिक और अनुष्ठान-प्रधान रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों में इस समाज में आत्म-अभिव्यक्ति का एक नया स्वर उभर रहा है। थोड़ा खुला हुआ, थोड़ा संगठित, और थोड़ा राजनीतिक भी। ब्रिगेड ग्राउंड पर लाखों लोगों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि हिंदू चेतना अब मौन नहीं है, वह अपने तरीके से, अपने जनसमूह के बल पर, सार्वजनिक स्थानों में स्वयं को स्थापित कर रही है।
दूसरी ओर, हुमायूँ कबीर का बाबरी-संबंधी कार्यक्रम भी मुस्लिम समुदाय की पहचान-आधारित राजनीति के भीतर एक बदलाव का संकेत है। यह कार्यक्रम केवल ‘शिलान्यास’ नहीं था, यह राजनीतिक पुनर्स्थापन का प्रयास भी था। कबीर साफ तौर पर ये संदेश देना चाहते थे कि वे टीएमसी से निष्कासित होने के बाद भी सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। लेकिन यही कदम एक ऐसी प्रतिक्रिया का कारक बन गया जिसे शायद कबीर ने भी अनुमान नहीं लगाया होगा।
इन दो घटनाओं के बीच सबसे बड़ा अंतर प्रतिक्रिया की प्रकृति में है। बेलडांगा में विवाद, तनाव, प्रशासन की चौकसी और राजनीतिक बयानबाज़ी देखी गई। लेकिन ब्रिगेड में शांति, अनुशासन और भक्ति से भरा समुद्र था, लोगों की भीड़ थी, पर उत्तेजना नहीं। एक आयोजन को कानून-व्यवस्था चुनौती बना, जबकि दूसरा आयोजन सांस्कृतिक सामूहिकता का उत्सव बन गया। यही फर्क बताता है कि बंगाल का सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन कैसे बदल रहा है।
समाजशास्त्रियों की मानें तो बंगाल अब दो समानांतर धार्मिक-राजनीतिक धाराओं में बँट रहा है, एक तरफ मुस्लिम समाज में पहचान आधारित नेतृत्व की नई आकांक्षा, और दूसरी ओर हिंदू समाज में अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति को पुनर्स्थापित करने का दृढ़ संकल्प। बेलडांगा और ब्रिगेड ये दोनों दृश्य इस बदलाव के दो चेहरे हैं। और दोनों ही घटनाएँ संकेत देती हैं कि भविष्य में बंगाल की राजनीति केवल नीतियों से नहीं, बल्कि पहचान और सांस्कृतिक प्रतीकों से अधिक संचालित होगी।
टीएमसी के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि अब उसके लिए बहुसंख्यक समाज के भीतर उभर रही सांस्कृतिक चेतना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है, तो वही दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय की संवेदनाओं को संभालना भी उसकी मजबूरी है। हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं के कदम यह दिखा रहे हैं कि मुस्लिम राजनीति अब एकतरफा नहीं रही, जबकि ब्रिगेड का आयोजन दिखा रहा है कि हिंदू समाज में व्यापक संगठन की क्षमता मौजूद है। यह दोहरा दबाव आने वाले चुनावों की राजनीति को नयी दिशा देगा।
इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखकर यह स्पष्ट है कि बंगाल अब अपने पुराने राजनीतिक ढांचे से बाहर आ चुका है। वामपंथी विचारधारा की पकड़ तो ढीली पड़ी ही है, और कट्टर वोट बैंक की ताकत का विमर्श भी अकेला निर्णायक नहीं रहा। आज का बंगाल विचारधाराओं के अंतर्द्वंद का प्रदेश बन रहा है, जहाँ बाबरी का प्रतीक भी असर डालता है तो गीता का संदेश भी सांस्कृतिक चेतना को पुर्नजागृत कर समाज को संगठित कर रहा है।
बेलडांगा में बाबरी और अगले दिन ब्रिगेड में गीता। यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है। यह बताता है कि बंगाल एक गहरे सांस्कृतिक-राजनीतिक पुनर्संयोजन से गुजर रहा है। विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, ग्रंथों और प्रतीकों के माध्यम से अपनी जगह तय कर रहे हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बंगाल अपनी नई पहचान खोज रहा है, जहाँ आस्था, राजनीति और जनभागीदारी एक नए संतुलन के साथ उभर रही हैं। जिसका प्रभाव आगे आने वाले चुनाव में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ेगा।






