रंगों के त्योहार पर लहू का रंग: तरुण की हत्या और ‘चयनात्मक संवेदना’ का घिनौना खेल

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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। होली का त्योहार भारत की उस सांझी संस्कृति का प्रतीक है जिसमें रंग, उमंग और सामूहिक आनंद का संदेश समाया हुआ है। लेकिन इस वर्ष 4 मार्च 2026 को दिल्ली के उत्तम नगर स्थित जेजे कॉलोनी में होली का वह उत्सव खून से सन गया। एक मासूम बच्ची के हाथ से छूटे पानी के गुब्बारे ने जो विवाद जन्मा, वह कुछ ही घंटों में एक दलित युवक तरुण खटीक की नृशंस हत्या में तब्दील हो गया। 26 वर्षीय तरुण अपने दोस्तों के साथ होली खेलकर घर लौट रहा था जब एक समूह उसका इंतजार कर रहा था। लोहे की रॉड और डंडों से उस पर बेरहमी से प्रहार किए गए। सिर पर कई चोटें खाने के बाद 5 मार्च को अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, यह एक इंसान का, एक दलित हिंदू युवक का, एक परिवार के सपनों का कत्ल था।

घटना की जड़ें उस क्षण में हैं जब तरुण के परिवार की एक छोटी बच्ची ने छत से पानी का गुब्बारा फेंका, जो नीचे सड़क पर खड़ी दूसरे समुदाय की महिला पर जा गिरा। इस पर महिला बुरी तरह क्रोधित हो गई, तरुण के परिवार ने तत्काल माफी भी मांगी, लेकिन माफी स्वीकार करने के बजाय उस महिला ने अपने समुदाय के बीस-पच्चीस लोगों को एकत्र कर लिया। देखते ही देखते बहस हाथापाई में बदल गई। तरुण के पिता मेमराज और परिवार के अन्य सदस्य भागकर घर में घुस गए, लेकिन हमलावरों ने बाहर से दरवाजे बंद कर दिए। उनके भाई के सिर में टांके लगे, हाथ टूटा, पत्नी पिटी, और खुद मेमराज की आंखों में चोटें आईं। जब तरुण होली खेलकर लौटा, तो हमलावर उसके लिए पहले से तैयार थे। जो घटनाक्रम इसके बाद हुआ वह किसी सभ्य समाज को शर्मसार कर देने के लिए पर्याप्त है।

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक चौदह से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक नाबालिग और विवाद की सूत्रधार सायरा उर्फ काली भी शामिल हैं। मुख्य आरोपी निजामुद्दीन की अवैध संपत्ति पर दिल्ली नगर निगम का बुलडोजर भी चला। मामले में अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी जोड़ी गई हैं। इलाके में भारी पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, परिवहन मंत्री पंकज सिंह और अन्य नेताओं ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की। ये सब जरूरी कदम थे और इनकी सराहना की जानी चाहिए। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई से परे जो प्रश्न उठता है, वह इससे कहीं अधिक गहरा और असहज करने वाला है।

वह प्रश्न है देश के तथाकथित दलित चिंतकों, सेकुलर दलों और मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी का। तरुण खटीक एक दलित था। खटीक समाज अनुसूचित जाति की श्रेणी में आता है। उसकी हत्या में एससी/एसटी एक्ट लगाया गया। फिर भी जिन नेताओं, बुद्धिजीवियों और संगठनों ने दलित उत्पीड़न के नाम पर सड़कें जाम की हैं, संसद ठप की है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को कटघरे में खड़ा किया है, वे सब आज मौन हैं। राहुल गांधी की कांग्रेस, जो हर दलित मुद्दे पर ‘न्याय यात्रा’ निकालती है, इस हत्याकांड पर कहीं दिखाई नहीं दी। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की राजनीति करती है, ने कोई बयान जारी नहीं किया। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, जिसने दिल्ली की सत्ता में रहते हुए इसी जेजे कॉलोनी जैसी बस्तियों के वोट बटोरे, वह भी खामोश रही।

इस चुप्पी को समझने के लिए किसी जटिल राजनीतिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं। उत्तर बिल्कुल सीधा है: दलित पीड़ा इन दलों के लिए एक राजनीतिक औजार है, न कि कोई नैतिक सरोकार। जब पीड़ित दलित हो और आरोपी उच्च जाति का हिंदू हो, तो यह मुद्दा राष्ट्रीय आपातकाल बन जाता है। चैनलों पर बहसें होती हैं, प्रेस कांफ्रेंस होती हैं, दिल्ली से लेकर लंदन तक प्रदर्शन होते हैं। लेकिन जैसे ही आरोपी किसी अन्य समुदाय का हो, वैसे ही इन दलों की जुबान पर ताला लग जाता है। यह दोहरापन न केवल बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि उन करोड़ों दलितों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात भी है जिन्होंने इन दलों पर भरोसा किया।

यहीं पर AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष शोएब जमई का वह बयान भी विचारणीय है जिसमें उन्होंने तरुण की हत्या को ‘सेल्फ डिफेंस’ बताया और दावा किया कि पहले मुस्लिम महिला के साथ छेड़खानी हुई थी। पुलिस की प्रारंभिक जांच और पीड़ित परिवार के बयान इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं। पुलिस के अनुसार नौ वर्षीया बच्ची से अनजाने में हुई गलती पर माफी मांगी जा चुकी थी। इसके बावजूद बड़े समूह को एकत्र कर हमला किया गया और तरुण की प्रतीक्षा में रहकर उसे घात लगाकर मारा गया। इसे ‘सेल्फ डिफेंस’ कहना वास्तव में घटना को ऐसा रंग देने का प्रयास है जो न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश भी।

इस मामले में एक अन्य तथ्य जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह है देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों का रवैया। जिस घटना पर उत्तर प्रदेश के एटा में भी इसी पैटर्न पर दलित युवक आकाश के साथ होली के दिन हमला हुआ, उस पर राष्ट्रीय मीडिया ने अत्यंत संयमित और न्यूनतम कवरेज दी। यह वही मीडिया है जो किसी अन्य संदर्भ में हुई घटनाओं पर दिन-रात प्राइम टाइम बहस चलाता है, विशेषज्ञों की फौज खड़ी करता है और अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय करता है। तरुण खटीक की हत्या इन मानकों पर ‘उपयुक्त शिकार’ नहीं थी, इसलिए वह ‘उपयुक्त समाचार’ भी नहीं बनी।

इस पूरे प्रकरण में एक और पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खटीक समाज ने जिस तरह देशभर में एकजुट होकर प्रतिक्रिया दी, राजस्थान के बिजौलिया से लेकर जयपुर तक ज्ञापन दिए और फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमे की मांग की, वह समाज की आंतरिक शक्ति का परिचायक है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस समाज को न कांग्रेस की ‘न्याय’ यात्राओं का साथ मिला, न किसी बड़े दलित बुद्धिजीवी की आवाज। जो लोग बाबा साहेब अंबेडकर की विरासत का झंडा थामने का दावा करते हैं, उनमें से किसी ने भी इस परिवार के दरवाजे पर दस्तक नहीं दी।

यह घटना एक दर्पण है जो भारतीय राजनीति के उस चेहरे को दिखाता है जिसे हम देखना नहीं चाहते। दलित राजनीति, जो मूलतः वंचित समाज के उत्थान और न्याय के लिए थी, आज पूरी तरह ‘वोट बैंक की गणित’ बन चुकी है। तरुण खटीक की मौत उस गणित में कहीं नहीं आती क्योंकि उसके आरोपी ‘गलत समुदाय’ के हैं। इस चयनात्मक संवेदना ने दलित आंदोलन की नैतिक शक्ति को खोखला कर दिया है। जब न्याय की मांग इस बात पर निर्भर हो जाए कि पीड़ित का नाम क्या है और आरोपी किस मजहब का है, तो न्याय नहीं, राजनीति होती है।

राष्ट्रीय स्तर पर एक और गंभीर प्रश्न यह उठता है कि क्या इस देश में दलित तभी ‘दलित’ होता है जब उसकी पीड़ा किसी राजनीतिक दल के लिए उपयोगी हो? तरुण खटीक की माँ अपने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए बैठी है। उसके पिता मेमराज की आंखें अभी भी उस रात की चोट से दर्द कर रही हैं, और उनके अंदर का दर्द इससे भी गहरा है जब वे देखते हैं कि जिन नेताओं के सामने वे कभी खड़े होकर ताली बजाते थे, वे आज उनकी सुनवाई के लिए कहीं नहीं हैं। यह भावनात्मक शोषण उतना ही क्रूर है जितना वह लोहे की रॉड जो उनके बेटे के सिर पर पड़ी।

इस समाचार का एक और आयाम है जो दीर्घकालिक सोच की मांग करता है। देश के घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में विभिन्न समुदायों के बीच सह-अस्तित्व की चुनौती बढ़ती जा रही है। जेजे कॉलोनियाँ, जो मूलतः गरीबों के अनौपचारिक आवास क्षेत्र हैं, आज उन तनावों का केंद्र बन रही हैं जहाँ छोटी-सी चिंगारी भी बड़ी आग पैदा कर सकती है। इन क्षेत्रों में पुलिस की उपस्थिति, सामुदायिक संवाद और कानून का समान डर स्थापित करना राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन तब तक के लिए जो सबसे जरूरी है, वह है न्याय की निष्पक्ष और त्वरित प्रक्रिया। तरुण के आरोपियों को कठोरतम दंड मिले, यही उसके परिवार का और इस समाज का अधिकार है।

उत्तम नगर की जेजे कॉलोनी की यह घटना केवल एक हत्या नहीं है। यह एक कसौटी है जो परखती है कि इस देश में न्याय का तराजू सचमुच बराबर है या नहीं। यह परखती है कि दलित की पीड़ा पर आँसू बहाने वाले नेता सच में संवेदनशील हैं या केवल सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं। और यह परखती है कि भारतीय मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाने में सक्षम है या वह भी उस चयनात्मकता का शिकार हो चुका है जो किसी एक समुदाय की पीड़ा को खबर और दूसरे की पीड़ा को मौन बना देती है। तरुण खटीक का न्याय सिर्फ उसके परिवार का नहीं, पूरे देश के दलित समाज का और उस हर भारतीय का प्रश्न है जो यह मानता है कि इंसानी जान की कीमत एक जैसी होती है, चाहे उसका नाम कुछ भी हो।

Samvad 24 Office
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