मध्य-पूर्व में बढ़ती जंग: ईरान, अमेरिका और इजरायल की टकराहट से बदलते वैश्विक समीकरण
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। मध्य-पूर्व एक बार फिर वैश्विक राजनीति के सबसे संवेदनशील और विस्फोटक केंद्र के रूप में उभर आया है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच हाल के दिनों में बढ़ा सैन्य टकराव केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष भर नहीं रह गया है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक ऊर्जा बाजार, सामरिक संतुलन और विश्व अर्थव्यवस्था तक फैलते दिखाई दे रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से ईरान और इजरायल के बीच छाया युद्ध की स्थिति बनी हुई थी, जिसमें साइबर हमले, गुप्त सैन्य कार्रवाइयाँ और प्रॉक्सी संगठनों के माध्यम से संघर्ष जारी था। किंतु हालिया घटनाक्रमों ने इस टकराव को खुली सैन्य कार्रवाई में बदल दिया है, जिससे पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया की ओर टिक गई हैं।
संघर्ष के हालिया दौर की शुरुआत उस समय हुई जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए। इन हमलों को लेकर पश्चिमी देशों का तर्क था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी सैन्य क्षमताओं को सीमित करना आवश्यक हो गया था, क्योंकि उनका आरोप है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर ईरान ने इन हमलों को अपनी संप्रभुता पर सीधा आक्रमण बताया और इसे युद्ध की कार्रवाई मानते हुए तत्काल जवाबी हमले शुरू कर दिए। इसके बाद क्षेत्र में मिसाइलों, ड्रोन और हवाई हमलों की श्रृंखला शुरू हो गई, जिसने पूरे मध्य-पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया।
ईरान की जवाबी कार्रवाई ने इस संघर्ष को और अधिक गंभीर बना दिया। ईरानी सेना और उससे जुड़े सैन्य ढाँचों ने न केवल इजरायल बल्कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। इराक, सीरिया और फारस की खाड़ी के आसपास स्थित कई अमेरिकी अड्डों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की खबरें सामने आईं। इसके साथ ही ईरान समर्थित समूहों की सक्रियता भी बढ़ गई। लेबनान में सक्रिय हिज़्बुल्लाह, इराक के कुछ शिया मिलिशिया समूह और यमन में हूती विद्रोही पहले से ही ईरान के रणनीतिक सहयोगी माने जाते हैं, और इन संगठनों की गतिविधियों ने इस संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदलने की आशंका को और प्रबल कर दिया है।
इजरायल ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई को तेज करते हुए ईरान के कई ठिकानों पर लक्षित हमले किए। इजरायली नेतृत्व का कहना है कि ईरान लंबे समय से उसके अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है और यदि समय रहते उसकी सैन्य क्षमता को नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में यह खतरा और गंभीर हो सकता है। इजरायल के लिए यह केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी कारण उसने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान की सैन्य और परमाणु संरचनाओं को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई है।
इस संघर्ष के बीच ईरान की आंतरिक राजनीति में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। युद्ध के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़ी घटनाओं ने देश की राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। नई नेतृत्व व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता बनाए रखे और साथ ही बाहरी मोर्चे पर सैन्य दबाव का सामना भी करे। ईरान की सरकार इस संघर्ष को राष्ट्रीय प्रतिरोध और संप्रभुता की रक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिससे देश के भीतर जनसमर्थन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू फारस की खाड़ी और विशेष रूप से होरमुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि इस जलमार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है तो उसका सीधा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ना स्वाभाविक है। ईरान ने संकेत दिया है कि यदि उस पर सैन्य दबाव बढ़ाया गया तो वह इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय जहाज कंपनियाँ और ऊर्जा कंपनियाँ इस क्षेत्र की स्थिति को लेकर अत्यंत सतर्क हो गई हैं।
युद्ध के प्रभाव का सबसे पहला असर वैश्विक ऊर्जा बाजार में दिखाई दिया है। जैसे ही संघर्ष तेज हुआ, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है या होरमुज जलडमरूमध्य में बाधा उत्पन्न होती है तो तेल की कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं। इसका प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक महंगाई, उत्पादन लागत और परिवहन खर्च पर भी पड़ेगा। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें कई देशों की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इस संकट के असर के संकेत मिलने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है और निवेशकों का रुझान सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में युद्ध लंबा चलता है तो यह वैश्विक आर्थिक विकास की गति को धीमा कर सकता है। पहले से ही कई देशों की अर्थव्यवस्थाएँ महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही हैं। ऐसे में एक नया सैन्य संकट वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को और जटिल बना सकता है।
इस संघर्ष का प्रभाव केवल अमेरिका, इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व के देशों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और तुर्की जैसे देश इस संकट को लेकर सावधानीपूर्वक संतुलित नीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन देशों के लिए यह स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि वे एक ओर क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं और दूसरी ओर अपने आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा भी करना चाहते हैं।
वैश्विक कूटनीति के स्तर पर भी इस संकट को लेकर व्यापक गतिविधियाँ देखने को मिल रही हैं। कई यूरोपीय देशों ने इस संघर्ष को सीमित रखने और बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने की अपील की है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी दोनों पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में तत्काल समाधान की संभावना बहुत स्पष्ट दिखाई नहीं देती, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने रणनीतिक हितों को लेकर बेहद दृढ़ रुख अपनाए हुए हैं।
रूस और चीन जैसे देश इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए हैं। मध्य-पूर्व में अस्थिरता का प्रभाव इन देशों के आर्थिक और रणनीतिक हितों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर कई नई पहल देखने को मिल सकती हैं।
भारत के लिए भी यह संकट कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है और इस क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है तो इसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा दोनों पर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त समुद्री व्यापार मार्गों पर प्रभाव पड़ने से भारत के आयात-निर्यात पर भी असर पड़ने की संभावना है। इसलिए भारत के नीति-निर्माता इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद सतर्कता से नजर बनाए हुए हैं।
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह संघर्ष सीमित सैन्य टकराव तक सीमित रहेगा या फिर व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। इतिहास यह बताता है कि मध्य-पूर्व के संघर्ष अक्सर अप्रत्याशित दिशा में बढ़ जाते हैं और कई बार इसमें नए पक्ष भी शामिल हो जाते हैं। यदि ऐसा हुआ तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।
वर्तमान परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि विश्व राजनीति एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहा यह संघर्ष उसी व्यापक परिघटना का हिस्सा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस संकट को नियंत्रित कर पाते हैं या फिर यह टकराव एक लंबे और जटिल संघर्ष का रूप ले लेता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व की यह आग केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके धुएँ का असर पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर महसूस किया जा रहा है।






