फिर संघ पर निशाना: राजनीति बनाम वैचारिक संघर्ष
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अभिनय दीक्षित: भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का नाम अक्सर विवादों के केंद्र में रहा है। कभी कांग्रेस हो या कोई अन्य विपक्षी दल, संघ पर आरोप लगाने का चलन दशकों से जारी है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या यह विरोध वैचारिक है या केवल राजनीतिक रणनीति?
संघ की स्थापना 1925 में डॉक्टर हेडगेवार ने समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के उद्देश्य से की थी। वर्षों से संघ अपने अनुशासित संगठन, सेवा कार्यों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर, कांग्रेस का इतिहास भी राष्ट्रनिर्माण और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। फिर भी इन दोनों के बीच टकराव की जड़ विचारधारा में निहित है—जहाँ कांग्रेस “धर्मनिरपेक्षता” का स्वर देती है, वहीं संघ “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” की बात करता है।
हर बार जब भी कांग्रेस संकट में घिरती है, तब संघ पर आरोपों की बौछार देखी जाती है। नेहरू काल से लेकर इंदिरा गांधी तक और अब तक, संघ को “साम्प्रदायिक” या “विभाजनकारी” ठहराने की कोशिशें की जाती रही हैं। परंतु यह भी सत्य है कि संघ ने देश में सेवा कार्यों, शिक्षा, आपदा राहत और सामाजिक समरसता के लिए लगातार योगदान दिया है।
संघ के आलोचक इसे ‘राजनीतिक एजेंडा’ से प्रेरित मानते हैं, जबकि समर्थक इसे ‘राष्ट्र की आत्मा’ का प्रतिनिधि बताते हैं। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि संघ का प्रभाव आज केवल राजनीति तक सीमित नहीं है — वह सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों तक गहराई से फैला हुआ है।
कांग्रेस द्वारा बार-बार संघ को निशाना बनाना एक ओर उसे अपनी वैचारिक स्थिति स्पष्ट करने का अवसर देता है, लेकिन दूसरी ओर यह उसके भीतर असुरक्षा और भ्रम की भावना को भी उजागर करता है। देश में लोकतंत्र का अर्थ वैचारिक विविधता है, न कि वैचारिक वैमनस्य।
अब समय है कि राजनीतिक दल वैचारिक बहस को नकारात्मक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर सकारात्मक विमर्श में बदलें। संघ को बदनाम करने या उसका राजनीतिक लाभ उठाने से न तो लोकतंत्र मजबूत होगा और न ही राष्ट्र का हित सधेगा। राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता—दोनों भारतीय संविधान के स्तंभ हैं; इन्हें परस्पर विरोधी नहीं, पूरक रूप में देखा जाना चाहिए।






