इतिहास की अवहेलना नहीं बल्कि उसका पुनर्स्थापन, जब एक हिस्से का नाम बदला गया, तब इतिहास भी बदला गया: ‘कांपिल्य’ की पुनर्प्रतिष्ठा क्यों जरूरी
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। किसी भी सभ्यता में नगरों और क्षेत्रों के नाम केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं रखे जाते, वे उस समाज की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मसम्मान का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र में यह तथ्य और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ नगरों के नाम सहस्रों वर्षों की परंपरा, ग्रंथों और जनश्रुतियों से जुड़े होते हैं।
उत्तर प्रदेश का वर्तमान फर्रुखाबाद जिला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जो वस्तुतः प्राचीन कांपिल्य (कम्पिल) है, महाभारतकालीन दक्षिण पंचाल की राजधानी, द्रौपदी की जन्मस्थली और जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर विमलनाथ की जन्मभूमि। इसके बावजूद आज यह भूभाग एक ऐसे नाम से जाना जाता है, जो न तो इसके वैदिक-पौराणिक अतीत से जुड़ा है और न ही इसकी सांस्कृतिक अस्मिता से।
यह नाम एक मुगल बादशाह को प्रसन्न करने के लिए रखा गया था। प्रश्न सीधा और कठोर है, क्या स्वतंत्र भारत में भी हम किसी आक्रांता या दरबारी खुशामद के प्रतीक नाम को अपनी पहचान बनाए रखें? या फिर अपने वास्तविक ऐतिहासिक नाम को पुनः स्थापित करें? यह केवल नाम बदलने का प्रश्न नहीं है, यह इतिहास बनाम मानसिक दासता का प्रश्न है।
कांपिल्य का उल्लेख किसी आधुनिक इतिहासकार की कल्पना नहीं, बल्कि वैदिक साहित्य में मिलता है। यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता में इसका नाम ‘कंपिला’ रूप में दर्ज है। यह तथ्य सिद्ध करता है कि कांपिल्य वैदिक युग से जाना-पहचाना नगर था। पुराणों में पंचाल जनपद का वर्णन मिलता है, जिसके राजा भद्राश्व के पुत्र कपिल के नाम पर इस नगर का नाम कांपिल्य पड़ा माना जाता है। पुराणों में पंचाल के राजा के रूप में अजमीढ़ का उल्लेख है। इसी वंश में राजा नीप और ब्रह्मदत्त जैसे शासक हुए। यह वंशावली यह सिद्ध करती है कि कांपिल्य कोई गौण नगर नहीं, बल्कि एक संगठित राज्य की राजधानी रहा है।
महाभारत से पूर्व पंचाल जनपद गंगा के दोनों तटों तक फैला हुआ था, महाभारत में वर्णित द्रोणाचार्य और राजा द्रुपद का संघर्ष इस नगर की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट करता है। द्रोणाचार्य ने द्रुपद को पराजित कर पांचाल को दो हिस्सों में बांट दिया उत्तर पांचाल और दक्षिण पांचाल। द्रोणाचार्य ने उत्तर पंचाल को अपनी कब्जे में लेकर द्रुपद को केवल दक्षिण पंचाल का शासक रहने दिया। इसके पश्चात उत्तर पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र बनी एवं दक्षिण पंचाल की राजधानी कांपिल्य।
महाभारत में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि उस समय दक्षिण पंचाल की राजधानी कांपिल्य थी। महाभारत के अनुसार द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का जन्म यही हुआ था। यहीं द्रौपदी कुंड स्थित है, यह कोई लोककथा मात्र नहीं है, क्योंकि इस कुंड से भारी मात्रा में प्राचीन ईंटें मिली हैं, जिन्हें विद्वान मौर्यकाल या उससे भी प्राचीन मानते हैं। अर्थात, कांपिल्य का महाभारत से संबंध भावनात्मक नहीं, भौतिक और स्थलाकृतिक प्रमाणों से भी जुड़ा है।
इतिहासकार जब केवल ग्रंथों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि भूमि के नीचे दबे अवशेषों को सामने लाते हैं, तब इतिहास कल्पना नहीं रह जाता, विज्ञान बन जाता है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद अलेक्जेंडर कनिंघम और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़े विद्वान बी.बी. लाल ने कांपिल्य क्षेत्र में खुदाई कर Painted Grey Ware (PGW) संस्कृति के अवशेष पाए। PGW संस्कृति को सामान्यतः महाभारतकालीन सभ्यता से जोड़ा जाता है।
इन अवशेषों से यह सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में कम से कम 1000 ईसा पूर्व से नगरीय बसावट थी। इसके अतिरिक्त यहाँ ‘द्रुपद का किला’ कहे जाने वाले विशाल ढूह के अवशेष आज भी विद्यमान हैं, जिन्हें स्थानीय परंपरा प्राचीन राजदुर्ग मानती है। यह सब इस बात का प्रमाण है कि कांपिल्य कोई मिथकीय नगर नहीं, बल्कि एक वास्तविक ऐतिहासिक नगरी थी।
कांपिल्य की महत्ता केवल हिंदू परंपरा तक सीमित नहीं रही। जैन धर्म में भी कांपिल्य का विशेष स्थान है, क्योंकि यह 13वें तीर्थंकर विमलनाथ की जन्मभूमि मानी जाती है। यहाँ से अनेक तीर्थंकर प्रतिमाएँ और जैन अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह नगर जैन धर्म का एक समय प्रमुख केंद्र रहा।
बौद्ध साहित्य में इसे ‘कंपिलरट्ठ’ या ‘कांपिल्य राष्ट्र’ कहा गया है। ब्रह्मदत्त जातक में दक्षिण पंचाल को इसी नाम से पुकारा गया है।
चीनी यात्री युवान च्वांग (ह्वेनसांग) ने सातवीं शताब्दी में अपनी यात्रा के दौरान इस नगर का उल्लेख किया है। बौद्ध किंवदंती के अनुसार बुद्ध ने यहाँ चमत्कार किए और स्वर्ग से उतरकर इसी भूमि पर आए।
इस प्रकार कांपिल्य एक ऐसा नगर है जिसे हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों परंपराएँ ऐतिहासिक और पवित्र मानती हैं।
इतिहास का सबसे विडंबनापूर्ण अध्याय तब शुरू होता है, जब इस प्राचीन नगर का नाम बदलकर फर्रुखाबाद कर दिया गया। अठारहवीं शताब्दी में नवाब मुहम्मद खां बंगश ने अपने मुगल बादशाह फर्रुखसियर को प्रसन्न करने के लिए इस क्षेत्र का नाम बदल दिया। यह नामकरण किसी जनआंदोलन, किसी सांस्कृतिक परिवर्तन या किसी ऐतिहासिक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि दरबारी खुशामद की उपज था। यानी, कांपिल्य – सहस्राब्दियों का इतिहास और फर्रुखाबाद – कुछ वर्षों की राजनीतिक चापलूसी। यह परिवर्तन स्थानीय समाज की इच्छा से नहीं हुआ, बल्कि सत्ता के दबाव से थोपा गया। यही कारण है कि यह नाम इस भूमि की आत्मा से मेल नहीं खाता।
आज भी जब हम इस जिले को फर्रुखाबाद कहते हैं, तो अनजाने में हम उस दौर को स्वीकार करते हैं, जब हमारे नगरों के नाम आक्रांताओं की मर्जी से बदले जाते थे। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक मानसिक परंपरा है कि हम अपने मूल इतिहास को छोड़कर आक्रांताओं द्वारा दिए गए नामों को पहचान मान लें।
यदि किसी स्थान का नाम उसके वास्तविक अतीत को ढँक दे, तो यह इतिहास का अपमान है। कांपिल्य कहना हमें द्रुपद, द्रौपदी, पंचाल, विमलनाथ और युवान च्वांग से जोड़ता है। फर्रुखाबाद कहना हमें केवल एक मुगल शासक की स्मृति से जोड़ता है। यह अंतर बताता है कि नाम का चयन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का चयन है।
भारत में पहले भी ऐसे नाम बदले गए हैं, जो औपनिवेशिक या आक्रांता-प्रेरित थे, जैसे इलाहाबाद से प्रयागराज, फैजाबाद से अयोध्या, मुगलसराय से पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर। इन परिवर्तनों का उद्देश्य इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उसे सही संदर्भ में पुनर्स्थापित करना था। इसी क्रम में फर्रुखाबाद का नाम कांपिल्य करना कोई अपवाद नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निरंतरता का अगला चरण होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘महाभारत सर्किट’ में कांपिल्य को शामिल करने की योजना इस बात का प्रमाण है कि राज्य स्वयं इस क्षेत्र की पौराणिक महत्ता को स्वीकार कर रहा है। यदि इसका नाम कांपिल्य किया जाए, तो हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, कुरुक्षेत्र, कांपिल्य जैसी श्रृंखला पूरी होगी। इससे धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।
फर्रुखाबाद को कांपिल्य कहना किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि इतिहास के पक्ष में खड़ा होना है। यह कहना है कि यह भूमि द्रुपद और द्रौपदी की है, न कि किसी दरबारी परंपरा की। यह नगर विमलनाथ और बुद्ध की स्मृति से जुड़ा है, न कि केवल फर्रुखसियर से। यदि हम आज भी इस क्षेत्र को फर्रुखाबाद कहते रहेंगे, तो हम अनजाने में यह स्वीकार करेंगे कि आक्रांता द्वारा दिया गया नाम हमारे इतिहास से बड़ा है।
इसलिए यह मांग केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैदिक साहित्य, महाभारत, पुराण, बौद्ध और जैन ग्रंथ, चीनी यात्रियों के विवरण और पुरातात्विक प्रमाणों पर आधारित है कि फर्रुखाबाद का नाम पुनः ‘कांपिल्य’ किया जाए। यह परिवर्तन किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक चेतना का पुनर्जागरण होगा। यह घोषणा होगी कि हम अपने अतीत से शर्मिंदा नहीं, बल्कि उस पर गर्व करते हैं। और यही गर्व किसी भी सभ्य राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान होता है।






