चांदी की खामोश खरीद और डॉलर की बेचैनी: क्या दुनिया नई आर्थिक धुरी की ओर बढ़ रही है?
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब छोटे-से दिखने वाले संकेत आने वाले बड़े तूफान की भूमिका बनते हैं। अक्सर ये संकेत शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव में नहीं, बल्कि उन फैसलों में छिपे होते हैं जो राष्ट्र चुपचाप लेते हैं। हाल के महीनों में चीन, भारत और रूस द्वारा चांदी की बढ़ती खरीद को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इसे केवल एक कमोडिटी ट्रेंड मानकर नज़रअंदाज़ करना, शायद भविष्य की आर्थिक सच्चाइयों से आँख चुराने जैसा होगा।
प्रसिद्ध निवेशक और लेखक Robert Kiyosaki ने इसी संदर्भ में एक कड़ी चेतावनी दी है। उनका सवाल सीधा, लेकिन असहज करने वाला है, यदि सब कुछ सामान्य है, यदि अमेरिकी डॉलर अब भी उतना ही मज़बूत है, तो दुनिया की तीन बड़ी उभरती और स्थापित शक्तियाँ चांदी को इतनी आक्रामकता से क्यों जमा कर रही हैं?
यह प्रश्न केवल निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि जब राष्ट्र अपनी रणनीति बदलते हैं, तो उसके प्रभाव बहुत दूर तक जाते हैं।
आज की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर के इर्द-गिर्द घूमती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कर्ज़, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी मुद्रा भंडार सब पर डॉलर का प्रभुत्व दशकों से बना हुआ है। लेकिन हाल के वर्षों में यह प्रभुत्व पहले जैसा निर्विवाद नहीं रह गया है। बढ़ता अमेरिकी कर्ज़, लगातार छपती मुद्रा, भू-राजनीतिक प्रतिबंधों का हथियार के रूप में प्रयोग और वैश्विक अविश्वास इन सभी ने डॉलर की साख पर धीरे-धीरे सवाल खड़े किए हैं।
इसी पृष्ठभूमि में कियोसाकी की चेतावनी को देखा जाना चाहिए। वे लंबे समय से यह कहते आए हैं कि फिएट करेंसी यानी कागजी मुद्रा अंततः भरोसे पर टिकी होती है, और जब यह भरोसा टूटता है, तब वास्तविक संपत्तियाँ ही असली मूल्य बचाती हैं। चांदी, उनके अनुसार, ऐसी ही एक संपत्ति है, लेकिन वह केवल निवेश का साधन नहीं, बल्कि औद्योगिक और रणनीतिक संसाधन भी है।
चांदी की विशेषता यह है कि वह दो दुनिया को जोड़ती है। एक ओर वह हजारों वर्षों से मूल्य संरक्षण का माध्यम रही है, दूसरी ओर आधुनिक तकनीक की रीढ़ भी बन चुकी है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, चिकित्सा उपकरण, 5G तकनीक इन सभी में चांदी की भूमिका निर्णायक है। इसका अर्थ यह है कि चांदी की मांग केवल निवेश भावनाओं पर नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकी और ऊर्जा आवश्यकताओं पर भी निर्भर करती है।
यहीं से यह मुद्दा साधारण कमोडिटी रिपोर्ट से निकलकर रणनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाता है। यदि दुनिया हरित ऊर्जा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ रही है, तो चांदी केवल कीमती धातु नहीं रह जाती, वह भविष्य की अर्थव्यवस्था का कच्चा माल बन जाती है।
चीन की भूमिका इस पूरी कहानी में सबसे अधिक विचारणीय है। चीन ने कभी शोर नहीं मचाया, लेकिन उसने लगातार अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी घटाई है और सोने-चांदी जैसे भौतिक संसाधनों का भंडार बढ़ाया है। यह बदलाव अचानक नहीं है; यह वर्षों से चल रही एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
चीन जानता है कि तकनीकी प्रभुत्व और आपूर्ति श्रृंखला नियंत्रण ही आने वाले दशकों की शक्ति तय करेंगे। सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में वैश्विक बढ़त बनाए रखने के लिए चांदी जैसी धातुओं पर पकड़ ज़रूरी है। इसलिए चीन की चांदी खरीद को केवल वित्तीय निवेश नहीं, बल्कि औद्योगिक सुरक्षा कवच के रूप में देखना अधिक यथार्थवादी होगा।
भारत की स्थिति कुछ अलग, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत में चांदी का संबंध केवल बाज़ार से नहीं, संस्कृति और परंपरा से भी जुड़ा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में चांदी आज भी बचत का माध्यम है। लेकिन हाल के वर्षों में तस्वीर बदल रही है। भारत का सोलर मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग पर ज़ोर और इलेक्ट्रिक वाहनों की नीति इन सभी ने चांदी की औद्योगिक मांग को तेज़ी से बढ़ाया है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत की बढ़ती चांदी खरीद भविष्य की ऊर्जा और तकनीकी ज़रूरतों की तैयारी भी है। साथ ही, यह संकेत भी कि भारत वैश्विक मुद्रा अस्थिरता के बीच केवल कागजी संपत्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
रूस की कहानी सबसे स्पष्ट और सबसे कठोर है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को यह सिखा दिया कि विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग सिस्टम किसी भी समय राजनीतिक हथियार बन सकते हैं। ऐसे में भौतिक संपत्तियाँ, जिन्हें न फ्रीज़ किया जा सकता है, न डिजिटल आदेश से निष्क्रिय राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार बन जाती हैं।
रूस द्वारा चांदी को रणनीतिक संसाधन के रूप में देखना इसी अनुभव का परिणाम है। यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संप्रभुता से जुड़ा हुआ है।
इन तीनों देशों की रणनीतियों को जोड़ने पर एक साझा धागा दिखाई देता है, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश। यह प्रक्रिया, जिसे आज “डी-डॉलराइज़ेशन” कहा जाता है, किसी एक दिन में पूरी नहीं होगी। लेकिन इसके संकेत स्पष्ट हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ, और भौतिक संपत्तियों का संचय ये सभी उसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि डॉलर का अंत निकट है ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि डॉलर का निर्विवाद वर्चस्व अब पहले जैसा नहीं रहा। और जब व्यवस्था बदलती है, तो सबसे पहले बड़े खिलाड़ी अपनी चाल चलते हैं।
निवेशकों के लिए इस पूरे परिदृश्य में आकर्षण भी है और खतरा भी। चांदी में तेज़ उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है। यह ऐसा बाज़ार नहीं है जहाँ अंधाधुंध उत्साह सुरक्षित माना जाए। स्वयं कियोसाकी भी चेतावनी देते हैं कि ऊँचे स्तर पर प्रवेश जोखिम भरा हो सकता है।
लेकिन अगर विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो मुद्दा केवल निवेश रिटर्न का नहीं है। असली सवाल यह है कि दुनिया किस दिशा में जा रही है। क्या हम उस दौर की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ भौतिक संसाधन, तकनीकी कच्चा माल और ऊर्जा धातुएँ मुद्रा से अधिक महत्वपूर्ण होंगी? यदि हाँ, तो चांदी की भूमिका आने वाले वर्षों में और भी केंद्रीय हो सकती है।
इतिहास गवाह है कि जब भी मौद्रिक व्यवस्थाएँ अस्थिर हुई हैं, तब सोना और चांदी जैसी संपत्तियों ने पुनः महत्व पाया है। आज की स्थिति अलग ज़रूर है, लेकिन मूलभूत मानव व्यवहार वही है, अनिश्चितता में ठोस चीज़ों की ओर लौटना।
चीन, भारत और रूस की चांदी खरीद इसी मनोविज्ञान का राष्ट्रीय स्तर पर किया गया संस्करण है। यह केवल बाज़ार संकेत नहीं, बल्कि नीति संकेत है।
हमारे दृष्टिकोण से यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें चेतावनी देता है कि आर्थिक समाचारों को केवल कीमतों और प्रतिशतों में न देखें। कभी-कभी असली कहानी उन खामोश फैसलों में छिपी होती है, जो भविष्य की दिशा तय करते हैं। चांदी की यह बढ़ती चमक शायद सिर्फ धातु की नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक सोच की चमक है।






