खाता ना वही जो ताकतवर कहे वही सही: अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वो कड़वी सच्चाई जो वैश्विक मंच पर दोहरे मापदंडों की पोल खोल रही है
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति को यदि एक वाक्य में समझना हो, तो भारत की एक पुरानी, पर अत्यंत सटीक कहावत पर्याप्त है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। यह कहावत केवल ग्रामीण समाज की शक्ति-संरचना का बयान नहीं है, बल्कि आज की तथाकथित आधुनिक, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का भी निचोड़ है। इक्कीसवीं सदी में, जब दुनिया मानवाधिकार, लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक संस्थाओं की बड़ी-बड़ी बातें करती है, तब जमीनी सच्चाई यह है कि ताकतवर के लिए नियम अलग हैं और कमजोर के लिए कानून एक कठोर दंड की तरह।
आज वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब भी जंगल राज कायम है। जो देश सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से मजबूत है, वही नियम तय करता है, वही न्यायाधीश बनता है और वही सज़ा देने वाला भी। बाकी दुनिया अधिकतम विरोध दर्ज करा सकती है, प्रस्ताव पारित कर सकती है या “गंभीर चिंता” व्यक्त कर सकती है, पर उससे आगे उसकी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून की अवधारणा इस विश्वास पर टिकी है कि सभी संप्रभु राष्ट्र बराबर हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर से लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संधियों तक, हर दस्तावेज़ यही दावा करता है कि किसी भी देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा। लेकिन व्यवहार में यह समानता केवल कागज़ों तक सीमित है। वास्तविक दुनिया में राष्ट्रों को उनकी नैतिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों या जनता के हितों से नहीं, बल्कि उनकी शक्ति से आँका जाता है। जिनके पास सेना है, धन है, वैश्विक मीडिया पर पकड़ है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में प्रभाव है, वे खुद को नियमों से ऊपर समझने लगते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपनी विश्वसनीयता खो देती है।
लैटिन अमेरिका दशकों से वैश्विक शक्ति-संघर्ष का मैदान रहा है। इस क्षेत्र में बार-बार यह देखा गया है कि स्थानीय सरकारों, नेताओं और नीतियों को बाहरी शक्तियों के हितों के अनुरूप ढालने की कोशिश की जाती रही है। इस पूरे परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है वेनेजुएला, ये केवल एक देश नहीं बल्कि एक प्रतीक है, स्वतंत्र निर्णय लेने की कोशिश करने वाले राष्ट्र का प्रतीक। उसके विशाल प्राकृतिक संसाधन, विशेष रूप से तेल, और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति उसे वैश्विक शक्ति-संतुलन में असहज स्थिति में ले आती है। जब कोई देश अपने संसाधनों और नीतियों पर स्वयं नियंत्रण रखना चाहता है, तो वह अचानक “अंतरराष्ट्रीय समस्या” बन जाता है। यहाँ सवाल यह नहीं है कि वेनेजुएला की आंतरिक राजनीति आदर्श है या नहीं। सवाल यह है कि किसी बाहरी शक्ति को यह अधिकार किसने दिया कि वह किसी संप्रभु देश के नेतृत्व, उसकी व्यवस्था और उसके भविष्य का फैसला करे? अगर किसी देश की आंतरिक स्थिति इतनी गंभीर है भी तो उसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन के नेतृत्व में कार्यवाही होनी चाहिए थी।
दुनिया की सबसे प्रभावशाली महाशक्ति स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्रता का वैश्विक रक्षक बताती है। उसके भाषणों, घोषणाओं और रणनीतिक दस्तावेज़ों में नैतिकता का विशेष स्थान होता है। लेकिन जब इन्हीं मानकों को उसके व्यवहार की कसौटी पर कसा जाता है, तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। जहाँ अमेरिकी हित सुरक्षित होते हैं, वहाँ लोकतंत्र की कमियाँ नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं। जहाँ हितों को चुनौती मिलती है, वहाँ वही कमियाँ गंभीर अपराध बन जाती हैं। यह चयनात्मक नैतिकता ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड है। इस दोहरे रवैये का परिणाम यह होता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून एक सिद्धांत नहीं, बल्कि दबाव का औज़ार बन जाता है। नियमों का इस्तेमाल न्याय के लिए नहीं, बल्कि विरोधियों को झुकाने के लिए किया जाता है।
संप्रभुता किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। यह वह आधार है जिस पर किसी देश की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान खड़ी होती है। लेकिन आज की दुनिया में संप्रभुता भी शक्ति के तराजू पर तौली जाती है। जब किसी देश के राष्ट्रपति या शीर्ष नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपराधी की तरह पेश किया जाता है, जब उस देश पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाकर उसकी जनता को ही सज़ा दी जाती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि संप्रभुता केवल कमजोर देशों के लिए एक खोखला शब्द बन चुकी है।यह स्थिति केवल एक देश की समस्या नहीं है। यह हर उस राष्ट्र के लिए चेतावनी है, जो यह मानकर चलता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून उसे सुरक्षा प्रदान करेगा।
आदर्शों और वास्तविकता के बीच फँसी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ
की स्थापना इस आशा के साथ की गई थी कि भविष्य में दुनिया युद्ध, हस्तक्षेप और शक्ति-आधारित राजनीति से ऊपर उठेगी। लेकिन दशकों बाद यह संस्था खुद उसी व्यवस्था की शिकार दिखाई देती है, जिसे सुधारने के लिए वह बनी थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का वीटो तंत्र यह साबित करता है कि कुछ देश आज भी विशेषाधिकार प्राप्त हैं। जब उन्हीं देशों के हित दांव पर होते हैं, तब अंतरराष्ट्रीय कानून ठहर जाता है, न्याय प्रक्रिया रुक जाती है और संस्थाएँ मौन धारण कर लेती हैं। इससे यह संदेश जाता है कि वैश्विक न्याय की अवधारणा केवल सिद्धांतों में जीवित है, व्यवहार में नहीं।
अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सबसे बड़ा संकट यह है कि उनके उल्लंघन की सज़ा समान नहीं है। कमजोर देशों के लिए प्रतिबंध, आर्थिक नाकेबंदी और राजनीतिक अलगाव तय हैं, जबकि शक्तिशाली देशों के लिए अधिकतम परिणाम आलोचना या रिपोर्ट तक सीमित रहते हैं। यह असमानता अंतरराष्ट्रीय कानून को निष्प्रभावी बना देती है। जब कानून सब पर समान रूप से लागू न हो, तो वह कानून नहीं, बल्कि ताकत का औज़ार बन जाता है।
आधुनिक दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि सूचनाओं और नैरेटिव के स्तर पर भी लड़े जाते हैं। वैश्विक मीडिया इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है। अक्सर किसी देश की जटिल सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को सरल, भावनात्मक और एकतरफा कहानी में बदल दिया जाता है। इससे आम जनता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि हस्तक्षेप न केवल आवश्यक है, बल्कि नैतिक रूप से सही भी है। इस प्रक्रिया में सच्चाई कहीं पीछे छूट जाती है और जनता को वही दिखाया जाता है, जो दिखाना सुविधाजनक हो।
संतुलन, सिद्धांत और स्वायत्तता के लिए यह वैश्विक परिदृश्य केवल दूर की घटना नहीं है। हमारा भारत स्वयं औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहा है और वह जानता है कि शक्ति का दुरुपयोग क्या होता है। भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत हमेशा संप्रभुता, संवाद और संतुलन रहा है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर आज की रणनीतिक स्वायत्तता तक, भारत ने यह प्रयास किया है कि वह किसी भी शक्ति-खंड का अंधानुकरण न करे। आज जब वैश्विक व्यवस्था एक बार फिर शक्ति-आधारित दिशा में बढ़ती दिख रही है, भारत जैसे देशों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नियम-आधारित व्यवस्था की वकालत करना केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न है।
दुनिया बहुध्रुवीय होने का दावा करती है, लेकिन व्यवहार में शक्ति अब भी सीमित हाथों में केंद्रित है। यदि यह असंतुलन बना रहा, तो भविष्य में छोटे और मध्यम देशों के लिए स्वतंत्र निर्णय लेना और कठिन होता जाएगा। ऐसी दुनिया में या तो देश किसी शक्ति-गुट में शामिल होने को मजबूर होंगे या फिर लगातार दबाव और अस्थिरता का सामना करेंगे। यह स्थिति वैश्विक शांति और स्थिरता दोनों के लिए घातक है।
यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि चेतावनी है। यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को वास्तव में न्यायपूर्ण बनाना है, तो नियमों को सार्वभौमिक बनाना होगा। ताकतवर देशों को भी वही सीमाएँ स्वीकार करनी होंगी, जो वे दूसरों पर थोपते हैं। अन्यथा दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि वह अब भी जंगल के नियमों पर चल रही है जहाँ न्याय नहीं, शक्ति निर्णायक है; जहाँ कानून नहीं, लाठी का राज है। जिसकी लाठी उसकी भैंस यदि यह वैश्विक राजनीति का स्थायी सिद्धांत बन गया, तो कल कोई भी देश सुरक्षित नहीं रहेगा। आज वेनेजुएला है, कल कोई और होगा। तब दुनिया के पास आलोचना के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचेगा और हो सकता है दुनिया अगले विश्व में विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी हो जाए।






