KG-D6 मामले में सरकार और रिलायंस आमने-सामने, 24.7 करोड़ डॉलर विवाद पर 2026 में आएगा आर्बिट्रेशन फैसला
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संवाद 24 जम्मू। भारत सरकार और Reliance Industries Limited के बीच कृष्णा-गोदावरी बेसिन के KG-D6 गैस ब्लॉक को लेकर करीब 13 साल से चला आ रहा वित्तीय विवाद अब अंतिम चरण में पहुंच गया है। सरकार का दावा है कि कंपनी पर 24.7 करोड़ डॉलर (करीब 2,218 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त मुनाफा बकाया है, जबकि मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इस दावे को सिरे से खारिज कर रही है। इस लंबे चले विवाद का फैसला 2026 की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के जरिए आने की उम्मीद है।
विवाद की जड़ क्या है?
यह मामला नई एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी (NELP) के तहत हुए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) से जुड़ा है। नियमों के मुताबिक, किसी भी ऑपरेटर को सरकार के साथ मुनाफा साझा करने से पहले अपने विकास और उत्पादन खर्चों की पूरी वसूली (कॉस्ट रिकवरी) का अधिकार होता है।
सरकार का आरोप है कि KG-D6 ब्लॉक में किए गए कुछ खर्च वाजिब नहीं थे, इसलिए उनसे जुड़ा मुनाफा सरकार को मिलना चाहिए। वहीं रिलायंस का कहना है कि जिन खर्चों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वे पहले ही मंजूर किए जा चुके थे और बाद में उन्हें अमान्य ठहराना अनुबंध की भावना के खिलाफ है।
रिलायंस का तर्क
कंपनी का कहना है कि पेट्रोलियम अन्वेषण उच्च जोखिम वाला क्षेत्र है, जिसमें सारा निवेश निजी कंपनियां करती हैं। KG-D6 परियोजना में सरकार ने न तो पूंजी लगाई और न ही जोखिम उठाया, इसके बावजूद उसे रॉयल्टी और टैक्स के रूप में लगातार राजस्व मिला।
रिलायंस के अनुसार, परियोजना की निगरानी एक मैनेजमेंट कमेटी करती थी, जिसमें सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे और हर बड़े फैसले पर उनकी सहमति जरूरी थी। ऐसे में बिना मंजूरी के किसी खर्च का सवाल ही नहीं उठता।
उत्पादन घटा, विवाद बढ़ा
KG-D6 ब्लॉक से गैस उत्पादन अनुमान से कम रहा, जिसका कारण अप्रत्याशित भूवैज्ञानिक समस्याएं बताई गईं। इसी के बाद सरकार ने विकास खर्चों के एक हिस्से को मान्यता देने से इनकार किया। रिलायंस इसे ‘दोहरा झटका’ करार देती है और कहती है कि प्राकृतिक जोखिमों के आधार पर किसी कंपनी को पीछे जाकर दंडित नहीं किया जा सकता।
ऊर्जा क्षेत्र के लिए अहम फैसला
रिलायंस का दावा है कि उसने KG-D6 को रिकॉर्ड समय में विकसित किया और इसे देश के प्रमुख डीपवॉटर गैस ब्लॉकों में शामिल किया। कंपनी यह भी कहती है कि गैस को बाजार दर से कम कीमत पर बेचा गया, जिससे उपभोक्ताओं और सरकार दोनों को फायदा हुआ।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह विवाद सिर्फ एक कंपनी और सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश, जोखिम और अनुबंधों की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा करता है।
2026 पर टिकी निगाह
अब सबकी नजरें 2026 की शुरुआत में आने वाले मध्यस्थता के फैसले पर हैं, जो तय करेगा कि रिलायंस को सरकार को अतिरिक्त मुनाफा चुकाना होगा या फिर उसे अपने पूरे मंजूरशुदा खर्चों की वसूली का अधिकार मिलेगा। यह फैसला भारत के तेल-गैस सेक्टर के भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकता है।






