रुपये की कमजोरी पर दो राय : सान्याल बोले ‘घबराहट बेवजह’, रिसर्च ने गिनाईं सीमाएँ

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संवाद 24 विशेष रिपोर्ट। भारतीय रुपये की लगातार गिरावट को लेकर जहां बाजार में बेचैनी दिख रही है, वहीं प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य Sanjeev Sanyal ने इस पर अलग ही नजरिया रखा है। उनका कहना है कि तेज़ विकास दर वाली अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा का कमजोर रहना असामान्य नहीं है और इसे सीधे आर्थिक संकट से जोड़कर देखना ठीक नहीं।
Times Network India Economic Conclave 2025 में सान्याल ने कहा कि इतिहास गवाह है—उच्च विकास के दौर में कई देशों ने कमजोर विनिमय दर देखी है। उन्होंने जापान और चीन का उदाहरण देते हुए बताया कि जब इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं तेज़ी से बढ़ रही थीं, तब उनकी मुद्राएं भी कमजोर रखी गई थीं। सान्याल के मुताबिक, रुपये की मौजूदा गिरावट तब तक चिंता का विषय नहीं है, जब तक उससे घरेलू महंगाई नहीं बढ़ती—और फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं दिखता।
हाल के हफ्तों में रुपया डॉलर के मुकाबले 90 से नीचे फिसलता हुआ 91 के पार चला गया। भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और विदेशी पूंजी की निकासी ने दबाव जरूर बढ़ाया, लेकिन सवाल यही है कि क्या यह गिरावट वाकई अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है?
रिसर्च की चेतावनी: फायदे सीमित
जहां नीति-निर्माताओं की ओर से संयम की बात कही जा रही है, वहीं रिसर्च रिपोर्ट्स कुछ अलग संकेत देती हैं। सिस्टेमैटिक्स रिसर्च के अनुसार, मुद्रा में गिरावट से निर्यात को मिलने वाला फायदा एकसार नहीं होता। इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी और पेट्रोलियम जैसे क्षेत्रों में कुछ बढ़त दिख सकती है, लेकिन आयात पर भारी निर्भरता के कारण लागत बढ़ जाती है, जिससे कुल लाभ कम हो जाता है। नतीजतन, व्यापार घाटा सुधरने के बजाय बढ़ भी सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि खाद्य और कृषि आधारित निर्यात ही ऐसे हैं, जिन्हें कम आयात-तीव्रता के कारण शुद्ध लाभ मिलता है।
एसबीआई रिसर्च: ‘शॉक एब्जॉर्बर’ नहीं रुपया
SBI Research का आकलन भी कुछ ऐसा ही है। उसके मुताबिक, रुपये में गिरावट निर्यात को प्रतिस्पर्धी जरूर बनाती है, लेकिन आयात की संरचना और अल्पकालिक मूल्य प्रभाव इस लाभ को काफी हद तक संतुलित कर देते हैं। यानी, निर्यात और आयात की प्रतिक्रियाएं एक-दूसरे को ऑफसेट कर देती हैं और अल्पकाल में व्यापार संतुलन पर बड़ा असर नहीं पड़ता।
जेफरीज का भरोसा: ज्यादा गिरावट की गुंजाइश नहीं
इन तमाम आशंकाओं के बीच ब्रोकरेज फर्म Jefferies ने अपेक्षाकृत आश्वस्त करने वाला रुख अपनाया है। उसका कहना है कि रुपया अब काफी हद तक अवमूल्यित हो चुका है और मौजूदा स्तरों पर स्थिर हो सकता है। मजबूत बाहरी मौलिक आधार, संभालने योग्य चालू खाता जोखिम और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार को उसने इसके प्रमुख कारण बताया है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, रुपये की कमजोरी को लेकर तस्वीर एकतरफा नहीं है। नीति-निर्माता इसे विकास-चक्र का हिस्सा मान रहे हैं, जबकि रिसर्च रिपोर्ट्स इसके सीमित फायदों की ओर इशारा कर रही हैं। ऐसे में साफ है कि घबराहट से ज्यादा ज़रूरी है—तथ्यों के आधार पर संतुलित

Samvad 24 Office
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