मौत की गहराई में छिपा अमरत्व: प्रमाणकोटि का वो काला सच, जब भीम ‘दशसहस्त्र’ हाथियों के बल से संपन्न हुए
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संवाद 24 डेस्क। महाराज पाण्डु की मृत्यु के पश्चात जब पाँचों पांडव कुंती के साथ हस्तिनापुर लौटे, तो प्रारंभ में उनका स्वागत हुआ। परंतु जैसे-जैसे समय बीतने लगा, धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) और पांडवों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। इस प्रतिस्पर्धा का केंद्र थे भीमसेन। भीम बचपन से ही शारीरिक बल में सभी सौ भाइयों पर भारी पड़ते थे। खेल-खेल में वे अकेले ही कई कौरवों को पछाड़ देते थे, उन्हें वृक्षों से गिरा देते थे और जल क्रीड़ा के समय उन्हें डुबोकर परेशान करते थे। यद्यपि भीम का उद्देश्य केवल बाल-क्रीड़ा था, किंतु दुर्योधन के हृदय में यह अपमान और भय की ज्वाला बन गया। दुर्योधन को लगा कि यदि भीम जीवित रहा, तो वह कभी भी राज्य का स्वामी नहीं बन पाएगा।
षड्यंत्र की रचना: ‘प्रमाणकोटि’ का आमंत्रण
दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि और भाई दुःशासन के साथ मिलकर एक घातक योजना बनाई। उन्होंने गंगा के तट पर ‘प्रमाणकोटि’ नामक स्थान पर एक भव्य जल-विहार (Picnic) का आयोजन किया।
- उद्देश्य: भीम को एकांत में ले जाकर मारना।
- तैयारी: वहाँ सुंदर शिविर लगाए गए और स्वादिष्ट व्यंजनों की व्यवस्था की गई।
- घातक चाल: दुर्योधन ने भीम के भोजन (खीर/मोदक) में ‘कालकूट’ नामक अत्यंत प्रभावशाली विष मिलवा दिया।

घटनाक्रम: विषपान और जल-समाधि
उत्सव के दौरान, पांडव और कौरव विभिन्न खेलों में व्यस्त थे। दुर्योधन ने बड़े प्रेम का ढोंग करते हुए भीमसेन को वह विषैला भोजन खिलाया। भीम, जो अपनी क्षुधा और भोजन प्रियता के लिए जाने जाते थे, बिना किसी संदेह के वह सब खा गए। विष ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया। भीम का विशाल शरीर शिथिल पड़ने लगा और उन्हें भारी निद्रा ने घेर लिया। जब सभी खेल समाप्त कर विश्राम करने चले गए, तब भीम गंगा तट पर बेसुध पड़े थे। दुर्योधन ने अवसर पाकर भीम को लताओं (लताओं के रस्सों) से मजबूती से बांधा और उन्हें गंगा की गहरी धाराओं में धकेल दिया।
नागलोक की यात्रा: मृत्यु नहीं, वरदान
भीम का शरीर डूबता हुआ जल की गहराइयों में ‘नागलोक’ जा पहुँचा। यहाँ कथा एक अद्भुत मोड़ लेती है:
- नागों का दंश: जब भीम नागलोक की भूमि पर गिरे, तो वहाँ के विषैले नागों ने उन्हें डसना शुरू किया।
- विष से विष की काट: आयुर्वेद के सिद्धांत (विषस्य विषमौषधम्) के अनुसार, उन नागों के तीक्ष्ण विष ने भीम के शरीर में पहले से मौजूद कालकूट विष के प्रभाव को नष्ट कर दिया। भीम की मूर्च्छा टूट गई।
- भीम का पराक्रम: चेतना आते ही भीम ने उन नागों को पटकना शुरू कर दिया। भयभीत होकर नागों ने अपने राजा वासुकि को सूचित किया।
आर्यक नाग से भेंट
नागों के बीच ‘आर्यक’ नामक एक वृद्ध नाग थे, जो कुंती के पिता (शूरसेन) के नाना थे। उन्होंने भीम को पहचान लिया और उन्हें गले लगा लिया।
दिव्य शक्ति की प्राप्ति
जब वासुकि नाग ने भीम के परिचय और उनकी शक्ति के बारे में जाना, तो वे प्रसन्न हुए। उन्होंने भीम को उपहार स्वरूप अमूल्य धन देने का प्रस्ताव रखा। किंतु आर्यक नाग ने सुझाव दिया कि “हे राजन! इन्हें धन की आवश्यकता नहीं है। इन्हें उस ‘रस-कुंड’ का पान करने की अनुमति दी जाए, जिससे अपार बल प्राप्त होता है।” वासुकि की अनुमति पाकर भीम ने उस दिव्य रस के कुंडों से पान करना शुरू किया। इस दिव्य पान के पश्चात भीम आठ दिनों तक गहरी योग-निद्रा में चले गए, जिससे उनका शरीर उस शक्ति को आत्मसात कर सके। जागने पर नागों ने उन्हें बताया कि जो रस उन्होंने पिया है वह बहुत ही बलवर्धन हैइसके प्रभाव से उनके अंदर दस हजार हाथियों बराबर शक्ति आ गई है।

हस्तिनापुर में चिंता और दुर्योधन का भ्रम
इधर हस्तिनापुर में, भीम के न लौटने पर माता कुंती और युधिष्ठिर अत्यंत व्याकुल थे। दुर्योधन मन ही मन प्रसन्न था कि काँटा निकल गया। विदुर ने कुंती को सांत्वना दी और धैर्य रखने को कहा, क्योंकि वे जानते थे कि पांडव धर्म का पक्ष हैं और उनका अनिष्ट इतनी सरलता से नहीं हो सकता।
भीम की वापसी और भावी रणनीति
आठवें दिन जब भीम की निद्रा खुली, तो वे पहले से कई गुना अधिक तेजस्वी और शक्तिशाली हो चुके थे। नागों ने उन्हें सम्मानपूर्वक गंगा के तट पर छोड़ दिया। जब भीम महल पहुँचे, तो पांडवों की प्रसन्नता की सीमा न रही। भीम ने अपनी माता और भाइयों को दुर्योधन के षड्यंत्र की पूरी बात बताई। युधिष्ठिर ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए भीम को परामर्श दिया “भीम! इस घटना को अभी गुप्त ही रखो। अपनों के बीच रहकर भी हमें सावधान रहना होगा। समय आने पर इस अन्याय का उत्तर दिया जाएगा।”
निष्कर्ष और प्रभाव
यह घटना महाभारत के इतिहास में एक ‘टर्निंग पॉइंट’ थी।
- शारीरिक प्रभाव: भीम अब साधारण मानव नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति संपन्न योद्धा बन चुके थे।
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव: पांडवों को समझ आ गया कि धृतराष्ट्र के पुत्र उनके मित्र नहीं, बल्कि प्राणघातक शत्रु हैं।
- नैतिक संदेश: अधर्म द्वारा किया गया विनाश का प्रयास कभी-कभी धर्म के मार्ग पर चलने वालों के लिए वरदान बन जाता है।
दुर्योधन ने भीम को मारने के लिए विष दिया था, परंतु नियति ने उसी विष के माध्यम से भीम को ‘अजेय’ बना दिया।






