जब एक मृत सर्प और स्वर्ण मुकुट ने हस्तिनापुर के सम्राट की नियति लिख दी!
Share your love

संवाद 24 संजीव सोमवंशी। राजा परीक्षित, जो कुरुवंश के महान सम्राटों में से एक थे, का जीवन और उनकी मृत्यु भारतीय पौराणिक साहित्य, विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत के उत्तर काल में एक निर्णायक मोड़ का प्रतीक है। ये न केवल द्वापर युग के अंत और कलियुग के प्रारंभ को चिन्हित करता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि कैसे एक छोटी सी गलती भी नियति के अटल विधान को जन्म दे सकती है।
राजा परीक्षित का परिचय और शासनकाल
राजा परीक्षित महाभारत के नायक अर्जुन के पौत्र और वीर अभिमन्यु तथा उत्तरा के पुत्र थे। उनका जन्म कुरुक्षेत्र युद्ध की समाप्ति के ठीक बाद हुआ था।
जन्म और नामकरण
गर्भावस्था में रक्षा: परीक्षित नाम का अर्थ है ‘वह जो चारों ओर देखता है’। उनका नामकरण इसलिए हुआ क्योंकि अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र ने उन्हें गर्भ में ही जला दिया था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने योग बल से उन्हें गर्भ में ही पुनर्जीवित किया। ‘परीक्षित’ इसलिए भी कहा गया क्योंकि जन्म के बाद वह चारों ओर अपने रक्षक भगवान कृष्ण को खोजने की दृष्टि से देख रहे थे।
उत्तराधिकारी: पांडवों के स्वर्गारोहण (महाप्रस्थान) के बाद, धर्मपरायण युधिष्ठिर ने परीक्षित को हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठाया।
धर्मपरायण शासन
परीक्षित ने एक धर्मराज के रूप में शासन किया। उनका शासनकाल न्याय, समृद्धि और वैदिक संस्कृति के पालन के लिए जाना जाता था। उन्होंने यज्ञों का आयोजन किया और अपनी प्रजा को धार्मिक अनुशासन में रखा। यह शासनकाल द्वापर युग की अंतिम चरण की शांति और व्यवस्था का प्रतीक था।
कलियुग का प्रवेश
जब परीक्षित अपनी विजय यात्रा पर निकले, तो उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति (जो कलियुग का प्रतीक था) एक गाय (जो पृथ्वी और धर्म का प्रतीक थी) और एक बैल (जो धर्म का प्रतीक था) को बुरी तरह प्रताड़ित कर रहा था।
कलियुग पर नियंत्रण:
क्रोधित परीक्षित ने कलियुग के प्रतीक उस पुरुष को मृत्युदंड देने का निश्चय किया। कलियुग ने भयभीत होकर राजा से क्षमा माँगी। धर्म के ज्ञाता होने के नाते, राजा ने उसे पूर्णतया नष्ट करने के बजाय, उसे पृथ्वी के केवल उन स्थानों तक सीमित कर दिया जहाँ पाप, जुआ, मदिरा, वैश्यावृत्ति और स्वर्ण का वास हो। यह घटना दिखाती है कि परीक्षित ने किस प्रकार अपने शासन में धर्म की रक्षा करने का प्रयास किया, लेकिन कलियुग को पूरी तरह से पृथ्वी से हटाया नहीं जा सका। कलियुग ने स्वर्ण को अपना निवास स्थान बनाया, और यही वह स्वर्ण था जो बाद में राजा परीक्षित के मुकुट पर विराजमान हुआ और उनकी बुद्धि को दूषित करने का कारण बना।
मृत्यु का तात्कालिक कारण: श्राप और अपमान
राजा परीक्षित की मृत्यु का मूल कारण उनकी एक क्षणिक भूल थी, जिस पर कलियुग का प्रभाव था, और जिसका परिणाम तक्षक नाग द्वारा दिया गया दंश था।
शमीक ऋषि का अपमान
शिकार और थकान: एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते हुए जंगल में बहुत गहरे चले गए। वह भूख और प्यास से अत्यधिक व्याकुल थे। कलियुग का निवास उनके स्वर्ण मुकुट में होने के कारण उनकी बुद्धि पर अहंकार का क्षणिक प्रभाव पड़ा।
आश्रम में आगमन: वह जल की तलाश में शमीक ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि उस समय गहरे ध्यान (समाधि) में लीन थे और भौतिक संसार के प्रति पूर्णतया उदासीन थे।
अविवेकपूर्ण कृत्य: राजा ने बार-बार जल माँगा, पर ध्यानमग्न ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा ने इसे जानबूझकर किया गया अपमान समझा। अहंकार और भूख-प्यास से वशीभूत होकर, परीक्षित ने पास पड़ा हुआ एक मृत सर्प उठाया और उसे ऋषि के गले में डाल दिया, फिर वहाँ से चले गए।
श्रृंगी ऋषि का श्राप
पुत्र का क्रोध: जब शमीक ऋषि के तेजस्वी पुत्र, श्रृंगी ऋषि, ने अपने पिता के गले में यह घोर अपमानजनक वस्तु देखी, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पिता समाधि में थे और राजा प्यासे थे।
श्राप की घोषणा: श्रृंगी ने तुरंत आपोशमन जल लेकर राजा परीक्षित को घोर श्राप दिया कि “जिस अधर्मी ने मेरे पिता का अपमान किया है, उसे आज से सातवें दिन, नागों के राजा तक्षक के दंश से मृत्यु प्राप्त होगी।”
श्राप पर पश्चाताप: शमीक ऋषि का जब ध्यानभंग हुआ, तो उन्हें अपने पुत्र के इस उतावलेपन पर गहरा दुःख हुआ। उन्होंने कहा कि राजा एक क्षणिक गलती के कारण श्राप के पात्र नहीं थे और यह श्राप घोर अधर्म था। उन्होंने अपने शिष्य को राजा के पास भेजकर उन्हें श्राप की सूचना दी, ताकि राजा अपनी अंतिम तैयारी कर सकें।
परीक्षित की प्रतिक्रिया और मोक्ष की तैयारी
राजा परीक्षित ने श्राप की सूचना सुनकर उसे नियति का विधान माना और किसी भी प्रकार का प्रतिशोध लेने के बजाय, स्वयं को मोक्ष प्राप्ति के लिए समर्पित कर दिया।
राजपाट त्याग: राजा ने तुरंत अपने पुत्र जनमेजय को सिंहासन सौंप दिया और गंगा नदी के तट पर उपवास का संकल्प लेकर बैठ गए।
श्रीमद्भागवत का श्रवण: गंगा तट पर ऋषि-मुनियों की एक विशाल सभा आयोजित हुई। वहाँ व्यास मुनि के पुत्र, परम ज्ञानी शुकदेव जी (शुकदेव गोस्वामी) का आगमन हुआ। शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को उनके अंतिम सात दिनों तक लगातार श्रीमद्भागवत महापुराण का अमृतपान कराया।
ज्ञान की प्राप्ति: इस श्रवण के माध्यम से राजा को संसार की अनित्यता, ईश्वर के स्वरूप और आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त की और यह सुनिश्चित किया कि उनके नश्वर शरीर के अंत के साथ ही उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त हो।
तक्षक का दंश
ठीक सातवें दिन, जब राजा परीक्षित समाधिस्थ होकर भागवत ज्ञान में लीन थे, तक्षक नाग ब्राह्मण के वेश में आया। कुछ कथाओं के अनुसार, तक्षक एक अत्यंत सूक्ष्म कीट के रूप में राजा के लिए लाए गए एक फल में छिप गया और जैसे ही राजा ने फल ग्रहण करना चाहा, वह अपने असली रूप में प्रकट हुआ और राजा को दंश दिया। तक्षक के विष की तीव्रता से राजा का शरीर तुरंत भस्म हो गया। इस प्रकार, नियति का विधान पूर्ण हुआ, और राजा परीक्षित ने मोक्ष प्राप्त किया।
मृत्यु के बाद की परिस्थितियाँ और सुदूरगामी परिणाम
राजा परीक्षित की मृत्यु ने उनके पुत्र जनमेजय के जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला, जिससे एक बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम की शुरुआत हुई।
जनमेजय का प्रतिशोध: नाग यज्ञ (सर्प सत्र)
अत्यधिक क्रोध: जनमेजय अपने पिता की मृत्यु से अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल थे। उन्होंने शपथ ली कि वह तक्षक नाग के साथ-साथ समस्त नाग जाति को नष्ट कर देंगे।
सर्प सत्र का आयोजन: उन्होंने एक विशाल सर्प सत्र (नाग यज्ञ) का आयोजन किया। इस यज्ञ को इस प्रकार से अभिकल्पित किया गया था कि यज्ञ की अग्नि और वैदिक मंत्रों की शक्ति से पृथ्वी के सभी नाग, चाहे वे कहीं भी हों, खिंचे चले आएं और अग्नि में जलकर भस्म हो जाएं।
नागों का विनाश: जनमेजय के इस भयानक प्रतिशोध के कारण लाखों-करोड़ों नाग यज्ञ की अग्नि में गिरकर नष्ट हो गए। तक्षक नाग भी बचने के लिए भागता रहा, यहाँ तक कि उसने देवराज इंद्र के पास शरण ली।
यज्ञ का स्थगन (आस्तिक मुनि द्वारा): जब तक्षक भी यज्ञ की ओर खिंचने लगा, तो उसकी रक्षा के लिए आस्तिक मुनि (जो एक नाग कन्या और एक ब्राह्मण ऋषि के पुत्र थे, अतः नाग वंश और मानव वंश दोनों से संबंधित थे) ने जनमेजय से विनम्र निवेदन किया। आस्तिक मुनि के तर्कपूर्ण और धार्मिक अनुरोध से प्रभावित होकर, राजा जनमेजय ने अपने क्रोध को नियंत्रित किया और यज्ञ को बीच में ही रोक दिया। इस प्रकार शेष नागों और तक्षक के जीवन की रक्षा हुई।
ऐतिहासिक और धार्मिक परिणाम
काल परिवर्तन: राजा परीक्षित की मृत्यु को द्वापर युग के पूर्ण समापन और कलियुग के पूर्ण प्रवेश का ऐतिहासिक बिंदु माना जाता है। उनके बाद, धर्म का एक और पतन हुआ।
महाभारत का विस्तृत ज्ञान: जनमेजय के सर्प सत्र के दौरान ही, ऋषि व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को संपूर्ण महाभारत की कथा सुनाई, क्योंकि जनमेजय ने अपने पूर्वजों (पांडवों) के बारे में विस्तार से जानने की इच्छा व्यक्त की थी। यह कथा ही आज हमें महाभारत के रूप में प्राप्त है।
भागवत पुराण का महत्व: परीक्षित की कथा ने श्रीमद्भागवत पुराण को हिंदू धर्म में एक प्रमुख ग्रंथ के रूप में स्थापित किया। यह कथा दर्शाती है कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में भी भगवान के नाम का श्रवण और भक्ति मोक्ष दिला सकती है, जो भागवत धर्म का मूल सिद्धांत है।
नियति और कर्म का संदेश
राजा परीक्षित की कथा भारतीय दर्शन में नियति (Destiny) और कर्म (Action) के गूढ़ संबंध को दर्शाती है। एक क्षणिक क्रोध और अहंकार ने उनके जीवन के अंत को निर्धारित किया, लेकिन उन्होंने उस अंत को श्रीमद्भागवत के श्रवण के माध्यम से मोक्ष में बदल दिया।
यह कहानी सिखाती है कि भौतिक समृद्धि और शक्ति भी मृत्यु को टाल नहीं सकती, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान व्यक्ति को मृत्यु के भय से मुक्त करके शाश्वत शांति प्रदान कर सकता है। जनमेजय का प्रतिशोध दिखाता है कि कैसे क्रोध और मोह विनाशकारी हो सकता है, जब तक कि उसे विवेक और संत के हस्तक्षेप से नियंत्रित न किया जाए। यह घटनाक्रम भारतीय इतिहास के पौराणिक युग से ऐतिहासिक युग की ओर संक्रमण का भी सूचक है।






