गुरुभक्त उपमन्यु की अनूठी कथा: त्याग, आज्ञाकारिता और गुरु कृपा का अद्भुत संगम
Share your love

संवाद 24 संजीव सोमवंशी। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में, गुरु-शिष्य संबंध को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह संबंध केवल शिक्षा-दीक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास की नींव पर खड़ा था। ऐसी ही एक प्रेरक और प्रामाणिक कहानी है महर्षि आयोद धौम्य और उनके परम शिष्य उपमन्यु की, जिसका उल्लेख महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। उपमन्यु की कथा गुरु भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाती है और आज भी हमें कर्तव्यनिष्ठा तथा धैर्य का पाठ सिखाती है।
आश्रम में प्रवेश और गुरु की आज्ञा
महर्षि आयोद धौम्य एक महान तपस्वी और ज्ञानी थे, जिनके आश्रम में आरुणि और वेद जैसे तेजस्वी शिष्यों के साथ उपमन्यु भी विद्याध्ययन के लिए आए थे। उपमन्यु, यद्यपि महान शिवभक्त महर्षि व्याघ्रपाद के पुत्र थे, परंतु उनकी स्थिति अत्यंत सामान्य थी। गुरु धौम्य ने उपमन्यु को गौ सेवा का कठिन कार्य सौंपा, जो उनके नित्य कर्मों में शामिल हो गया। गौओं को वन में चराना और उनकी देखभाल करना उपमन्यु का प्रमुख दायित्व था। साथ ही, गुरु ने उन्हें आश्रम में भोजन न मिलने की स्थिति में भिक्षाटन द्वारा अपना पेट भरने की अनुमति दी।
गुरु की कठोर परीक्षाएँ
धौम्य ऋषि अपने शिष्यों की केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि उनकी गुरुभक्ति और चरित्र की भी कठोर परीक्षा लेते थे, ताकि वे जीवन के हर संघर्ष के लिए तैयार हो सकें।
- भिक्षा का त्याग
कुछ समय बाद, गुरु ने देखा कि उपमन्यु गौ सेवा के कठिन परिश्रम के बावजूद हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ दिखाई देते हैं। उन्होंने उपमन्यु से पूछा, “वत्स, तुम इतने हट्टे-कट्टे कैसे हो? क्या तुम्हें भिक्षाटन से पर्याप्त भोजन मिल जाता है?”
उपमन्यु ने उत्तर दिया, “जी गुरुदेव, आपकी कृपा से भिक्षा से मेरा निर्वाह हो जाता है।”
तब गुरु धौम्य ने कहा, “तुम्हें भिक्षा में प्राप्त अन्न मुझे अर्पित किए बिना स्वयं नहीं खाना चाहिए।”
उपमन्यु ने सहर्ष गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली। अब वह भिक्षा से मिला सारा अन्न गुरु को सौंप देते, और गुरु उसे अपने पास रख लेते थे। उपमन्यु भूखे ही रह जाते। - द्वितीय भिक्षाटन पर रोक
अगले दिन भी उपमन्यु उसी प्रकार स्वस्थ दिखे। गुरु ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “जब तुम अपनी भिक्षा मुझे सौंप देते हो, तो तुम्हारा निर्वाह कैसे होता है?”
उपमन्यु ने सच बताते हुए कहा, “गुरुदेव, मैं दूसरी बार भिक्षा मांग लेता हूँ, जिससे अपना पेट भरता हूँ।”
गुरु ने इसे अनुचित बताया और तुरंत दूसरी बार भिक्षा मांगने पर भी रोक लगा दी। उपमन्यु ने गुरु की इस कठोर आज्ञा का भी अक्षरशः पालन किया। - गौदुग्ध पीने से रोकना ” जब गुरु ने देखा कि दो बार भिक्षा मांगना बंद करने के बावजूद उपमन्यु की शारीरिक शक्ति कम नहीं हुई है, तो उन्होंने फिर से उपमन्यु से इसके बारे में पूछा तो उपमन्यु ने निष्पाप भाव से कहा, “गुरुदेव, मैं थोड़ा सा गौओं का दूध पी लेता हूँ।” धौम्य ने तत्काल कहा, “यह अनुचित है। बिना गुरु की आज्ञा के गौ-दुग्ध ग्रहण करना वर्जित है।” उपमन्यु ने बिना एक शब्द विरोध के वह मार्ग भी त्याग दिया। अब वह और भी कमजोर होने लगा।
- बछड़े के फेन का परित्याग
कई दिन बीत गए, उपमन्यु भूख से अत्यन्त दुर्बल हो गया। एक दिन धौम्य ने पूछा, “बेटा, तुम भोजन कहाँ से करते हो कि इतने दिन जीवित हो?
उपमन्यु ने बताया, “गुरुदेव, मैं गौओं को चराते समय बछड़ों को दूध पीते देखता हूँ और जब वे दूध पीने के बाद फेन (झाग) उगलते हैं, तो मैं उसी का सेवन कर लेता हूँ।”
गुरु धौम्य ने इस पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “यह भी उचित नहीं है। बछड़े प्रेमवश अपने हिस्से का दूध तुम्हारे लिए फेन के रूप में छोड़ते हैं, और ऐसा करके तुम उनके अधिकार का हनन कर रहे हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।” उपमन्यु ने बिना किसी तर्क-वितर्क के इस आज्ञा को भी शिरोधार्य किया। अब उनके पास खाने-पीने का कोई साधन नहीं बचा था।
गुरु भक्ति की चरम सीमा और शिव-कृपा
लगातार गुरु-आज्ञाओं का पालन करते हुए, उपमन्यु अत्यंत भूखे रहने लगे। भूख से व्याकुल होकर एक दिन जंगल में भटकते हुए, उन्होंने अनजाने में ‘अर्क’ (आक) के जहरीले पत्ते खा लिए। आक के दूध के विषैले प्रभाव से उपमन्यु अंधे हो गए। आँखों की रोशनी खो जाने के कारण वह गौएँ चराते हुए एक गहरे और सूखे कुएँ में गिर गए। उपमन्यु की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण, गौएँ शाम को भी उनके बिना ही आश्रम की ओर नहीं गईं और जोर-जोर से रंभाने लगीं। उपमन्यु को खोजते हुए गुरु धौम्य और अन्य शिष्य उस कुएँ के पास पहुँचे। उन्होंने उपमन्यु को आवाज़ दी। उपमन्यु ने अपनी पूरी कहानी गुरु को बताई।
गुरु धौम्य ने उपमन्यु की गुरुभक्ति और कष्ट को देखकर प्रसन्न होते हुए भी, उनकी परीक्षा जारी रखी और उन्हें कुएँ में ही देवताओं के चिकित्सक अश्विनीकुमारों की स्तुति करने को कहा। उपमन्यु ने कुएँ के अंदर रहकर ही एकाग्रचित्त होकर अश्विनीकुमारों की स्तुति की। उनकी अटूट श्रद्धा और गुरु आज्ञा के पालन से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमार तुरंत वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने उपमन्यु को पुआ खाने को दिया, लेकिन उपमन्यु ने उनसे कहा कि वह अपने गुरु को बिना निवेदन किए हुए इसको नहीं खा सकते। तो अश्विनीकुमारों ने कहा कि उनके गुरु को भी उन्होंने पुआ खाने को दिया था, तो उन्होंने अपने गुरु को बिना निवेदित किए पुआ खा लिया था वैसा ही तुम्हे भी करना चाहिए।
इस पर उपमन्यु ने अश्विनीकुमारों को नमस्कार करते हुए दृढ़ता से कहा, “आप दोनों देवताओं के वैद्य हैं, किंतु मेरे गुरु से बढ़कर नहीं। जब मेरे गुरु ने मुझे किसी भी पदार्थ का सेवन करने से पहले उन्हें अर्पित करने को कहा है, तो मैं उनकी आज्ञा भंग नहीं कर सकता।”
यह सुनकर अश्विनीकुमार बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “तुम्हारा गुरुभक्ति का यह अद्भुत भाव देखकर हम तुम्हें आशीर्वाद देते हैं कि तुम्हें समस्त वेद और शास्त्र बिना पढ़े ही सिद्ध हो जाएंगे। तुम्हारे दांत सोने के हो जाएं, और तुम्हारी आंखें सही हो जाएं। उपमन्यु कुएँ से बाहर निकले, तो गुरु धौम्य ने उन्हें प्रेम से गले लगा लिया। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे। उन्होंने कहा, “वत्स, मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। अश्विनीकुमारों के आशीर्वाद से तुम समस्त ज्ञान में पारंगत हो जाओगे और तुम्हारा कल्याण होगा।”
गुरुभक्ति का चिरस्थायी संदेश
उपमन्यु की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, कठोर त्याग और पूर्ण आज्ञाकारिता से प्राप्त होता है। उपमन्यु ने यह सिद्ध कर दिया कि शिष्य के लिए गुरु की आज्ञा ही सर्वोपरि होती है, यहाँ तक कि अपने जीवन से भी अधिक। गुरु धौम्य की कठोर परीक्षाएँ वास्तव में शिष्य को तपकर कुंदन बनाने का एक दिव्य माध्यम थीं।
उपमन्यु की कथा आज के आधुनिक युग में भी हमें कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण का महत्व समझाती है, जो किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है।






