माँ को दासता से मुक्त कराने हेतु, कैसे गरुड़ स्वर्ग से ले आए अमृत
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। यह कथा महाभारत के आदि पर्व से संबंधित है, जो महर्षि कश्यप और उनकी पत्नियों कद्रु और विनता के जीवन और उनसे उत्पन्न महान पक्षीराज गरुड़ के जन्म और पराक्रम को विस्तार से बताती है।
कद्रु और विनता का परिचय
कद्रु और विनता दोनों दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ और परस्पर बहनें थीं, जिनका विवाह महान ऋषि कश्यप से हुआ था। ये दोनों बहनें स्वभाव और अभिलाषाओं में एक-दूसरे से बहुत भिन्न थीं।
कद्रु (Kadru): वह छोटी बहन थीं और स्वभाव से अधिक ईर्ष्यालु और प्रतियोगी थीं। उन्होंने महर्षि कश्यप से एक हजार अत्यंत पराक्रमी सर्पों (नागों) की माता बनने का वरदान माँगा। कद्रु को समस्त नागवंश की माता माना जाता है, जिनमें वासुकि, शेषनाग, तक्षक आदि प्रमुख नाग देवता शामिल थे।
विनता (Vinata): वह बड़ी बहन थीं और उन्होंने कद्रु के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली दो बलवान और तेजस्वी पुत्रों की माता बनने का वरदान माँगा। विनता को देवताओं के सारथी अरुण और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की माता होने का गौरव प्राप्त है।
गरुड़ की उत्पत्ति की कथा
महर्षि कश्यप से वरदान प्राप्त करने के पश्चात्, दोनों पत्नियों ने गर्भधारण किया और अंडों के रूप में संतति उत्पन्न की।
- पुत्रों का जन्म
कद्रु ने वरदान के अनुसार एक हजार अंडे उत्पन्न किए। समय आने पर इन अंडों से विभिन्न प्रकार के नागों का जन्म हुआ।
विनता ने दो अंडे उत्पन्न किए। लेकिन कद्रु के पुत्रों को जन्म लेते देख विनता ने अपना एक अंडा समय से पहले ही फोड़ दिया। इस असमय स्फोट के कारण, अंडे से उत्पन्न पुत्र का शरीर पूर्ण विकसित नहीं हो पाया था, जिसके अंग कुछ अपूर्ण रह गए। इस पुत्र का नाम अरुण पड़ा। अरुण ने अपनी माता विनता को उनकी इस अधीरता के लिए श्राप दिया कि उन्हें कुछ समय के लिए दासी बनना पड़ेगा और उनका दूसरा पुत्र ही उन्हें इस दासता से मुक्ति दिलाएगा। अरुण बाद में सूर्य देव के सारथी बने। श्राप के कारण विनता भयभीत हो गईं और उन्होंने अपने दूसरे अंडे को धैर्यपूर्वक पाला। एक लंबे समय के पश्चात्, इस दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ। - गरुड़ का जन्म
जब गरुड़ का जन्म हुआ, तो उनका रूप अत्यंत विशाल, तेजस्वी और बलशाली था। वे तुरंत बड़े हो गए और उनकी चमक इतनी तीव्र थी कि पहले तो देवताओं ने उन्हें अग्नि का स्वरूप मान लिया था। गरुड़ को ‘वैनतेय’ (विनता के पुत्र) और ‘गरुत्मान’ (विशाल पंखों वाला) नामों से भी जाना जाता है।
विनता की दासता और गरुड़ द्वारा मुक्ति
कद्रु और विनता के बीच आपसी द्वेष बहुत गहरा था। एक बार, उन्होंने एक शर्त लगाई जिसने विनता के जीवन में दासता को जन्म दिया और गरुड़ के पराक्रम की नींव रखी।
- दासी बनने की शर्त
एक समय, स्वर्ग में उड़ रहे उच्छैश्रवा नामक दिव्य और श्वेत घोड़े को देखकर दोनों बहनों में उसके रंग को लेकर विवाद हो गया। विनता ने कहा कि घोड़ा पूरी तरह से सफेद है। कद्रु ने छलपूर्वक कहा कि घोड़े का शरीर तो सफेद है, परन्तु उसकी पूँछ काली है। यह शर्त लगाई गई कि जो असत्य सिद्ध होगा, वह दूसरे की दासी बन जाएगी। कद्रु ने अपने नाग पुत्रों से छल करने का आग्रह किया। कद्रु के आदेश पर, उसके पुत्रों ने सूक्ष्म रूप धारण कर घोड़े की पूँछ को चारों ओर से इस प्रकार से घेर लिया कि दूर से देखने पर पूँछ काली दिखाई देने लगी। जब विनता ने घोड़े को देखा, तो छल के कारण उन्हें पूँछ काली दिखाई दी और वह शर्त हार गईं। इस प्रकार, विनता अपनी बहन कद्रु और उसके नाग पुत्रों की दासी बन गईं। - गरुड़ द्वारा मुक्ति का मार्ग
दासी बनने के पश्चात्, विनता और बाल गरुड़ को कद्रु और उनके नाग पुत्रों की सेवा करनी पड़ती थी। गरुड़ को अपनी माता की यह स्थिति असहनीय लगी। एक दिन, गरुड़ ने नागों से पूछा कि उनकी माता को दासता से कैसे मुक्ति मिल सकती है। नागों ने छल करते हुए कहा कि यदि गरुड़ देवताओं के पास से ‘अमृत कलश’ लाकर उन्हें दे दें, तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे। - अमृत की प्राप्ति
माता की मुक्ति के लिए गरुड़ ने अमृत लाने का अत्यंत कठिन और पराक्रमी कार्य स्वीकार किया। गरुड़ ने देवताओं के पास जाकर उनसे युद्ध किया। उनके प्रचंड बल और वेग के सामने इंद्र सहित सभी देवता टिक न सके। गरुड़ ने अमृत कलश की रक्षा कर रहे सभी रक्षकों को पराजित किया। गरुड़ की शक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनने का वरदान दिया, और इंद्र ने उन्हें नागों का भक्षक होने का वरदान दिया। गरुड़ ने अमृत कलश प्राप्त किया और नागों के पास पहुँचे। उन्होंने नागों से कहा कि अमृत सेवन से पहले वे स्नान कर लें, ताकि वे पूर्णतः शुद्ध हो सकें। - दासता से मुक्ति
जैसे ही नाग स्नान करने गए, गरुड़ ने अवसर पाकर इंद्र को संकेत किया। इंद्र ने तुरंत वहाँ पहुँचकर अमृत कलश वापस उठा लिया और उसे स्वर्ग ले गए। जब नाग स्नान करके लौटे, तो उन्होंने देखा कि अमृत कलश वहाँ नहीं है, केवल वह दर्भ (कुश) घास शेष है जिस पर कलश रखा गया था। नागों ने उस पवित्र स्थान पर रखी दर्भ को चाटना शुरू कर दिया, यह सोचकर कि शायद अमृत की कुछ बूँदें शेष रह गई हों। अमृत के स्पर्श के कारण ही नागों की जिह्वा (जीभ) बीच से फट गई और वे द्विज्वाह (दो जिह्वा वाले) कहलाए। चूँकि गरुड़ ने अपनी शर्त पूरी करते हुए अमृत को लाकर नागों के सम्मुख रख दिया था, इसलिए कद्रु ने विनता को दासता से मुक्त कर दिया।
गरुड़ की यह कथा न केवल उनकी महान उत्पत्ति और माता-पुत्र के प्रेम को दर्शाती है, बल्कि यह छल (कद्रु) पर पवित्र उद्देश्य (गरुड़) की जीत और बलिदान की महत्ता को भी स्थापित करती है। पक्षीराज गरुड़ अपने पराक्रम और मातृ-भक्ति के कारण भगवान विष्णु के वाहन और सभी पक्षियों के राजा बने।






