साहस और बलिदान की एकलव्य गाथा, निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र की अनकही कहानी

महाभारत की सबसे मार्मिक और विवादास्पद कथाओं में से एक है निषाद राजकुमार एकलव्य की कथा। सदियों से हम उसे एक गरीब, वंचित, फटे कपड़ों वाला जंगल का बालक मानते आए हैं, जिसने द्रोणाचार्य से शिक्षा माँगी और ठुकराए जाने पर मिट्टी की मूर्ति बनाकर अभ्यास किया। लेकिन जब हम महाभारत, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण और प्राचीन संस्कृत कोशों को खंगालते हैं, तो एक बिलकुल अलग एकलव्य सामने आता है, वह कोई दीन-हीन बालक नहीं, बल्कि निषादराज हिरण्यधनु का उत्तराधिकारी, मगध साम्राज्य के शक्तिशाली सेनापति का पुत्र और श्रीकृष्ण का चचेरा भाई होने की संभावना वाला राजकुमार था।

एकलव्य की कथा भारतीय साहित्य की एक ऐसी कथा है जो गुरुभक्ति, संकल्पशक्ति की अमर गाथा है। आधुनिक समय में एकलव्य को अक्सर वंचित वर्ग का प्रतीक माना जाता है, लेकिन महाभारत के मूल ग्रंथों और पुराणों के अनुसार वह एक राजकुमार थे। निषाद वंश के शासक हिरण्यधनु के पुत्र। हिरण्यधनु का नाम संस्कृत में “हिरण्य” (स्वर्ण या सोना) और “धनु” (धनुष) से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ “स्वर्ण धनुष” या “सोने का धनुष” होता है। यह नाम निषाद राजा की धनुर्विद्या में निपुणता और उनके राजसी वैभव को दर्शाता है, न कि “हिरण का शिकार करने वाला धनुष” (जिसके लिए “मृगधनु” अधिक उपयुक्त होता)।

कुछ कहानियों में एकलव्य को दीन-हीन चित्रित किया जाता है, लेकिन यह चित्रण उनके राजसी वैभव से मेल नहीं खाता। उनके पिता हिरण्यधनु एक शक्तिशाली राजा थे, जो मगध साम्राज्य के सेनापति थे। महाभारत, हरिवंश पुराण और भागवत पुराण जैसे ग्रंथों में ये वर्णन मिलता है। यह कथा न केवल एकलव्य के व्यक्तिगत संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि निषाद जनजाति के राजनैतिक महत्व को भी उजागर करती है।

एकलव्य का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
एकलव्य का जन्म निषाद राज्य श्रृंगवेरपुर में हुआ था। श्रृंगवेरपुर, जो प्रयाग (आधुनिक इलाहाबाद) के निकट गंगा तट पर स्थित था, एक समृद्ध वन-राज्य था। यह राज्य शिकार, मछली पालन और वन उत्पादों पर आधारित अर्थव्यवस्था से पोषित था, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व अपार था।

हिरण्यधनु जरासंध के सेनापति और निषादों के परमेश्वर थे। उनका राज्य श्रृंगवेरपुर (आधुनिक इलाहाबाद के पास गंगा-यमुना संगम के निकट) था। जरासंध, जो कंस का ससुर था, वो मगध साम्राज्य का एक क्रूर लेकिन शक्तिशाली शासक था। हिरण्यधनु की वीरता विख्यात थी, उन्होंने कई युद्धों में जरासंध की सेना का नेतृत्व किया, विशेषकर हस्तिनापुर और मथुरा के विरुद्ध। महाभारत के उद्योग पर्व में उल्लेख है कि हिरण्यधनु की सेना निषाद योद्धाओं से सुसज्जित थी, जो जंगल युद्ध में निपुण थे। उनका राज्य मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चंदेरी जैसे बड़े राज्यों के बराबर शक्तिशाली माना जाता था। हिरण्यधनु राज्य संचालन में अमात्य परिषद (मंत्रियों की सभा) की सहायता लेते थे, और उनके सेनापति गिरिबीर जैसे वीर योद्धा उनके विश्वासपात्र थे।

हिरण्यधनु की पत्नी और एकलव्य की माता रानी सुलेखा थीं। कुछ पौराणिक कथाओं में उनका नाम सुलेखा ही वर्णित है, जो एक सुंदर और धर्मपरायणा रानी के रूप में चित्रित हैं। सुलेखा निषाद कुल की कुलीन महिला थीं, जिन्होंने एकलव्य को बचपन से ही वीरता और धार्मिकता की शिक्षा दी। महाभारत में सुलेखा का सीधा उल्लेख कम है, लेकिन लोककथाओं में उन्हें एकलव्य की प्रेरणा स्रोत माना जाता है। वे राज्य की आंतरिक व्यवस्था संभालती थीं और निषाद महिलाओं के बीच शिकार कला एवं जड़ी-बूटियों के ज्ञान में निपुण थीं। एकलव्य के जन्म के समय हिरण्यधनु और सुलेखा का वैवाहिक जीवन सुखमय था, लेकिन एकलव्य की परवरिश में एक रहस्य जुड़ा है।

महाभारत में एकलव्य को स्पष्ट रूप से हिरण्यधनु का जैविक पुत्र बताया गया है। लेकिन हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में एक वैकल्पिक कथा भी मिलती है। उसके अनुसार एकलव्य वास्तव में देवश्रवा के पुत्र थे। देवश्रवा वसुदेव (श्रीकृष्ण के पिता) के छोटे भाई थे, जिससे एकलव्य श्रीकृष्ण के चचेरे भाई बनते हैं। जन्म के समय संतों ने एकलव्य के अंधकारमय भविष्य की भविष्यवाणी की, जिसके कारण देवश्रवा और उनकी पत्नी ने शिशु को जंगल में त्याग दिया। हिरण्यधनु ने उन्हें पाया और गोद ले लिया। इस कथा में सुलेखा एकलव्य की सौतेली माता बन जाती हैं, लेकिन हिरण्यधनु ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह गोद लेने की कथा एकलव्य को यादव वंश से जोड़ती है, लेकिन महाभारत में इसे नजरअंदाज किया गया है।

एकलव्य का मूल नाम अभिद्युम्न या अभय था, लेकिन उनके गुरु ने उनकी एकाग्रता देखकर “एकलव्य” नाम दिया, जिसका अर्थ है “एकाग्रचित्त”। एकलव्य का बचपन श्रृंगवेरपुर के राजमहल में बीता, जहाँ वे राजसी वैभव से परिचित थे। हिरण्यधनु ने उन्हें बचपन से ही धनुर्विद्या सिखाई। निषाद परंपरा में शिकार जीवन का आधार था, इसलिए एकलव्य को कम उम्र में ही धनुष चलाना आ गया। सुलेखा ने उन्हें नैतिकता और वन संरक्षण की शिक्षा दी।

लेकिन एकलव्य का मन बड़े सपनों में रमा था। वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर द्रोणाचार्य से शिक्षा लेना चाहते थे, जो कौरव-पांडवों के राजगुरु थे। किशोरावस्था में एकलव्य हस्तिनापुर पहुँचे। लेकिन द्रोणाचार्य ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। कारण जाति नहीं, बल्कि राजनीति था। हिरण्यधनु जरासंध के सहयोगी थे, जो हस्तिनापुर के शत्रु थे। द्रोणाचार्य, जो भीष्म के वचनबद्ध थे, किसी शत्रु राजकुमार को प्रशिक्षित नहीं कर सकते थे। द्रोण भीष्म और कुरुवंश के प्रति वचनबद्ध थे। शत्रु पक्ष के राजकुमार को शिक्षा देना राजद्रोह होता।

ठुकराए जाने पर एकलव्य ने अपने अंदर नकारात्मकता लाए बिना जो किया, वह इतिहास में अद्वितीय है। वह श्रृंगवेरपुर लौटे, गंगा तट पर एक सुनसान स्थान चुना और द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाई। रोज सूर्योदय से पहले स्नान कर, मिट्टी के गुरु को प्रणाम कर, वह अभ्यास करते। उन्होंने द्रोण की हर मुद्रा, हर सूत्र को दूर से देखकर याद कर लिया था। वर्षों के कठोर अभ्यास के बाद वो ऐसे धनुर्धर बन गए कि एक साथ सात बाण एक ही छिद्र से पार कर देता थे, यह कारनामा उस समय तक अर्जुन ने भी नहीं किया था। इस तरह वो वर्षों के तप के बाद अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर बन गए।

एक दिन द्रोणाचार्य शिष्यों के साथ जंगल में शिकार खेल रहे थे। उनका कुत्ता एकलव्य के पास पहुँचा, जिसने सात बाणों से उसके मुँह को बंद कर दिया बिना चोट पहुँचाए। द्रोण ने मिट्टी की प्रतिमा देखी और एकलव्य को पहचाना। गुरुदक्षिणा में द्रोण ने दायाँ अंगूठा माँगा। एकलव्य ने बिना हिचक काट दिया। यह बलिदान राजकुमार का था, जो गुरुभक्ति का प्रतीक बना। अंगूठा कटने के बाद भी एकलव्य ने धनुर्विद्या का अभ्यास जारी रखी। हिरण्यधनु की मृत्यु के बाद वे श्रृंगवेरपुर के राजा बने। उन्होंने निषाद-भील सेना का विस्तार किया और जरासंध की सेवा में रहे।

उद्योग पर्व में वर्णित है कि एकलव्य जरासंध की मथुरा आक्रमण में शामिल हुए। भागवत पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण ने उन्हें युद्ध में मारा, क्योंकि वे पांडवों के लिए खतरा बन सकते थे। एकलव्य के पुत्र केतुमान महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष से लड़े और भीम के हाथों मारे गए।

हिरण्यधनु और सुलेखा ने एकलव्य को राजसी गरिमा दी। हिरण्यधनु की वीरता ने एकलव्य को योद्धा बनाया, जबकि सुलेखा ने नैतिकता सिखाई। एकलव्य राजकुमार थे, लेकिन जंगल अभ्यास में सादगी अपनाई। यह कथा जातिवाद का प्रतीक नहीं, बल्कि राजनीतिक वफादारी का है। द्रोण ने क्षत्रिय नियमों का पालन किया, लेकिन एकलव्य की गुरुभक्ति अमर हो गई।

हिरण्यधनु का नाम “स्वर्णधनु” के रूप में उनकी धनुर्विद्या की स्वर्णिम छवि को मजबूत करता है, जो निषाद वीरता का प्रतीक है। आधुनिक भारत में एकलव्य वनवासियों के प्रेरणाश्रोत हैं। भारत सरकार का “एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय” वनवासी शिक्षा के लिए है। हिरण्यधनु और सुलेखा की कथा हमें सिखाती है कि वीरता वंश से आती है, लेकिन संकल्प व्यक्तिगत होता है। एकलव्य कोई दीन बालक नहीं, बल्कि निषाद राजवंश का गौरव थे।

Samvad 24 Office
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