स्वर्गद्वारी से रामनगरिया तक: कल्पवास, गंगा और आस्था का आध्यात्मिक सफर

संवाद 24 संजीव सोमवंशी। गंगा नदी के तट पर लगने वाला यह पवित्र संगम अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक महत्ता के कारण सदियों से श्रद्धालुओं का केंद्र रहा है। प्राचीन ग्रंथों में इस क्षेत्र को “स्वर्गद्वारी” के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि यहाँ से गंगा का जल लेकर भक्त मानसरोवर कैलाश यात्रा पर जाते थे तथा शिवजी को गंगा जल अर्पित करते थे, जिससे यह स्थान पुण्य और मोक्ष का प्रतीक माना गया।

गंगा के इस तट का विशेष महत्व हिन्दू धार्मिक परंपरा में स्नान, ध्यान, तप, सत्य और धर्म की साधना से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि माघ मास जैसे पवित्र महीने में यहाँ विशेष धार्मिक अनुष्ठान और प्रवास की परंपरा प्रचलित रही। इस क्षेत्र का पवित्र स्वरूप गंगा नदी की विशालता और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा है, जो आज भी लोकमान्य है।

प्रारंभिक परंपरा, कल्पवास और पूजा का आरंभ
पूर्व काल में गंगा तट पर कल्पवास और स्नान का कोई संगठित या लिखित प्रमाण नहीं मिलता, परन्तु यह ज्ञात है कि यहाँ के साधु-संत बिना किसी औपचारिक मेला के भी माघ माह में गंगा के किनारे कुछ दिनों के लिए प्रवास करते थे। इन साधु-संतों का उद्देश्य शास्त्रों के अनुसार ध्यान, भजन, अध्ययन और गंगा स्नान के द्वारा आत्मशुद्धि प्राप्त करना था।

विशेष बात यह है कि शमशाबाद (खोर) के पास ढाई घाट पर प्राचीन काल से माघ मेला लगता रहा है। अनेक साधु–संतों द्वारा इस स्थान पर साधना का क्रम चलता रहा, परन्तु आम जनता का इसमें विशेष सहभाग नहीं दिखा। धीरे-धीरे इस पवित्र स्थल की धार्मिक महत्ता लोगों तक फैलने लगी और कल्पवास करने वाले साधुओं की संख्या में वृद्धि हुई।

मेले का पहला संगठित आयोजन (1950–1956)
1950 के दशक की शुरुआत में ही साधू संतों द्वारा पांचाल घाट के गंगा तट पर प्रवास करने में बढ़ोत्तरी होने लगी थी। इस स्थान पर कई छोटी-छोटी घाटियां होने के कारण ये “घटियाघाट” के नाम से जाना जाने लगा था, जिसे बाद में पांचाल घाट के नाम से प्रतिष्ठित किया गया। इस स्थल पर गंगा नदी के किनारे लंबा विस्तार और नदी के पावन प्रवाह ने श्रद्धालुओं में एक प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया।

वर्ष 1955 में स्थानीय विधायक महरम सिंह ने पहली बार यहाँ एक संगठित धार्मिक सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें साधु संत, राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय नागरिको ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में पंचायत सम्मेलन, सहकारिता सम्मेलन, शिक्षक सम्मेलन अन्य जागरूकता कार्यक्रम किये गए। इन आयोजनों से इस स्थल का महत्व आम जनता के बीच फैलने लगा।

इसके पश्चात वर्ष 1956 में आसपास के श्रद्धालुओं ने माघ महीने में गंगा तट पर मड़ैया डालकर कल्पवास शुरू किया। धीरे-धीरे यह आयोजन फैलने लगा और इस पवित्र तट पर कल्पवास करने का क्रम नियमित होने लगा।

नामकरण “मेला श्री रामनगरिया”
जब इस पवित्र आयोजन की ख्याति फैलने लगी, तब वर्ष 1965 में स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, शिक्षकों, महिलाओं तथा कल्पवास करने वाले साधु-संतों के सम्मेलनों में स्वामी श्रद्धानंद के प्रस्ताव पर इस आयोजन का नामकरण किया गया। इसी वर्ष इस माघ मेला को औपचारिक रूप से “मेला श्री रामनगरिया” का नाम दिया गया, जो आज भी इसका प्रचलित नाम है। नामकरण के पश्चात मेले ने केवल धार्मिक आयोजन का स्वरूप नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक एकता को भी समाहित किया। इससे यह मेला और व्यापक रूप से पहचान में आया।

विकास: पुल, पहुँच और विस्तार (1970–1985)
1970 के दशक में गंगा नदी पर लोहिया सेतु का निर्माण हुआ, जिसके बाद मेला श्री रामनगरिया में कल्पवासियों की संख्या में तीव्र वृद्धि देखने को मिली। पुल के निर्मित होने के कारण श्रद्धालुओं का आवागमन सुगम हुआ और यह मेला फर्रुखाबाद समेत आसपास के जिलों जैसे शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर, मैनपुरी और एटा से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये प्रमुख स्थल बन गया।

गंगा के किनारे तंबुओं की नगरी लगने लगी और प्रत्येक माघ मेला लगभग एक माह तक चलता है जिसमें हजारों श्रद्धालु कल्याणार्थ कल्पवास करते हैं। इस मेले को मिनी कुम्भ मेला के नाम से भी देखा जाता है क्योंकि इसका स्वरूप कुंभ मेला जैसा भव्य होता है। ये आयोजन सिर्फ धार्मिक गतिविधि नहीं रहा, बल्कि पूरे सामाजिक एकता, भक्ति, सामुदायिक सेवा, पूजा-पाठ तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का केंद्र भी बन गया है।

प्रशासनिक भागीदारी और संगठन (1985–सतत)
जैसे-जैसे कल्पवासियों की संख्या हजारों में पहुँचने लगी, जिला परिषद फर्रुखाबाद को मेला संचालन का उत्तरदायित्व सौंपा गया। उस समय के जिलाधिकारी श्री के.के. सिन्हा तथा जिला परिषद के मुख्य अधिकारी श्री रघुराज सिंह ने मेले के पूर्वी और पश्चिमी बाँधों पर प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया तथा बिजली व सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था विस्तार से सुनिश्चित की। मेले को स्थायीत्व देने हेतु “मेला श्री रामनगरिया समिति” का गठन किया गया जिसमें महरम सिंह और अन्य प्रमुख समाजसेवी सदस्य सम्मिलित रहे। प्रशासन तथा समिति के संयुक्त प्रयास से मेले का संचालन सुचारू रूप से होने लगा। वर्ष 1989 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी ने इस मेले का अवलोकन किया तथा सरकार की ओर से प्रतिवर्ष पाँच लाख रुपये के अनुदान की घोषणा की, जिससे यह आयोजन और भी अधिक व्यवस्थित हुआ।

धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप
मेला श्री रामनगरिया का धार्मिक स्वरूप अत्यंत व्यापक और विविध है। यहाँ कल्पवास करने वाले साधु-संत, श्रद्धालु, परिवार-परिजन एक स्थान पर एक माह तक गंगा तट पर तंबू लगाकर निवास करते हैं। यहाँ प्रतिदिन नित्य संगम स्नान, भजन-कीर्तन, हवन-पूजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। माघ पर गंगा स्नान तथा पंचक (विशेष स्नान) की परंपरा के कारण यहाँ पाँच शाही स्नान भी होते हैं, जिनका विशेष धार्मिक महत्व है।

विश्वास है कि कल्पवास करने से साधक मन, वचन और कर्म से पवित्र होता है और उसे आत्मिक शांति तथा मोक्ष-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस मेला में बहुत से ऐसे नियम अपनाये जाते हैं जैसे झूठ न बोलना, क्रोध से परहेज़, दान-धर्म, नित्य संगम स्नान और एक समय भोजन आदि, जो साधना को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव
मेला श्री रामनगरिया धार्मिक कार्यक्रम ही नहीं रहा बल्कि आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का भी केन्द्र बन गया है। स्थानीय दुकानदार, कलाकार, हस्तशिल्पी, व्यावसायी और छोटे-बड़े उद्योग इस आयोजन से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। मेले के समय अनेक बाहरी व्यापारिक स्टाल लगते हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं।
यहाँ नौटंकी, सर्कस, कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक मंच, भंडारे तथा एक्सिबिशन शो जैसे आयोजन भी होते हैं, जो मेले के सामाजिक तत्व को और समृद्ध करते हैं।

आधुनिक व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ
आजकल के मेला श्री रामनगरिया में प्रशासन द्वारा पूर्ण रूप से सुरक्षा, चिकित्सा, सफाई, यातायात, पीने के पानी, बिजली, सीसीटीवी और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्थित व्यवस्था की जाती है। जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्साधिकारी, विकास अधिकारी तथा अन्य अधिकारियों की टीम नियमित रूप से मेले का संचालन करती है। समिति द्वारा वाटर सप्लाई, अस्थायी टॉयलेट्स, चिकित्सा शिविर, अग्निशमन, यातायात प्रबंधन, साफ-सफाई, और कई अन्य व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की जाती हैं ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित और आराम-दायक अनुभव मिल सके।

धार्मिक-आस्था में स्थान और मान्यता
आज “मेला श्री रामनगरिया” उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। यह प्रयागराज (कुंभ) के बाद गंगा तट पर लगने वाला दूसरा सबसे बड़ा माघ मेला है, जहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन, गंगा स्नान और कल्पवास करने आते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र स्थल पर प्रवास और कल्पवास से आध्यात्मिक शांति, पापों से मुक्ति और जीवन-धर्म के प्रति समर्पण की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर वर्ष होने वाला यह मेला श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत
मेला श्री रामनगरिया केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, सामाजिक समरसता, प्रशासनिक संगठन और सामूहिक भक्ति का अनूठा संयोजन है। इसका विकास एक छोटे-से कल्पवास आयोजन से शुरू होकर आज एक विशाल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया है।

इस मेला ने स्थानीय समाज को एक साथ जोड़ने, धार्मिकता का प्रचार करने तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह आयोजन आज भी गंगा की पावन लहरों द्वारा प्रेरित भक्तों का केंद्र बना हुआ है तथा आने वाले वर्षों में भी अपनी महत्ता बनाए रखेगा।

Samvad 24 Office
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