खानवा का युद्ध: जिसने भारत में युद्ध की परिभाषा बदल दी जहां वीरता नहीं बल्कि बारूद था निर्णायक हथियार

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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। भारतीय इतिहास में कुछ युद्ध ऐसे भी हुए हैं, जो केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पूरे युग की दिशा बदल दी। 17 मार्च 1527 को लड़ा गया खानवा का युद्ध ऐसा ही एक ऐतिहासिक संघर्ष था। यह युद्ध केवल राणा सांगा और बाबर के बीच नहीं था, बल्कि यह परंपरागत भारतीय शौर्य और नवागत सैन्य तकनीक के आमने-सामने आने की निर्णायक घटना थी। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि वीरता, साहस और बलिदान के साथ-साथ अब युद्धों में तोप और बारूद भी निर्णायक भूमिका निभाने लगी हैं।

खानवा का युद्ध राजपूती वीरता की पराजय नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य परंपरा के एक युग का अंत और दूसरे युग का आरंभ था।

राणा सांगा: भारतीय प्रतिरोध का प्रतीक
महाराणा संग्राम सिंह, जिन्हें इतिहास राणा सांगा के नाम से जानता है, मेवाड़ के ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने जीवन को युद्धभूमि में तपाया। उनके शरीर पर लगे असंख्य घाव उनकी पराजय के नहीं, बल्कि उनके संघर्षों के प्रमाण थे। एक आँख खो देना, हाथ का निष्क्रिय हो जाना और शरीर पर गहरे घाव, इन सबके बावजूद युद्धभूमि से पीछे न हटना राणा सांगा की असाधारण वीरता को दर्शाता है।

राणा सांगा केवल मेवाड़ के शासक नहीं थे, बल्कि उन्होंने राजपूत संघ का निर्माण कर उत्तर भारत में विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध एक संगठित शक्ति खड़ी की। मालवा, गुजरात और दिल्ली सल्तनत के कई शासकों को पराजित कर वे पहले ही यह सिद्ध कर चुके थे कि राजपूत शक्ति को हल्के में लेना आत्मघाती हो सकता है।

बाबर: विजय का श्रेय वीरता को नहीं, तकनीक को
बाबर की छवि अक्सर एक महान विजेता के रूप में प्रस्तुत की जाती है, किंतु खानवा के युद्ध का निष्पक्ष विश्लेषण यह बताता है कि व्यक्तिगत वीरता और सैन्य साहस के स्तर पर बाबर राणा सांगा के समकक्ष नहीं था। बाबर की वास्तविक शक्ति उसकी तोपें, बंदूकें और मध्य एशियाई युद्ध तकनीक थीं। पानीपत के प्रथम युद्ध में जिस तकनीक ने इब्राहिम लोदी को पराजित किया था, वही तकनीक खानवा में और अधिक परिपक्व रूप में दिखाई दी। बाबर ने अरबात प्रणाली, तोपों की कतारबद्ध तैनाती और तुलुग़मा पद्धति का प्रयोग किया, जिसने युद्ध के पारंपरिक नियमों को तोड़ दिया।

युद्ध से पहले की राजनीतिक पृष्ठभूमि
पानीपत के बाद बाबर की स्थिति भारत में स्थिर नहीं थी। राजपूत शक्ति उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। वहीं राणा सांगा के लिए बाबर एक और विदेशी आक्रांता था, जिसे पराजित कर भारत को स्वदेशी सत्ता के अधीन लाना उनका उद्देश्य था। राणा सांगा के साथ कई राजपूत शासक और अफगान सरदार थे। यह युद्ध केवल मेवाड़ का नहीं, बल्कि विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीय स्वाभिमान का युद्ध बन चुका था।

खानवा का युद्ध: जब तलवारें तोपों से टकराईं
17 मार्च 1527 को खानवा के मैदान में दोनों सेनाएँ आमने-सामने थीं। एक ओर राजपूतों की परंपरागत युद्ध शैली, जिसमें सीधी टक्कर, घुड़सवारों का आक्रमण और व्यक्तिगत पराक्रम प्रमुख था। दूसरी ओर बाबर की सेना, जो तोपों की गर्जना, बारूद के धुएँ और रक्षात्मक मोर्चाबंदी पर निर्भर थी।

जैसे ही युद्ध आरंभ हुआ, राजपूत सेना ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। कई बार बाबर की पंक्तियाँ टूटने की कगार पर पहुँचीं। स्वयं बाबर ने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-बाबरी में स्वीकार किया है कि एक समय उसकी सेना भयभीत हो गई थी। यह स्पष्ट संकेत है कि यदि युद्ध सिर्फ तलवार और साहस पर आधारित होता, तो परिणाम शायद अलग होता।

तोपें: युद्ध का निर्णायक मोड़
राजपूत योद्धा तोपों की इस नई तकनीक से परिचित नहीं थे। घोड़ों की कतारें, जो अब तक युद्ध की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती थीं, तोपों की मार से बिखरने लगीं। युद्धभूमि पर धुआँ, शोर और विस्फोट ने राजपूत रणनीति को कमजोर कर दिया। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह वीरता की हार नहीं थी, बल्कि तकनीकी असंतुलन था। राणा सांगा की सेना साहस में कम नहीं थी, परंतु उनके पास उस समय की आधुनिक युद्ध तकनीक नहीं थी।

राणा सांगा की पराजय या इतिहास की मजबूरी?
इतिहास में अक्सर परिणाम को ही निर्णायक मान लिया जाता है, लेकिन खानवा के युद्ध को केवल विजय-पराजय के चश्मे से देखना अन्याय होगा। राणा सांगा की हार यह सिद्ध नहीं करती कि वे कमजोर थे, बल्कि यह दिखाती है कि युद्ध के नियम बदल चुके थे। यदि इस युद्ध में कोई पराजित हुआ, तो वह पुरानी युद्ध प्रणाली थी, न कि राजपूती शौर्य।

खानवा का युद्ध और भारतीय इतिहास में युग परिवर्तन
इस युद्ध के बाद भारत में तोप और बारूद युद्ध का स्थायी हिस्सा बने, किलेबंदी और रणनीतिक युद्ध शैली को प्राथमिकता मिली, मुगल साम्राज्य की नींव मजबूत हुई लेकिन इसके साथ ही, राणा सांगा का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रतिरोध और स्वाभिमान का आदर्श बन गया।

राजपूती वीरता: जो कभी पराजित नहीं हुई
राणा सांगा युद्धभूमि में बुरी तरह घायल हो गए, परंतु उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ, उनकी चेतना में हार नहीं थी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि वीरता परिणाम से नहीं, उद्देश्य से मापी जाती है। राजपूत इतिहास में खानवा को आज भी बलिदान और संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, न कि शर्म या पराजय के रूप में।

इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक
खानवा का युद्ध राणा सांगा की पराजय नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का युगांतकारी मोड़ था। बाबर की जीत उसकी व्यक्तिगत वीरता की नहीं, बल्कि नई सैन्य तकनीक की जीत थी। राणा सांगा आज भी भारतीय इतिहास में उस योद्धा के रूप में जीवित हैं, जिसने विदेशी सत्ता के सामने सिर झुकाने से बेहतर युद्धभूमि में संघर्ष करना चुना। यही कारण है कि खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास में पराजय की कथा नहीं, बल्कि शौर्य की अमर गाथा है।

Samvad 24 Office
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